जिंदगी का बोझ ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी माना कंधे पर थोड़ा कम वजन है, बचपन की ख्वाहिशें भी दफन है, खुश हूं क्योंकि बदन से दूर कफन है, छोटी उम्र लेकिन हौसला मेरा बुलंद है... मेरी उम्र के बच्चे अक्सर रो लेते हैं, निश्चिंत होकर बेफिक्र सो लेते हैं, मैं सिर्फ क़िस्मत को गालियां दे लेता हूं, अपने पसीने से पेट की आग बुझा लेता हूं... मेरा बोझ देख दया बहुतों को आती है, कामचोर शराबी बाप को मां बहुत समझाती है, मेरे कमाए पैसों को यहां वहां छिपाती है, यही पीड़ा मेरे होंसले को बहुत रुलाती है ... मैं धीरे - धीरे रोना भी भूल गया हूं, वक्त के जालिम झूलों पर झुल गया हूं, कष्ट पहुंचा कर मैं भी अब खुश हो लेता हूं, दुनिया ने जो मुझे दिया वही उसे देता हूं ... मुझे किसी से मदद की उम्मीद नहीं है, मेरे जैसा हौसले का कोई अमीर नहीं है, मुझ पर दुनिया वाले बिल्कुल दया नहीं दिखाना, वक्त ने सिखा दिया है मुझे जिंदगी का बोझ उठाना...