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पिता का छत्रछाया

पिता का छाया  (कहानी) ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी एक लड़की के जन्म लेते हीं सबसे ज्यादा ज़िम्मेदारी का भार एक पिता के ऊपर हीं आ जाता है। समय कितना भी बदल गया हो लेकिन एक लड़की की जिंदगी का भविष्य आज भी सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पिता की क्या हैसियत है और उसका पिता अपनी लड़की के सुरक्षित और उज्जवल भविष्य के लिये कितना धन खर्च करने की इच्छा रखता है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो उस लड़की का होता है जिसके सिर पर पिता का छत्रछाया हीं नहीं हो। सुगंधा एक पढ़ी लिखी और समझदार लड़की है। भगवान ने भले हीं उसे बहुत सुंदर काया नहीं दिया हो लेकिन थोड़े छोटे कद की वह एक आकर्षक महिला है। दिल उसका बिल्कुल निश्छल और उम्र के हिसाब से थोड़ा बच्चा है। अपने आस-पास के लोगों का ख्याल रखना और दूसरे के गम से तुरंत गमगीन हो जाना उसके स्वभाव की सबसे बड़ी खासियत है। किसी पर भी भरोसा कर लेना और घर आने-जाने वाले लोगों की खातिरदारी में तुरंत तल्लीन हो जाना उसे सभी के बीच लोकप्रिय बनाता है। इन सबके बीच एक कसक जो उसे अंदर हीं अंदर सालती है वह है उसकी अपनों से उन उम्मीदों का पहाड़ जो एक बिना बाप के लड़की की शायद हीं पूरी होती...