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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

क्रांति दूत करे आह्वान

क्रांति दूत करे आह्वान क्रांति दूत करे आह्वान, क्या ऋतुराज बसन्त, क्या मनमोहक सावन, सत्य न्याय के लिए संघर्ष, संकल्प दृढ़, लक्ष्य पावन, बाधाएं अनंत, भयभीत दुर्जन, बलिदान का नित्य होवे हवन, कठिन डगर, पुलकित सुमन, द्वार खुला, सभी का अभिवादन, जीवन दुर्गम, भीरू का निश्चित पलायन, क्रांति दूत फिर भी करे आह्वान, करो संघर्ष या प्राप्त करो पतन, मानव योनि में अगर पाया जीवन, जिंदगी जीने का तुम करो जतन, मिट्टी का काया, होगा इसी में दफन, फिर किस बात से भयभीत तेरा मन, आओ भरें हुंकार, याद करेगा वतन, निर्बल लाचारों का स्नेह और आशीष, सफल हो जायेगा तेरा सात जन्म, मार्ग सरल नहीं, स्वतंत्र हो तुम करो पलायन, आंखो में आंसू, सिस्टम से विलाप, एक मार्ग क्रांति दूजा पश्चाताप, आओ करें संघर्ष, बन्द करो प्रलाप, जन सरोकार से आओ करें  वार्तालाप, हाथों से हाथ मिलाना होगा, क्रांति का बिगुल बजाना होगा, निराश मन में अलख जगाना होगा, संघर्ष का हिम्मत जुटाना होगा, सबके जीवन में तभी आयेगी, खुशहाली, अमन, चैन और शांति, जय जन क्रांति, जय जन क्रांति...

देशकाल

देशकाल @ बिपिन कुमार चौधरी गरीबों का शोषण, अमीरों का ख्याल, सत्ता की संस्कृति, मनोवृत्ति और चाल, ईमानदारी की बांसुरी बजाने वाले कंगाल, राजदरबार में मलाई खाता चापलूस, दलाल... चरण वंदना का नाटक, लोकतंत्र का मायाजाल, पांच वर्ष में सेवक पूछने आते जनता का हाल, संग रहता जाति धर्म का ठेकेदार वाचाल, भविष्य के मायावी सपने, झूठे वादों का ताल, जनता के आंखों का आंसू पूछे एक ही सवाल, वोट मेरा पाकर तूं बन बैठा वीआईपी कैसे कंगाल, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार की आस में हम बेहाल, तेरे बाप को लगी लॉटरी, पांच वर्ष में तूं मालामाल, पैसों वालों के लिए अलग स्कूल, अलग अस्पताल, हमारे जीवन की कीमत नहीं, सरकारी शिक्षा बेहाल, बेहतर रोजगार की चाहत में हमारी जिंदगी फटेहाल, फिर भी खुश हैं, कोटा में पाकर गेहूं चावल, दाल, हर छोटी छोटी बातों पर होता देश में बबाल, जनता के सेवक से ज्यादा कोई नहीं खुशहाल, राजनीति में कोई दुश्मन नहीं, पूछते सबका हालचाल सरकारी निर्माण में बंदरबांट का यह सब कमाल,

आख़िर राम मंदिर निर्माण से किसी को क्या है परेशानी...

आख़िर राम मंदिर निर्माण से किसी को क्या है परेशानी... -------------------------------------------------- बड़े दिनों बाद हो रहा, राम मंदिर का निर्माण, बड़े दिनों बाद हो रहा, बहुसंख्यक भावनाओं का सम्मान, बड़े दिनों बाद हो रहा, एक जटिल समस्या का निदान, हैरान हूं देखकर, देश में क्यों मचा है, एक अजीब घमासान, किसी का जबरन धर्म नहीं बदला है, कर्म नहीं बदला है, हमारे राम हैं बहुत दयालु, उनके भक्त नहीं इतने हैवान, फिर भी चारों ओर शोर बहुत है, आख़िर कैसा यह तूफान, ग़रीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और महामारी, किसानों की लाचारी, परेशान है कारोबारी, राम मंदिर नहीं बने तो क्या ख़त्म हो जायेगी सारी बीमारी, समस्याएं बहुत है, कुछ नई कुछ पुरानी, काश्मीरी पंडितो के आंखो का आंसू और दर्दनाक कहानी, तुष्टिकरण की राजनीति और सत्ता की मनमानी, राम मंदिर का विरोध और हरकतें बचकानी, दिल में दबा गुस्सा और मानो खून बना था पानी, सत्ता के सिरमौर बने, कुछ लोग थे खानदानी, वक्त ने थोड़ा करवट क्या लिया, आंखो में आ गया पानी, माना समस्याएं बहुत है लेकिन बनाओ नहीं झूठी कहानी, हमारा किसी से बैर नहीं, हमसे बैर करने वालों की खैर नहीं,...

नया बहाना...

