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मई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

५७. शक्की बीबी @

शक्की बीबी (हास्य कविता) ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बीमारी का बहाना बनाकर, अपने कुछ नखरे दिखाकर, मेरे संडे को ख़राब करने की उसने ठानी थी, बड़ी अजीब उसकी मनमानी थी... कूलर से गर्म हवा आ रही थी, गर्मी से ज्यादा बीवी का डर सता रही थी, कर्म फुट गये इस निठल्ले को पाकर, ऐसा हीं पड़ोसन को बता रही थी, आते हीं सिर पर चढ़ कर बोली, तुमसे खाना भी ठीक से बनता नहीं, झाड़ू-पोंछे के लिये मौजूद है नौकरानी, कपड़े अब तक क्यों धोये नहीं, कूलर में कब  भरागे  पानी ... बंदा मैं भी हाजिर जवाब था, नौकरानी का कर रहा हिसाब था, मालिक बनने की मेरी कोई ख्वाजाईश नहीं, मैं तुम्हारी हीं नौकरानी के पास था... बीवी का माथा हुअा गर्म, आती नहीं है तुमको शर्म, तनख्वाह मैंने कब कर दिया भुगतान, ख़ूबसूरत बीवी के रहते करते हो ऐसा काम... आज मैंने भी मौका पाया था, गाय समझ कर साड़ पाया था, कभी कहती हो करने को काम, कभी लगती हो लगाने इल्जाम, मैं तेरे झांसे नहीं आने वाला हूँ, काम के डर से नहीं भागने वाला हूँ, तुमसे भली यह नौकरानी है, कूलर में उसने भर दिया पानी है, जाओ जा कर करो आराम, मुझे करने दो नौकरान...

५६. पहला प्रेम पत्र @

  पहला प्रेम पत्र   (हास्य कविता ) ✍ बिपिन कुमार चौधरी मैंने उसे आज एक  ख़त  लिखा है, दिल का इजहारे मोहब्बत लिखा है, यादों से कभी रुखसत नहीं होती हो, जिंदगी से रहता हूँ बेख़बर हरवक्त लिखा है, मैंने आज एक प्रेम पत्र लिखा है .... उसने भी मुझे प्यार से ख़त लिखा है, पहली लाईन में हीं कमबख्त लिखा है, तरस मुझ पर उसे बहुत आया है, अपनी सेंडील को बड़ा सख़्त लिखा है, कभी हुअा अगर तेरा मेरा सामना, प्यार का भूत मिनटों में उतर जायेगा, ख़ुद को उसने चंडी का भक्त लिखा है... उसने भी प्यार से मुझे ख़त लिखा है... पहला ख़त हीं मेरे इश्क़ का दफ़न कब्र निकला है, जवाब देने का अब तक नहीं मुझे  फुरसत मिला है, भरी बाज़ार में मुझसे हीं टकराने का उसे वक्त मिला है, सेंडील से पहले उसकी जुबां सख़्त निकला है, ई मेल के जमाने में गदहे तूने ख़त लिखा है, सिर्फ 399 के रिचार्ज पर बदल जायेगी तेरी क़िस्मत, ऐसा प्यारा मुझे मोहब्बत मिला है ... मैंने आज एक प्रेम पत्र लिखा है ...

५८. चुनावी भिखारी @

*चुनावी भिखारी* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* आज दर पर एक पुराना भिखारी आया था, मक्के की रोटी संग सरसों का साग खाया था, इन्द्रा आवास संग वृद्धापेंशन का कभी सपना दिखाया था, चुनावी बयार ने पाँच वर्ष बाद उसे  भिखारी बनाया था .... काकी के चरणों पर लोट-पोट शरमाया था, कैंची सी जुबां वाली काकी को देख घबराया था, चरणों से उठा काकी ने खाट पर बिठाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था, कमबख्त के चेहरे को देख बेटा तूफ़ान था, सरकारी दफ़्तरों में ठोकर खा-खा कर परेशान था, बदसलूकी ना कर भिखारियों से काकी ने समझाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद भिखारी बनाया था ... भोजन संग आशीर्वाद पाकर भिखारी गदगद था, संस्कारों के बंधन में काकी ने दबाया नफ़रत था, बेशर्मों के बादशाह ने ख़ुद को महान बताया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ... सामने खड़ी एक पगली थी, कालिख पोत भिखारी संग मनाई होली थी, बात बड़ी नहीं भिखारी ने बाथरूम आलीशान बनवाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ... शरीफों की बस्ती में एक पागल ने कुछ ऐसा कर दिया, क़लम के सिपाहियों...

