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११९. गुमान *

गुमान ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी उन्हें बहुत गुमां है, रब ने खूबसूरत बनाया है, कृपा उनपर पर रब की है, इसलिये हमने भी तारीफ़ फ़रमाया है... दुनियाँ से अलग हम इतना हीं गुनहगार  हैं,  हमने वह किया जिसका रब हक़दार है, ग़लत मायने निकाल कर यूं कीचड़ ना उछालो, शराफ़त ख़त्म होने से पहले ख़ुद को संभालो ... तुम जैसे कितने गुमांवाले आये औऱ गये, जिस नजर से देखा हम वैसा हीं बन गये, मेरा दिल कोई धर्मशाला नहीं है, यह कोई दिलफ़ेंक मजनू मतवाला नहीं है ... हमारी पसंद बन जाना, इतना भी आसान नहीं है, गुमां वालों की मैं गुलामी करूं, ऐसा इस दिल का कोई अरमान नहीं है ... इस दिल में जिसने जगह बनाया था, रब ने बड़े फुरसत में उसे बनाया था, हालात ने कुछ यूं मुँह फ़ेर लिया, मेरे चाँद को बुरे वक्त के बादलों ने घेर लिया... मैं जानता हूँ, ऐसा कोई पूर्णिमा अब नहीं आयेगा, मेरे दिल को न सिर्फ़ मजनू मतवाला बनायेगा, जिसे देख तेरा गुमान गुमनाम हो जायेगा...