नया बहाना... ---------------------------------------------- दूर रहूं तो मेरे अपने तड़पते हैं, पास रहूं तो मैं खुद तड़पता हूं, मेरे मासुम बच्चे इतने अक्लमंद हैं, वो अपनी भूख और मैं आंसू छिपाता हूं... घर लौट आया था कि वापस नहीं जाऊंगा, पत्नी पूछती है, बच्चों को कैसे खिलाऊंगा, बूढ़े मां बाप बस एक कोने में ख़ामोश हैं, परदेश में मौत का भय, सिर्फ यही अफसोस है, कामचोर नहीं हूं साहब, काम देकर देखो, ईमान बेचा नहीं है, उसी का ईनाम देकर देखो, इंसानियत का ढोल पिटते हो, इंसान बन कर देखो, हम जैसों की आखरी उम्मीद, हमारा भगवान बन देखो, हमें पता है, प्रवासी श्रमिक ही नियति हमारी,  क्योंकि नीयत कुछ लोगों की ठीक नहीं है, किस अन्तर्द्वंद में जीवन घुट घुट कर काटता हूं, लफ़्ज़ों में बयां करना उसे मुमकिन नहीं है, पांच वर्ष में ख़ूब खेल तमाशे होते हैं, परदेश में हम पग पग अपमान सहते हैं, हमारी मजबूरियों पर मातम मत मनाना, हमें बेवकूफ बनाने का खोज लाना नया बहाना...

अरमानों का निजीकरण ...

अरमानों का निजीकरण ... ------------------------------------------------ सरस्वती के मंदिर में, धनवानों का डेरा है, लक्ष्मी की कृपा से वंचित, जीवन में अंधेरा है, सरकारी विद्यालयों में कई योजनाओं का बसेरा है, भेदभाव ग्रसित शिक्षकों को हीन भावना ने घेरा है, समानता का अधिकार फिर यह कैसा फेरा है, शिक्षा दान करने वालों के जीवन में अंधियारा है, निजीकरण का कुचक्र, गरीबों का मुश्किल गुज़ारा है, अच्छे दिनों की चक्की में पीस रहा जनता बेचारा है, सेवा की गुणवत्ता सिर्फ एक छलावा है, जियो का फोर जी स्पीड ने यही बताया है, पूंजीपतियों के हाथों में सत्ता का केंद्रीयकरण, चंदा का गन्दा खेल, वोट बैंक का ध्रुवीकरण, योग्यता करेगा सिर्फ दरबानी, कुबेर करेगा राज, अब भी नहीं जगे हम, होंगे दाने दाने को मोहताज...

उन्मुक्त रहे हमारी स्वतंत्रता...

उन्मुक्त रहे हमारी स्वतंत्रता महत्वाकांक्षा की धूमिल काली बदरी, खोज रहे लाल, नीयत जिनकी गुदड़ी, चतुराई की बिसात ओढ़े सरलता की चुनड़ी, दिखाए चंडी का रूप, जिनका अंतर्मन घमंडी, उन्मुक्तता जिनका राग, उन्मुक्त जिसकी जिंदगी, आंख बन्द करते जिनपर विश्वास साथी - सं शिकंजे में बांधने की कोशिश, देखना स्वप्न सतरंगी, कैसे बने काफ़िला, आदमी जब खुद हो मतलबी, त्याग की बंशी, सहयोग का सुर ताल, निज स्वार्थ की ओट में नहीं करना बबाल, चालाकियों के कोष से रहे बिल्कुल कंगाल, नतमस्तक होते वहीं, हम जैसे कई कंगाल, शान शौकत, ऐशन फ़ैशन से नहीं हमारा वास्ता, हमें भाये सर्वजन हित, चाहे दुर्गम हो रास्ता, दौलत शोहरत के बुंलदियों की ख्वाहिश नहीं, उमनुक्तता हमारी पहचान, उन्मुक्त रहे हमारी स्वतंत्रता...

सुकून

सुकून ------------------------------------------------ रोजी रोटी का फिकर, भागते रहे लोग दर ब दर, छोड़ आये गांव की मिट्टी व गोबर, खुश हैं स्लम बस्तियों में पाकर घर, बिजली बत्ती की चकाचौंध, हर घर में जहां एसी और कूलर, फिर भी कौन पूछे उनके दिल से, गांव की यादें ताज़ा होती घुट घुट कर, बासी खाना खाने वाले देहाती, खाते हरी सब्जी फ्रिज में सड़ाकर, छोटी बातों में घर में मेला लगने से परेशान, बहुत खुश हैं व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाकर, पक्की सड़कों का जाल बहुत है, छोटे बच्चे रहते पिंजरों में कैद होकर, खेत खलिहानों में मद मस्त घूमने वाले, पलक झपकते खा जाते हैं ठोकर, मर्ज बड़ा, अस्पताल भी हैं जहां बड़े बड़े, अजनबी लोगों की भीड़ कोई जिये चाहे मरे, दवा मिल जाती है लेकिन हवा नहीं मिलती, खुशी लाख मिल जाये, सुकून नहीं मिलती...

वोट डालने जरूर जाना...

वोट डालने जरूर जाना ... फिजिकल में रिस्क बहुत है, डिजीटल का आया जमाना, कुर्सी का लालच ही ऐसा, दिल माने नहीं कोई बहाना, वर्चुअल रैली का आया दौड़, एक ही मकसद वोटर पटाना, प्रवासी श्रमिकों पर जब थी आफत, डिजीटल लोगों का मर गया था नाना, संकट का बादल मंडरा रहा, मौत का डर सबको सता रहा, चिकित्सा सुविधाओं की हालत पतली, भगवान भरोसे अब तो जीना मरना, लोकतंत्र के मालिक बजाओ ताली, किस्मत पर रोओ या दो तुम गाली, एक बात बिल्कुल भूला नहीं जाना, जिंदा बच गए तो वोट डालने जरूर जाना...