५९. आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... @

आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी आज फ़िर एक तूफ़ान आया है, ख़ून-पसीने से सींची गई अरमान सिसक रही है, जिंदगी में घुटन-पीड़ा का उफान आया है, अन्नदाता के उम्मीदों को श्मशान बनाया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... जिन पर बीत रही उनका हाले दिल क्या बताऊँ, ख़ुद के हलक से नेवाला गटकना हो रहा मुश्किल, उस महापुरुष को नेवाला कैसे खिलाऊँ, माँ धरा रो रही, आसमां भी रो रहा है, ऐसा यह वक्त हैवान आया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... जिस हरियाली को देख सीना चौड़ा हो जाता था, प्रकृति के कहर ने दिल पर हथौड़ा चलाया है, आंखो के सैलाब से आत्मा रो रही है, आश्रितों की उदासी, महाजन के तगादे ने आत्महत्या का पैगाम लाया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है... ऊपर का भगवान रूठा है, नीचे वाला झूठा है, मजबूरी की आँधी ने ईमान का आबरू लूटा है, घर के जन की मत पूछिये, जानवर भी भूखा है, अस्तित्व संकट में, ऐसा इम्तिहान आया है ... आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... अश्रुधारा सुखी भी नहीं, बेगैरतों ने क़ब्जे का फ़रमान भिजवाया है, स्त्री धन पहले हीं हो चुका स्वाहा, कोई पूजा न दान काम आया है, मालिक आज क्रूर ...

६०. जीवन @

जीवन ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी ख्वाइशो के भंवर में फंसा इंसान, अपने हीं बनाये उलझनों से परेशान, ख्वाईशौं की गुलामी में संघर्ष करता है, अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है ... धन की लालसा, पद की इच्छा, सत्ता के लिये ईमान का भी हवन करता है, इसी धुन में अनेकों कुकर्म करता है, अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है ... अपने-परायेपन का कुचक्र, स्वार्थ सिद्धी हेतु सशक्त संपर्क, जीवन की तलाश में मौत से संपर्क करता है, अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है, ख्वाईशो का विस्तारित गगन, मजबूरियों के हाथों तिरस्कृत उपवन, किसी की वाह, कोई आंहें भरता है, अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है... कर्म की साधना, धर्म का शरण, हक की लड़ाई, दरिद्रता में भी उल्लसित मन, जीवन के कठिन पथ को सहज करता है, मानवता को नित्य समर्थ करता है,

जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ...

जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी जिनके रहमोकरम से हमने यह सतरंगी दुनियाँ पाया है, रब मैं क्या जानूं रब के बारे में भी जिसने हमें बताया ...

१२०. तेरी बेवफ़ाई की सौगात से कोई जन्नत सजाने वाला है ... *

तेरी बेवफ़ाई की सौगात से कोई जन्नत सजाने वाला है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी सुना है कल तेरे दर पे बारात आने वाले है, तेरी दिल की गलियों में कोई प्यार की बांसुरी बजाने वाला है, इन शहनाई की गीतों के बीच कोई उन्हीं गलियों में बेवफ़ाई के नगमे भी गाने वाला है, तेरी बेवफ़ाई की सौगात से  कोई जन्नत सजाने वाला है... तेरे मोहब्बत की गलियों में  भटका मैं एक मुसाफ़िर हूँ, तूने अपना धर्म बदल लिया, दुनियाँ की नजरों में मैं अब काफ़िर हूँ, काफ़िर बन कर भी तेरी मोहब्बत के धर्म को कोई निभाने वाला है, तेरी बेवफ़ाई की सौगात से कोई जन्नत सजाने वाला है ... इन्हीं हंसी वादियों में मुस्कुरा कर तूं रुखसत हुई थी, चाँद तारों की गवाही में तेरे इश्क़ के इजहार से मेरी जिंदगी जन्नत हुई थी, पूरी जिंदगी इसी जन्नत में तेरे झूठे  वादों कोई गुनगुनाने वाला है, तेरी बेवफ़ाई की सौगात से कोई जन्नत सजाने वाला है .... हाथों में किसी और के नाम की मेहंदी सजा कर बहुत ख़ुश होगी, तेरे लबों पर ग़लती से सही किसी और का नाम आने वाला है, तेरे हाथों की मेहंदी का रंग भी  कोई नाम भुलाने वाला है, तेरी बेवफ़...

