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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जिंदगी का सफर

*जिंदगी का सफर* ✍🏽 *बिपिन कुमार चौधरी* आने वाले पल से यहां हर कोई बेखबर है, कहीं जिंदगी में काश, कहीं पर अगर है, बावजूद इसके चलना सभी को इस डगर है, भैया, इसी का नाम जिंदगी का सफर है... एक पल में आती खुशियां एक पल कहर है, सुख दुःख के चौराहों से भरा यह डगर है, अमृत की तलाश में मिलता बहुत जहर है, भैया, इसी का नाम जिंदगी का सफर है... क्षणिक खुशी की खातिर तबाह कई पहर है, अपने देते धोखा, मिलता नया हमसफर है, बढ़ जाते जो लोग आगे, छूटता वह रिश्ता अक्सर है, भैया, इसी का नाम जिंदगी का सफर है, तरक्की की आंधी में गांव बन हमारा शहर है, सुविधाएं बेशुमार, लापता सुकून वाला पहर है, जिनके लिए लूट गया इंसान, वही मचा रहा कहर है, भैया, इसी का नाम जिंदगी का सफर है,

संकट में बच्चों का भविष्य...

संकट में बच्चों का भविष्य... ------------------------------------------- आभाव वश शिक्षक वृत्ति, प्रभाववश मिली स्वीकृति, शिक्षा का हो कैसे उत्थान, बिना प्रवृत्ति और संस्कृति, शिक्षण में दिल लगे नहीं, वर्ग में आते मानो अतिथि, परिणाम शून्य सभी योजनाएं, बिना बदले प्रकृति व प्रवृति, राष्ट्रनिर्माता के गौरव से गर्वित, कर्त्तव्य विमुख बनकर पतित, अपना ही दुखड़ा गाते हैं नित्य, गंभीर संकट में बच्चों का भविष्य,

गरीब हूं

गरीब... साहब, बेशक गरीब हूं, ऐसा वैसा थोड़ी हूं, सबको पसंद आ जाऊं, पैसा थोड़ी हूं, लालच में इंसानियत भुला दूं, इतना लाचार थोड़ी हूं, मेरे दोस्त जरूरत में करना कभी याद, दिल का अमीर हूं... लाख सितम सहता हूं, क्योंकि गरीब हूं, दाने दाने को रहता हूं मोहताज, ऐसा बदनसीब हूं, ईमानदारी की रोटी ही रास आता है, आदमी अजीब हूं, मेहनत से दो रोटी पाकर संतुष्ट रहता हूं, ऐसा खुशनसीब हूं...

घड़ियाली आंसू

*घड़ियाली आंसू* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* चारों तरफ मौत कर रहा तांडव, संकट में जिंदगी, संकट में मानव, दिल व्यथित, विलाप कर रहा है, ना जाने किस गलती का पश्चाताप कर रहा है, अपने अपनों से मिल नहीं पा रहे, अपनों का शव घर भी नहीं ला रहे, सारी उन्नति हमें मुंह चिढ़ा रहा है, प्रकृति हमें हमारी हैसियत बता रहा है, कितने हुए तबाह, कितने आंसू बहा रहे, फिर भी कुछ लोग सियासती अहम दिखा रहे, इंसानिय मौन, नैतिकता शरमा रहा है, मौत अपना विभत्स रूप दिखा रहा है, यह सबक कठोर, सीख है बड़ी, हम मौत से लड़ रहे, उन्हें कुर्सी की पड़ी, इंसान अपनी मूर्खतापूर्ण तरक्की की सजा पा रहा है, इन लाशों की ढेर पर कोई घड़ियाली आंसू बहा रहा है

फलसफा

*फलसफा* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* चांदनी रात में अक्सर, तारों की चमक फिकी नजर आती है, हम चाहे नहीं हो बहुत गुणवान, दुनियां से नजदीकियां, हमारा सम्मान बढ़ाती हैं... अर्श पर चढ़ कर, चाहे लाख हम इतरा लें, फर्श पर अगर पांव हो, तभी बुलंदियां स्थायित्व पाती है, ऊंची उड़ान भरकर, चाहे हम तारा क्यों नहीं बन जाएं, आज भी यह दुनियां, चांद सा प्रियतम पाकर ही इठलाती है,

