कभी दिल को बहलाता रहा, कभी दिमाग को झुठलाता रहा, जख्म जो वक्त ने दिया था, मुस्कुरा कर छिपाता रहा, लगा कर मुखौटा बहरूपिया वाला, मेरे घरौंदे में आग लगाता रहा, मैं गुस्ताखी करता रहा नजरंदाज, वह अपनी होशियारी पर इतराता रहा,
गांधीगिरी सत्य अहिंसा का देकर नारा, जीवन भर वह अटल रहे, देश परदेश में सहा सितम, कब कहां वो विकल रहे, दुर्बल तन और निर्मल मन, संघर्षपथ पर सदा अविरल रहे, यातनाएं सही, पीड़ाएं झेला, चरखा चला, मचाते हलचल रहे, फिरंगियों के नाक में करके दम, देश आजाद कराने में सफल रहे, किया नहीं कभी पद की चाह, जीवनभर वह सरल रहे, सत्ता के हवसी लेकर उनका नाम, दुर्भाग्य, हर पल जनता को छल रहे, पूछता है, यह दुःसाहसी बिपिन, सही में गांधीगिरी पर कौन चल रहे...