६१. इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...@

इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... ✍🏻  बिपिन कुमार चौधरी उन्हें रब से भी शिक़ायत है, रब के बंदों से भी शिक़ायत है, अपने कर्मों से कोई गीला शिकवा नहीं, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... जीवन हाथी पर बैठा महावत है, सृष्टि में सबसे सुंदर यह इनायत है, चींटी भी वक्त पर करता बगावत है, अहंकार के मद में ऊंचाई खोता महावत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... दूसरों की तरक्की देख मन आहत है, सब कुछ पाकर भी हमें नहीं राहत है, चाहतों के मकड़जाल में फंसा इंसानियत है, ईश्वर को शबरी के जूठे बैर की चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है माना कि जिंदगी में बहुत कमी है, फ़िर भी कब हमारी जिंदगी रुकी है, जिसे हम हासिल कर चुके, दूसरों की सिर्फ चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... अपने बच्चों के मनमानी में हम हीं सबसे बडे़ रूकावट हैं, यही वक्त की सबसे गूढ़ नजाकत है, हम जिस रब के बच्चे उनकी भी कुछ चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... अपने मन से नहीं कर्मों के हिसाब से मांगो, दूसरों के दोष को तबेला के खूंटी में टांगों, फ़िर चारों ओर स्वर्ग सी यह इनायत है,...

कुछ लोग पैदा लेते हीं पार्टी के भगवान हो गये हैं ...

*कुछ लोग पैदा लेते हीं पार्टी के भगवान हो गये हैं ...* कुछ गदहे पहलवान हो गये हैं, पतलून पहनते हीं जवान हो गये हैं, बालों को सफ़ेद करवाने वाले आश्रित इनके हैं, कुछ लोग पैदा लेते हीं...

कुछ लोग पैदा लेते हीं पार्टी के भगवान हो गये हैं ...

*कुछ लोग पैदा लेते हीं पार्टी के भगवान हो गये हैं ...* कुछ गदहे पहलवान हो गये हैं, पतलून पहनते हीं जवान हो गये हैं, बालों को सफ़ेद करवाने वाले आश्रित इनके हैं, कुछ लोग पैदा लेते हीं...

६२. जरूरतों की यारी स्वार्थवश यह मेला है ... @

जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है  ... ✍🏻  बिपिन कुमार चौधरी अपनों से धोखा खाये लोगों का कारवां निकला है, हर घर ख़ाली हुअा, हर कोई अकेला है, उम्मीदें आसमां पर है, सब निज स्वार्थ का झमेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... जिन्होंने जन्म दिया, वह भी ख़ुश नहीं है, जिसने सल्तनत पाया कम उसका भी दुःख नहीं है, जिंदगी की भीड़ में तंगदिल अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... पुत्र परेशान, पिता भी हैरान है, किसी के सपने टूटे हैं, किसी ने दुःख बहुत झेला है, किसी ने किया नाउम्मीद, कोई बुढ़ापे में अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... माँ को भी शिक़ायत है, बहन भी बहुत नाराज है, आरोपों से छलनी यह जग तबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... अर्धांगिनी की क़िस्मत फूटी है, पतियों का शिकायत भी अलबेला है, सबकी भावनाओं से यहाँ सबने खेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... चाहतों पर अंकुश, संतुष्टि का ख़्यालात, निःस्वार्थ सहयोग की भावना, ईश्वर पर विश्वास, शांति का मरहम यह असर अलबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश...

६३. नहीं करना इंसानियत से बेमानी ... @

अपने प्रियतम से विरह की पीड़ा, साधुओं के पाखंड का पूज्यनीय लीला, सत्संग में मिथ्यावादियों का शिकवा गीला, मानव मस्तिष्क स्वतंत्र हीं पवित्र,  सशक्त अकेला .... ज्ञान की लालसा, बुद्ध का आरण्यक वास, माया की इच्छा अपने धन का आंशिक त्याग, पुण्य-प्राप्ति की लालसा में करना उपवास, ब्राह्मणवाद से कुंठित विद्वता, दिग्भ्रमित बुद्धिजीवी समाज .... ईश्वर की साधना, जन्मदाता की आराधना, आश्रित का पोषण, भिक्षुक की पूर्ण मनोकामना, मित्रों का सहयोग, निर्बल को नहीं दुत्कारना, सफ़ल गृहस्थी, यही श्रेष्ठ ईश्वर वंदना... दिल में बैर, जुबां पर मीठी वाणी, विचलित मन ख़ुशहाल जिंदगानी, कपटी मन जरूरत बनाये दिवानी, सिर्फ मेरी नहीं संपूर्ण जग की यही कहानी .... वही सबसे दोषी जिसकी मीठी नहीं वाणी, सरल स्वभाव, मुश्किल यहाँ जिन्दगानी, विघ्नों का डेरा, जग का दस्तूर हैवानी, प्रफुल्लित मेरा मन, नहीं करना इंसानियत से बईमानी ...