*नंगा नाच कर रहा अभी काल*

*नंगा नाच कर रहा अभी काल* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* गला घोंटू वायरस ने किया है बबाल, अपनों से पूछते रहें सब लोग हालचाल, किसकी आए बारी, किसका हो जाय बुरा हाल, जाने कोई नहीं, नंगा नाच कर रहा अभी काल, दाल रोटी का संकट, उस पर यह कैसा ताल, गरीबों पर करना मेहरबानी, कमा लेना कभी माल, संकट गंभीर, आरोप प्रत्यारोप कर करो ना बबाल, बढ़ाओ सबका हौंसला, नंगा नाच कर रहा अभी काल, मिलता नहीं जीवन वायु, पैसे वाले भी कंगाल, कितनों का छूटा दम, मचा है चारों ओर भूचाल, किसी ने खोया सुहाग, कितनों ने खोया है लाल,  संभल कर रहें सब, नंगा नाच कर रहा अभी काल, मरना सभी को है, मौत यह बड़ा विकराल, शव होता क्षत विक्षत, परिजन भी पूछते नहीं हाल, गला घोंटू वायरस ने मचाया है ऐसा बबाल, संक्रमण से बचें बचाएं, नंगा नाच कर रहा अभी काल,

सवाल

*सवाल...* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* कोई डर रहा है, कोई मर रहा है, बेटा छोड़ आता है, बाप का लाश अनाथ,  और पूछता है सवाल, सिस्टम क्या कर रहा है ? कोई कर रहा है, कोई भर रहा है, उठाता है जो आवाज,  जेल में सड़ रहा है, कौन पूछता है सवाल, आम आदमी क्या कर रहा है ? कोई खखोर रहा है, कोई बटोर रहा है, गरीब की थाली से, गायब है अनाज, किसकी हिम्मत पूछे सवाल, कौन इनकी गर्दन मड़ोर रहा है ? कोई खोज रहा है, कोई नोच रहा है, प्रतिभा हो रहा कुंठित, खत्म होता नहीं इंतजार, किसे फुरसत कि पूछे सवाल, बेरोजगारों के साथ मजाक क्यों हो रहा है ? कोई सह रहा है,  कोई कुछ नहीं कह रहा है, शरीफों की मौन बस्ती में, दलालों के मन का हो रहा है, किसका उम्मीद, कौन पूछेगा सवाल, आखिर यह सब क्या हो रहा है ?

जनता के मन की बात

*जनता के मन की बात...* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* लाशों से आजकल आ रही है खूब दुर्गंध, किसी का दिल हुआ पत्थर, किसी का मुंह बंद, आंखों का आंसू पोंछने को भी कोई तैयार नहीं, फिर कैसे कह दूं, हमारे सियासी आका गद्दार नहीं, बड़ी शिद्दत से जिन्हें ताज पर बिठाया था, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के सपने सजाया था, आज भी वह, ना जाने क्यों सत्तर साल पर अटकी है ? फिर कैसे कह दूं, हमारी सरकार नहीं भटकी है, विदेशों में परचम लहराने से पहले, हर घर में चूल्हा जलाना जरूरी है, पूंजीपतियों के वर्चस्व से आने वाली समृद्धि है, फिर कैसे न कह दूं, यह मिथ्या प्रसिद्धि है, बदनसीबी हमारी, यह कैसी मजबूरी है, आधी आबादी के लिए दो रुपए में चावल जरूरी है, आंकड़ों की कलाबाजी से सच नहीं बदलता है, फिर कैसे न कह दूं, घोषणापत्र में पाखंड झलकता है, गम नहीं, काला धन वापस नहीं आया, अफसोस देश का धन काला होने से बच नहीं पाया, यहां मिल बांट कर जो लोग इसे खा रहे हैं,  यही लोग दूसरे को गद्दार का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं...

कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे...

कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे... -------------------------------------------------- धान उपजा उपजा कर, हुआ कोई नहीं धनवान, पागल हो जाता वही आदमी, सुनकर चावल का दाम, कैसे कोई खेती करे, किसान कैसे न मरे... डीजल महंगा, खाद महंगा, रोए खूब किसान, गेहूं में घाटा, घर में नहीं आटा, उस पर कहर बरसाए भगवान, कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे... आलू प्याज को मिलता नहीं खरीदार, जब उपजाए किसान, कोल्ड स्टोरेज वाले बन गए करोड़पति, यह कैसा विधान, कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे... साग सब्जी हर घर की जरूरत, बेचना नहीं आसान, किसान को मिले कोड़ी, बाजार में छुए दाम आसमान, कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे, तिलहन उपजा कर तेल निकला, पकड़ा सबने कान, तेल निकाल बने धन्ना सेठ, बनता नहीं बिन इसके पकवान कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे, थाली में पाकर फल मेवा, खुश होते मेहमान, इसकी खेती में भी रिस्क बहुत, मिलता नहीं उचित दाम, कोई कैसे खेती करे, किसान कैसे नहीं मरे... बीबी बच्चे भोजन को रोए, मां बाप बीमारी से हलकान, नेताजी पांच वर्ष में सपने दिखाकर हो जाते अंतर्ध्यान, कोई कैसे खेती करे,...