आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी आज फ़िर एक तूफ़ान आया है, ख़ून-पसीने से सींची गई अरमान सिसक रही है, जिंदगी में घुटन-पीड़ा का उफान आया है, अन्नदाता के उम्मीदों को श्मशान बनाया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... जिन पर बीत रही उनका हाले दिल क्या बताऊँ, ख़ुद के हलक से नेवाला गटकना हो रहा मुश्किल, उस महापुरुष को नेवाला कैसे खिलाऊँ, माँ धरा रो रही, आसमां भी रो रहा है, ऐसा यह वक्त हैवान आया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... जिस हरियाली को देख सीना चौड़ा हो जाता था, प्रकृति के कहर ने दिल पर हथौड़ा चलाया है, आंखो के सैलाब से आत्मा रो रही है, आश्रितों की उदासी, महाजन के तगादे ने आत्महत्या का पैगाम लाया है, आज फ़िर एक तूफ़ान आया है... ऊपर का भगवान रूठा है, नीचे वाला झूठा है, मजबूरी की आँधी ने ईमान का आबरू लूटा है, घर के जन की मत पूछिये, जानवर भी भूखा है, अस्तित्व संकट में, ऐसा इम्तिहान आया है ... आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ... अश्रुधारा सुखी भी नहीं, बेगैरतों ने क़ब्जे का फ़रमान भिजवाया है, स्त्री धन पहले हीं हो चुका स्वाहा, कोई पूजा न दान काम आया है, मालिक आज क्रूर ...