६४. याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ... @

याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुकम्मल सजा पायेगा... 👍 बिपिन कुमार चौधरी सत्ता की मदहोशी में कोई इस कदर झूमा है, जिनके रहमोकरम से इसे हासिल किया वही आज अनसुना है, पांच वर्ष बाद फ़िर मेरे हीं दर पर आएगा, याद रख, अपनी गुनाहों का तूं  मुकम्मल सजा पाएगा ... जिसे तूं आजकल आँधी बता रहा है, अपनी खुशी से फूला नहीं समा रहा है, तेरे कर्मों से बहुत जल्द ऐसा आँधी फ़िर आयेगा, याद रख अपने गुनाहों का तूं  मुक्कमल सजा पाएगा ... हम अक्सर रहगुजर पर भी तकिया डाल कर सो जाते हैं, अपनी क़िस्मत ऐसी है तेरे जैसों के लिये तख़्त सजाते हैं, अपने हीं किये वादों को अगर भूल जाएगा, याद रख अपने गुनाहों का तूं  मुक्कमल सजा पायेगा ... हमारी यह क़िस्मत हमें इसी तरह रोना है, नई उम्मीद में फ़िर नई फ़सल बोना है, धरती माँ की कृपा से नई सुबह आयेगा, याद रख अपने गुनाहों की तूं  मुक्कमल सजा पायेगा ... जाति धर्म में बंटा हूँ, इसलिए मिली यह सजा है, एक बार नहीं, इन्हीं लोगों ने कई बार ठगा है, नई पीढ़ी एक दिन नई क्रांति लेकर आयेगा, याद रख अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा  पायेगा ... दोनों हाथ जो...

१२१. मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है ... *

मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी पैसा मैंने आजकल बहुत कमाया है, इन पैसों के लिये कभी किसी ने मुझे ठुकड़ाया है, उसी की लौटती बारात को इन पैसों ने लौटाया है, मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है, दूल्हा हैरान, दुल्हन ने मुझको वरमाला पहनाया है.... मैं उसके लायक नहीं ऐसा कभी उसने बताया है, रब की मेहरबानी या इन पैसों ने प्यार जगाया है, मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है, दूल्हा अपमानित, मुझे आँख दिखाया है, भरी महफ़िल में उसके भाइयों ने कन्धे पर बिठाया है, मेरे हालात या मुझको इनलोगों ने अपनाया है, मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है, सब ख़ुश हैं, क्या ख़ूब सबक सिखाया है, मेरे प्यार ने क्या दुर्गा रूप दिखाया है, तुम्हें कैसे अपना लूं, इन्हीं पैसों के लिये तुमने भी बहुत रुलाया है मेरे जैसा कोई नहीं, भरी महफ़िल में आज उसने बताया है, दहेज को दैत्य सारे जहाँ ने बताया है, मुझे नहीं मेरी ओकाद को तेरे अपनों ने अपनाया है, मैं कैसे बताऊँ, अब इस दिल में किसी ओर ने आशियां बनाया है, मेरे जैसा कोई नही...

तुझे ख़ुश देख कर तेरा प्यार आज भी जिंदा है ..

तुझे ख़ुश देख कर तेरा प्यार आज भी जिंदा है .. ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी तेरी खुशियों के लिये आज फ़िर महफ़िल में जाम छलका है,  नई जिंदगी तुम्हें मुबारक हो, मेरे गमों का बोझ हल्का है, नजर...

तेरे आंखो में आँसू देखकर चाँद को भी रोना आया हैं...

तेरे आंखो में आँसू देखकर चाँद को भी रोना आया है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी ए मेरी जिंदगी, तुझे रब ने सिर्फ मेरे लिये बनाया है, तेरी आंखो में  आंसू नहीं आये,  खुशियों का ऐसा महल मैंन...

तेरे दिये ग़म छिपा कर मुझे सारी उम्र बिताना है ...

तेरे दिये ग़म छिपा कर मुझे सारी उम्र बिताना है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी किसी के आंखो का तारा हूँ, किसी को रब से ज्यादा प्यारा हूँ, अक्सर उन हसीन यादों में खोया रहता हूँ, मेरी जां, ...

वह मुझे नजर नहीं आ रहा है ...

वह मुझे नजर नहीं आ रहा है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी तेरे इंतिज़ार में ये जो वक्त गुजरता जा रहा है, तेरी एक झलक पाने को बेक़रार करता जा रहा है, हर आने-जाने वाले चेहरे को मेरी नजर घूरत...

तेरे बिन अब मुझे जिया नहीं जाये ...

