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सितंबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

४३. जिंदगी का बोझ @

जिंदगी का बोझ ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी माना कंधे पर थोड़ा कम वजन है, बचपन की ख्वाहिशें भी दफन है, खुश हूं क्योंकि बदन से दूर कफन है, छोटी उम्र लेकिन हौसला मेरा बुलंद है... मेरी उम्र के बच्चे अक्सर रो लेते हैं, निश्चिंत होकर बेफिक्र सो लेते हैं, मैं सिर्फ क़िस्मत को गालियां दे लेता हूं, अपने पसीने से पेट की आग बुझा लेता हूं... मेरा बोझ देख दया बहुतों को आती है, कामचोर शराबी बाप को मां बहुत समझाती है, मेरे कमाए पैसों को यहां वहां छिपाती है, यही पीड़ा मेरे होंसले को बहुत रुलाती है ... मैं धीरे - धीरे रोना भी भूल गया हूं, वक्त के जालिम झूलों पर झुल गया हूं, कष्ट पहुंचा कर मैं भी अब खुश हो लेता हूं, दुनिया ने जो मुझे दिया वही उसे देता हूं ... मुझे किसी से मदद की उम्मीद नहीं है, मेरे जैसा हौसले का कोई अमीर नहीं है, मुझ पर दुनिया वाले बिल्कुल दया नहीं दिखाना, वक्त ने सिखा दिया है मुझे जिंदगी का बोझ उठाना...

४४. सफलता का बहाना @

सफलता का बहाना ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी लोगों के तानों से तंग इन्हीं तानों से तना, बुनता रहा मैं जिंदगी का ताना बाना, नहीं मेरी परेशानियां खत्म हुई और नहीं ताना, हकीकत मेरे हिस्से आई और जमाने का हो गया अफसाना ... इन तानों के चटकारे में हकीकत बना अफसाना, सबको पहचान कर भी बनना पड़ा मुझे अनजाना, मेरा हौंसला देख फ़िर भी हैरत में है ज़माना, तेरी इसी हैरानी को देख खुश है यह संघर्ष का दीवाना... सलाम तेरे हुनर को सलामत रहे तेरा ताना, जख्मों पर नमक छिड़कने में अव्वल तुं हो जाना, ऊपर वाले मुझ पर सिर्फ इतनी रहमत तुम फरमाना, कठिन हालातों में भी विचलित न कर सके मुझे कोई ताना... मेरी मजबूरियों का मज़ाक सोच समझकर बनाना, कोई मजबूर ऐसा नहीं जिसे ताना मारती नहीं ज़माना, इन ताने मारने वालों के बस में नहीं कोई जिंदगी सजाना, और हम जैसे पागल बनाते हैं इसे सफलता का बहाना,