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फ़रवरी, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

साजिश

हर उम्मीद पर यहां पानी फिर जाता है, नोचने को गिद्धों में युद्ध छिड़ जाता है, शिकवा और शिकायत हम करें तो किससे, मद्धिम सी किरण, साजिशों में घिर जाता है,

गांव से निकला, छोरा मस्तमोला*

*गांव से निकला, छोरा मस्तमोला* गांव से निकला, छोरा मस्तमोला, साथ में सपनों का एक बड़ा बोझ, कब होगी नौकरी, कब कमाओगे रुपया, पूछे फोन पर सब यहां हर कोई रोज, दिल का हाल, यहां किसे बताएं, सबको लगे शहर में काट रहे हम मौज, सतुआ खिचड़ी खा कर रहे खूब प्रयास,  हर रिजल्ट बाद देते खुद को खूब दोष, रोना धोना कहां सीखा हमने, दुनियां को दिखाना है जोश, हम गंवारों का मत उड़ाओ मजाक, एक झटके में हम उड़ा देंगे सबका होश... ✍🏻 *कवि विपिन वियान 'हिंदुस्तानी'*

किस किस का नाम

नाम.... (गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि मन का दर्दनाक उदगार) सियासत का स्याही न जाने क्यों इतना दागदार होता है, मिलता नहीं उसे हक जो सरल सज्जन, ईमानदार होता है, यहां चीलों के लिए लाशों का शिद्दत से ढेर सजाया जाता है, गुमनाम हो जाते हैं वीर शहीद जिसका मुल्क कर्जदार होता है। गली, सड़क, नगर चौराहे सभी पर लोगों ने नाम लिखवा लिया, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी पर भी अपना परचम लहरा दिया, भगत, राजगुरु, चंद्रशेखर, सुभाष का नाम यहां कहां मिलता है, देश की सारी योजनाओं के आगे किस किस का नाम लगा दिया,