तेरे बिन अब मुझे जिया नहीं जाये ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी तेरा यह खूबसूरत चेहरा, तेरी मदहोश निगाहें, मेरी रातों की नींद, दिन का चैन चुराये, तेरी हिरणी सी चाल, ये मनमोहक अदाएं, तुझ...

१३१. माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... @

माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी पुरुषोत्तम राम की धरती पर मचा  हाहाकार है,  आधुनिकता में काफी पिछे छूट गया संसार है,  संवेदनाएं मृत हुई ऐसा बदला मानवीय व्यवहार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन के नजरों से घायल भारतीय संस्कार है .. अतिथि देवो भवः, सबसे बड़ा धर्म परोपकार है,  इस पावन धरती पर कुसंस्कृति का कलुषित अत्याचार है,  मानसिक दरिद्रता से नष्ट हुई, मानवता लाचार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... दीपमालाओं से सजा कर जहाँ मनाया जाता त्यौहार है,  साधु-संतो की सेवा, निर्धन को दान जहाँ धर्म का आधार है,  मोह माया के त्याग का पाखंड करने वालों के मन में अब व्यभिचार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... पूज्यनीय जहाँ नदी-तालाब, मूर्ति संग पूजा जाता मूर्तिकार है, पशु-पक्षी संग नाग देवता भी श्रद्धा से प्राप्त करता आहार है,  सृष्टि में मानव के सृजनकर्ता माँ-बाप की उपलब्धि बेकार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजर...

६५. लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... @

लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बडे़ शौक से जिनके सिर दिया ताज, बड़ी बेरहमी से उन्होंने दबाई जनता की आवाज, अब समझ आया सबसे बेहतर विकल्प नोटा है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... जाति, धर्म के नाम पर जिसने किया वोट, अपनी फ़रियाद अनसुनी किये जाने से आंसू बहाये रोज, लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़, आख़िर जनता क्यों रोता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है  ... महापर्व के जश्न में हमने निर्धन को किया अनसुना, खेती किसानी लूट गयी, महँगाई हो गयी दूना, अब क्यों भगवान को इसका जिम्मेदार तूं बताता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... निरंकुश प्रसाशन, ईमानदारी लाचार, मेधा मुश्किल में, युवा बेरोजगार, हम काटते वही हैं, मानव जैसा बोता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है... खैरात पाकर जिन्होंने की सुखद अनुभूति, विकास चक्र का किया इसी ने दुर्गति, अपने राष्ट्र के भविष्य के लिये अब क्यों चिंतित होता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है . .. काली...

ना जाने क्यों तेरे संग देख मुझे यह दुनियाँ परेशान हो जाता है ...

ना जाने क्यों तेरे संग देख मुझे यह दुनियाँ परेशान हो जाता है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी तेरे  ख़ूबसूरत लबों पर अक्सर मेरा नाम आता है, यह मेरी खुशनसीबी है , तेरे नाम के साथ मेरा नाम ...

६७. लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... @

लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी सत्ता का न्याय से यह कैसा गठजोड़, न्याय के चक्कर में जनता लगा रही भाग-दौड़, सिपाही मांगे भीख, काला कोर्ट बोले दिल मांगे मोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर .... धारा की अटकलबाजी, न्याय ना मिले किसी ओर, तारीख़ पर तारीख़, जनता का जाये दिल तोड़, लाचारी देख खुशी मनाये चोर ... ऊपर का भगवान जब हो रूठा, नीचे सज्जन को ना मिले ठौर, बिन धन-बल कोई जब ना सुने, न्याय की आश जनता देती छोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर... मंदिर का भगवान रूठा, दलितों का सम्मान लूटा, जनता उलझी इसी बात में, अजान मचाए  क्यों शोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... आया जब चुनाव नजदीक, नेताओं ने पीड़ित के घर लागाया दौड़, अखबारों के पन्ने रंग गये, जनता ने उसी को बनाया मोर, लाचारी देख खुशी मनाये चोर... राजसिंहासन पर सुशोभित जब हुअा चोर, देश का खजाना ख़ाली हुअा, जनता चैन की बंसी बजाए चारो ओर..., लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... नौकर नौकरी बांट रहा, मेधा किनारे, वोट बैंक छांट रहा, युवा दिनरात खोजे आरक्षण का तोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर, मत को अपना बेच...

रात के अन्धेरे में जुगनू से मेरी बात हुई ...

रात के अन्धेरे में जुगनू से मेरी बात हुई ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी रात के अन्धेरे में जुगनू से मेरी बात हुई, मेरी जिंदगी मुझसे मिलने आयी थी, शाम तलक मेरी राह वो तकती रही, मैं जब तल...