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६५. लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... @

लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

बडे़ शौक से जिनके सिर दिया ताज,
बड़ी बेरहमी से उन्होंने दबाई जनता की आवाज,
अब समझ आया सबसे बेहतर विकल्प नोटा है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

जाति, धर्म के नाम पर जिसने किया वोट,
अपनी फ़रियाद अनसुनी किये जाने से आंसू बहाये रोज,
लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़, आख़िर जनता क्यों रोता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है  ...

महापर्व के जश्न में हमने निर्धन को किया अनसुना,
खेती किसानी लूट गयी, महँगाई हो गयी दूना,
अब क्यों भगवान को इसका जिम्मेदार तूं बताता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

निरंकुश प्रसाशन, ईमानदारी लाचार,
मेधा मुश्किल में, युवा बेरोजगार,
हम काटते वही हैं, मानव जैसा बोता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है...

खैरात पाकर जिन्होंने की सुखद अनुभूति,
विकास चक्र का किया इसी ने दुर्गति,
अपने राष्ट्र के भविष्य के लिये अब क्यों चिंतित होता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है . ..

काली कमाई तुमने कमाया व्यापार में,
मत भूलो छोड़ कर जाओगे सब इसी संसार में,
राष्ट्रहित ऐसे देशवासी के कर्मों पर आंसू बहाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

गुंडे-मवालियों से सुशोभित होकर सदन,
अपनी आबरू बचाने को करता कठिन जतन,
धनबल बाहुबल को भी अपने सिर बिठाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

जिनसे गलबहियां कर गुजारे समय कठिन,  
जिनके सहयोग बिन घर-गृहस्थी का चलना नामुमकिन,
किसी के षड्यंत्र में उसे भी अपना दुश्मन बनाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

न्याय की आश, अन्याय से संबंध,
बुद्धिजीवी निज हित में लिखे नित्य निबंध,
कलम हुई गुलाम, सोशल मीडिया अफ़वाह उड़ाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

आजादी के लिये जिन्होंने बहाया अपना ख़ून,
देशवासियों ने ही उनकी विचारधारा का कर दिया ख़ून,
उपेक्षित वर्ग अपनी लाचारी पर आंसू बहाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

अपने हीं पुत्रों के स्वार्थ-बेड़ियों में जकड़ी माँ भारती,
अपने पुत्रों को चिरनिद्रा से जगने को पुकारती,
आख़िर किस मजबूरी में कर्मवीर के वंशज ने किया यह समझौता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...

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