*मेरे अपने* (घर-परिवार और अपनो से जुड़ कर जीने वालों *शख्स* की आज के मतलबी दुनियाँ में मानसिक व्यथा) ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* तुम्हें मुझसे शिकायत है, मुझे ख़ुद की जिंदगी से .... अपनों से मेरी कोई शिकायत नहीं, क्योंकि जिसे भी अपना बनाना चाहा, वो मेरा अपना हुआ हीं नहीं। वक्त ने मुझे बहुत तपाया है, गैरों ने नहीं अपनों ने मुझे सताया है, गरीब सही, दिल का शहंशाह हूँ, ये अपने थे, जिन्होंने अक्सर ओकाद बाताया है, छोटे सपने देखने की मुझे आदत नहीं, घूटना टेक देना, मेरी फ़ितरत नहीं, हर पल नई उड़ान भरने का जज़्बा रखता हूँ, ये मेरे अपने हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा मुझे रुलाया है...., मजबूरी उनकी थी, दोष मेरा क्या है, एक भी ऐसा पल बताओ, जब मैंने पीठ दिखाया है, अपनों की आह, गैरों की वाह जिन्हें पसंद है, ऐसे अपनो को मैंने पाया है।