*अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष प्रस्तुति* *हमें चाहिए आजादी* खूब सजाए हमने सपने उम्रभर, टूटते देखा, दिल पर पत्थर रखकर, किसे दिखाऊं, इन अरमानों का खंडहर, मौन रही प्रतिबंधों की दीवारों में घूट घूट कर, बचपन गुजरा भेदभाव में सिमटकर, किशोरवास्था सामाजिक वर्जनाओं में तड़पकर, हमारे मन की कहां किसी को सुनने की फुर्सत, दुनियां ने किया पसंद मुझे रंग रूप देखकर, दया माया की मूरत बनती रही तपकर, अत्याचार और शोषण, सहे तो कबतक, हमें हमारा गर्व और स्वाभिमान लौटा दो, अपने नजरिए को बदल हमें सबला बना दो, आजादी के सफर में भी सबका मान रखेंगे, अपने से जुड़े सभी भावनाओं का ध्यान रखेंगे, पंख फैला कर खुले आसमान में उड़ने दो, तंग गलियों से निकल सबका कल्याण करेंगे... ✍🏻 *विपिन वियान हिंदुस्तानी* *कटिहार, बिहार*