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जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नया दीपक जलाना है...

अंधेरे की काली बदरी को आज नहीं तो कल मिट जाना है, जिद्द सिर्फ इतनी रहे कि हमें प्रकाश की रौशनी में नहाना है, हवा हो चाहे कितनी तेज, परिस्थितियां हो भले बहुत विकराल, बिना वक्त गंवाए, बिना थके हर पल एक नया दीपक जलाना है, नया दीपक जलाना है...

सैलाब

इश्क की गहराई में डूबने वाला मतवाला होता है, सारी दुनियां के खुशियों के बीच भी आंख भिंगोता है, आंख से दर्द का दरिया बहे तो मत रोकना दोस्त, यह रुका दरिया अक्सर सैलाब बन कर डुबोता है,

हमनवा

हमनवा बनकर आने वाले अक्सर जो हमदम नहीं बनते हैं। हमनशीं की तरह दिल में रहकर वो  दिलनशीं याद बहुत आते हैं, मयकदा में मैकश बनकर मयकशी से भी यह दर्द कम होता नहीं, बेरहम, बेखबर ऐसे संगदिल यादों की जन्नत में ही खुश रहते हैं,

ज़ख्म

ए दोस्त, गमों की दरिया में डूबकर भी मुस्कुरा कर चलिए, यहां खिलखिलाते चेहरे पर भी कई चेहरे लगे हैं, अपने जख्मों को हर जगह यूं बेपर्दा मत कीजिए, महलम आसानी से कहां मिलता है, सबके घर नमक जरूर रखे हैं...

बिछड़ा प्यार

बिछड़ा प्यार बड़े शौक से खुद ही खुद को मिट्टी में मिलाया था, जिसे भुलाना नामुमकिन है, उसे ही भुलाया था, आज जिंदगी का तिजौरी खाली देख क्यों गमजदा हूं, किस जलजले में इतनी हिम्मत, यह आग मैंने ही लगाया था, सफ़र में हमसफर का साथ छूट जाना मुमकिन है, बैचेन क्यों होना, रात के बाद फिर आना दिन है, मगर अगर पता हो, फिर होगी नहीं उनसे मुलाकात, इस दर्द की दवा सिर्फ कठिन नहीं नामुमकिन है, सफर चाहे जितना कठिन हो, मंजिल भी हो भले ही दूर, इतनी रहमत खुदा जरूर बख्सना, हमसफर रहे ना दूर, तेरी  इतनी इनायत से सारी खुशियां मयस्सर हो जाती है, आदमी भले पग पग कांटों पर चले, होता नहीं कभी मजबूर

मजाकिया इश्क

मजाकिया इश्क शर्तों के ढ़ेर पर मुझे बिठाकर मेरे वजूद को तलाश रहे हैं। शर्तों ने वजूद मिटा दिया, अब मुझे छलिया बता रहे हैं।। आंखों का आंसू सुख चुका, ख्वाइशों का चिता भी जल गया। आजकल सरेआम वह शख्स, मेरे दिल को पत्थर बता रहे हैं।। खुद को बदलते बदलते, अपनी ही नजरों में काफिर बन गया। बड़ी शिद्दत से वही शख्स, मुझे मोहब्बत का धर्म बता रहे हैं।। जिस इश्क में डूबकर मैंने सबकुछ गंवाना सिख लिया था। प्यार के उन्हीं पवित्र उसूलों का मुझे सबक सीखा रहे हैं।। महलों के मोहब्बत से तुलना कर जिसने किया शर्मसार। आजकल मेरे अंदर प्यार के चिथड़ों को तलाश रहे हैं ।। अपनी शर्तों के वज्रगृह से बाहर निकलने का फुरसत नहीं। मेरे जज्बातों को हर पल आंख दिखा मुझे पाना चाह रहे हैं।। जिस दुनियां की परवाह, मैंने वर्षों पहले छोड़ दिया था, उसी दुनियां की दुहाई देकर मुझे बदलना चाह रहे हैं, अपनी दुनियां में मैंने जिसे दिया बहुत ऊंचा मुकाम, वही मेरी जन्नत को मुख्तक्सर वीरान बना रहे हैं,

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार इस देश में क्यों नहीं मिटता है भ्रष्टाचार, इसी तलाश में निकलता है कई बेरोजगार, जैसे ही मिलता है उसे देश का भ्रष्टाचार,  तत्काल नतमस्तक होकर शुरू करता है व्यापार, इस प्रकार पाते हैं यहां कई लोग रोजगार, और नशे में मदमस्त भ्रष्टाचार चलता है बीच बाजार, लालच जब इसके दुश्मनों का बहुत बढ़ जाता है, बड़े शिद्दत से बनाने लगते हैं यही लोग सरकार, जड़ें इसकी बहुत मजबूत, लाचारों पर करता है वार, आइए अपनी जान बचाएं, जहां मिले करें नमस्कार... © बिपिन कुमार चौधरी

ना जाने हम क्या ढूंढते हैं...

ना जाने हम क्या ढूंढते हैं... ---------------------------------------------------- लगा कर शहर में आग, हम बरसात ढूंढते हैं, कोहिनूर के ढ़ेर को करके बर्बाद, खाक ढूंढते हैं, अपनी तरक्की का ढिंढोरा क्या खूब पीट रहे हैं, जो नेमतें थी जन्मजात, वही इन्तेज़मात ढूढते हैं... खुद ही बना कर जहन्नुम, कायनात ढूंढते हैं, निज कुकर्मों से आई कयामत का इलाज ढूंढते हैं, अंजाम से भयभीत, शरीर पीला, हलक सुखा, इंसानियत भूला कर, इंसानी जज्बात ढूंढते हैं, लालच में गंवा कर सुकून भरा एहसास ढूंढते हैं, बैचेन करने वाला भूख और प्यास ढूंढते हैं, मखमली सेज पर हम रात भर बैचेन रह कर, पुरुषोत्तम राम, माता जानकी वाला वनवास ढूंढते हैं, करके अथाह अर्जन, अब बुद्ध वाला संन्यास ढूंढते हैं, आखिर क्यों नहीं हम अपना स्वर्णिम इतिहास ढूंढते हैं, पश्चिमी सभ्यता की नकल में हमने बहुत कुछ गंवा दिया, ढूंढना चाहिए हमें क्या और ना जाने हम क्या ढूंढते हैं,

सत्ता

कोई सत्ता पाने के लिए, हिंदू होने का करता है ढोंग, कोई बिना रोजा किए, इफ्तार के लिए करे औन पौन, आस्था के साथ यूं ही होता रहता है बेरहम खिलवाड़, भावनाओं में बह हम करते सत्यानाश, किसे समझाए कौन, यहां हर किसी को किसी न किसी वजह से अफसोस है, हर किसी के शिकायतों को सुनकर भी वह रहता खामोश है, जिंदगी भर हम ख्वाइशों के समंदर में डूब कर मरते रहते हैं, हमारे अरमानों के बोझ तले कितने दुखी, किसी को नहीं अफ़सोस है,