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६४. याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ... @

याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुकम्मल सजा पायेगा... 👍 बिपिन कुमार चौधरी सत्ता की मदहोशी में कोई इस कदर झूमा है, जिनके रहमोकरम से इसे हासिल किया वही आज अनसुना है, पांच वर्ष बाद फ़िर मेरे हीं दर पर आएगा, याद रख, अपनी गुनाहों का तूं  मुकम्मल सजा पाएगा ... जिसे तूं आजकल आँधी बता रहा है, अपनी खुशी से फूला नहीं समा रहा है, तेरे कर्मों से बहुत जल्द ऐसा आँधी फ़िर आयेगा, याद रख अपने गुनाहों का तूं  मुक्कमल सजा पाएगा ... हम अक्सर रहगुजर पर भी तकिया डाल कर सो जाते हैं, अपनी क़िस्मत ऐसी है तेरे जैसों के लिये तख़्त सजाते हैं, अपने हीं किये वादों को अगर भूल जाएगा, याद रख अपने गुनाहों का तूं  मुक्कमल सजा पायेगा ... हमारी यह क़िस्मत हमें इसी तरह रोना है, नई उम्मीद में फ़िर नई फ़सल बोना है, धरती माँ की कृपा से नई सुबह आयेगा, याद रख अपने गुनाहों की तूं  मुक्कमल सजा पायेगा ... जाति धर्म में बंटा हूँ, इसलिए मिली यह सजा है, एक बार नहीं, इन्हीं लोगों ने कई बार ठगा है, नई पीढ़ी एक दिन नई क्रांति लेकर आयेगा, याद रख अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा  पायेगा ... दोनों हाथ जो...

सत्ता संग जनता भी गुनाहगार रहेगा ...

सत्ता संग जनता भी गुनाहगार रहेगा ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी हाँ, मैं एक शिक्षक हूँ, बच्चों को पढ़ाना कर्तव्य हमारा, शिक्षा के अलख से जब नहीं सजेगा बचपन,  भारत जगतगुरू फ़िर कैसे बनेगा .... शिक्षा जगत में होने वाले खिलवाड़ का,  सत्ता संग जनता भी गुनाहगार रहेगा ... नई पीढ़ी को सजाने का करते हम जतन,  निज परेशानी से विचलित रहता है मन,  बड़ी कठिनाई के बीच गुजरता यह जीवन,  मानवता के फलदार वृक्ष को सींचने का प्रयत्न बेकार रहेगा , शिक्षा जगत में होने वाले खिलवाड़ का,  सत्ता संग जनता भी गुनाहगार रहेगा ... हमसे  भी अगर कोई कमी रह जायेगी,  यह समाज भी जि़म्मेदार रहेगा,  शिक्षा से वंचित लोगों का बेहाल रहेगा परिवार,  लोकतंत्र के मठाधीशों की जिंदगी गुलजा़र रहेगा,  शिक्षा जगत में होने वाले खिलवाड़ का,  सत्ता संग जनता भी गुनाहगार रहेगा ... पढ़ाई हो गयी इतनी महँगी,  बच्चों को पढ़ाएं या घर लाएं रोटी, राष्ट्रप्रेम के वंचित यौवन से अपने लोगों का बहेगा लहू,   भेद-भाव वाली शिक्षा से क्या स...

७४. फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ... @

फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी एक स्वराज का आँधी आया था, फ़िरंगी ताकत को जड़ से मिटाया था, शोषण और दमन के स्याह का पटाक्षेप करने, भारत माँ के सपूतों ने ख़ून की नदियाँ बहाया था ... बच्चे-बूढ़े, मजदूर-किसान, मातृशक्ति हो या ग़रीब घर का नौजवान, सबकी आँखे चमक उठी थी, लोकतंत्र के मठाधीश करेंगे सब समाधान... उषा की इस नई बेला में, नेतागीरी की इस झमेला में, हिंदु-मुस्लिम, मंदिर मस्जि़द पर देश हमारा अटका है, अमर शहीद स्वर्ग में सोच रहे लोकतंत्र कहाँ ये भटका है ... भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है, जमीन से जुड़ी जनता का नहीं यहाँ कोई सुनने वाला है, लोकतंत्र के मठाधीशो ने न्याय के पर को भी क़तर डाला है, आम आदमी आज भी निर्बल,  सिस्टम गड़बड़झाला है ... विकास का दिवास्वप्न दिखाने वाले, ख़ुद को जनता का मसीहा बताने वाले, जुबां शहद सा मीठा और दिल तुम्हारा क़ाला है, तेरे कुकर्मों का हिसाब करने, फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ...