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अप्रैल, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दिमाग का अंधा

*दिमाग का अंधा* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* बेवजह भौंकना कुछलोगों की  फ़ितरत होती है,  जाबांज के हौसले तोड़ देना, कुछ किये बिना हीं श्रेय लेना, मजलिस में खुद को बलिदानी साबित करना, प...

८४. मेरे अपने @

*मेरे अपने* (घर-परिवार और अपनो से जुड़ कर जीने वालों *शख्स* की आज के मतलबी दुनियाँ में मानसिक व्यथा) ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* तुम्हें मुझसे शिकायत है, मुझे ख़ुद की जिंदगी से .... अपनों से मेरी कोई शिकायत नहीं,  क्योंकि जिसे भी अपना बनाना चाहा, वो मेरा अपना हुआ हीं नहीं। वक्त ने मुझे बहुत तपाया है, गैरों ने नहीं अपनों ने मुझे सताया है, गरीब सही, दिल का शहंशाह हूँ, ये अपने थे, जिन्होंने अक्सर ओकाद बाताया है, छोटे सपने देखने की मुझे आदत नहीं, घूटना टेक देना, मेरी फ़ितरत नहीं, हर पल नई उड़ान भरने का जज़्बा रखता हूँ, ये मेरे अपने हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा मुझे रुलाया है...., मजबूरी उनकी थी, दोष मेरा क्या है, एक भी ऐसा पल बताओ, जब मैंने पीठ दिखाया है, अपनों की आह, गैरों की वाह जिन्हें पसंद है, ऐसे अपनो को मैंने पाया है।

८६. पहेली @

💐        पहेली          💐 ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी जिंदगी एक अजीब पहेली है, सुलझाने की कोशिश करने वाले, अक्सर उलझ जाया करते हैं ... उलझ कर जीने वाले लोग जिंदगी के मजे लेते हैं .... उलझन से हम परेशान होते हैं, ये आनंद उठाने का पल होता है, आज से भले हम निराश नहीं हो ... ये तो बीता पल या आने वाला कल होता है... चुनौतियों का हाथ फैला कर करें स्वागत, क़िस्मत पर इतराने की डाले आदत, किसी को देख कर जले नहीं, शिकवा जिंदगी से बिल्कुल करें नहीं, जरूरतों पर लगाम लगाएं लोगों के मुसीबतों में काम आएं उम्मीद आपको दुःखी करेगा, त्याग आपको संतुष्टि देगा, दिमाग को बोझ से हल्का रखें, परिश्रम एक दिन जरूर रंग लायेगी, आपके उम्मीद से बेहतर कल लायेगी, यही तो है जिंदगी की पहेली...

८९. आदर्श जन प्रतिनिधि @

गरीब-निर्बल-बेसहारा के लिये लड़ता रहूँगा, ✍🏻 नीरज यादव (विधायक, बरारी विधानसभा) जनता की सेवा, मेरा एक मात्र धर्म है, इसलिए विरोधियों में अजीब हड़कम्प है, चापलूसों का भी काफी विरोध है, क्योंकि मुझे अपने कर्तव्यों का बोध है, मैंने अपनी क्षमता के अनुसार यथासंभव काम किया है, चौखट पर आए जरूरतमंद का साथ दिया है, मुसीबतों से परेशान लोगों से बात किया है, गलत लोगों को नज़रंदाज़ किया है, लाचार लोगों के वाणी को आवाज दिया है, हर पल जनता के दर्द को एहसास किया है..., जनता की समस्या का जो विधिसम्मत समाधान करेगा, ऐसे सरकारी कर्मियों का बेशक़ मैं भी सम्मान करूंगा,  मेरे रहते सरकारी दफ्तर में नहीं किसी को शोषण की आजादी, मुझे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं ऐसी अफसरशाही.... सामने कितना भी मुश्किल हो, समस्याएं चाहे कितना भी जटिल हो, एक गलती मैं बार-बार करूंगा, गरीब-निर्बल-बेसहारा के लिये लड़ता रहूँगा,

शिक्षकों की नेतागिरी

शिक्षक नेता ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी नेतागिरी के चक्कर में, कुछ शिक्षकों के काल हो गये,  कुछ कमाल हो गये, कुछ क्लर्क के दलाल हो गये ... शिक्षा से नाता तोड़ लिया है, अफसरों का करीबी हो...

८८. सफ़लता कदम चूमती रहे @

सफ़लता नित्य कदम चूमती रहे ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी किसी की खुशियों का क़त्ल हुअा था, एक मासूम बच्चा जब अपने घर से बेदख़ल हुअा था, कई दिनों तक आँखो से अश्रुधारा रुकती नहीं थी, हंसमुखी चेहरे पर मुस्कान दिखती नहीं थी ... वक्त के साथ उसने समझौता कर लिया था, नए शहर में नए लोगों से रिश्ता जोड़ लिया था, लड़कपन में माँ के हाथों का निवाला भी नसीब नहीं था, भाई के महत्वाकांक्षा तले दबा बचपन बदनसीब था ... पिता की मजबूरी, जरूरतों पर भारी थी, कक्षा में अव्वल आने की अजीब लड़ाई थी ... धन और साधन खूब अभाव था, मुस्कुरा कर गम छुपाने का बेहतरीन स्वभाव था... हाथ फ़ैलाने की आदत नहीं थी, घर के मुसीबतों से राहत नहीं थी, लोगों की ग़लतियाँ नजरंदाज करता था, वक्त के ढ़ाए सितम हंस कर बर्दाश्त करता था जिद्द और जुनून से मुसीबत हार गया, सफ़लता का डंका, संसार में हुंकार गया, वक्त जानता है, मेधा का हुअा है सम्मान... सफ़लता नित्य कदमों को चूमती रहे, यही ईश्वर से आह्वान .....

९१. यही मन का विश्वास है @

My one of the best poem यही मन का विश्वास है ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी कोई दिवास्वप्न में मग्न है, कोई करता बहुत जत्न है, दिल की गहराइयों में जिसके स्वप्न  है, जग करता उसका अभिनंदन है .. राह कठिन, संघर्ष जटिल, ये कर्मभूमि की पहचान है, अंगारों पर जिसने चलना सीखा, जग में वही महान है... वाद-विवाद, जिंदगी बरबाद, ईश्वर से भी लोग निराश है, इम्तिहान का जिसने किया सामना, वही सिकंदर जाबांज है... संघर्ष त्याग का बलिदान मांगती है, परिश्रम और समर्पण का ज्ञान मांगती है, सत्यपथ की डगर बहुत मुश्किल है, मानवता मनुष्य से समाधान मांगती है ... पराजय  से जिसने मुंह फेर लिया स्वयं के पुरुषार्थ पर जिनका नहीं भरोसा कृष्ण भी उसे मार्ग दिखा नहीं सकता इन्द्र भी उसे विजय बना नहीं सकता यही कालजयी पुरुषार्थ है, यही मन का विश्वास है,