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१३१. माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... @

माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी पुरुषोत्तम राम की धरती पर मचा  हाहाकार है,  आधुनिकता में काफी पिछे छूट गया संसार है,  संवेदनाएं मृत हुई ऐसा बदला मानवीय व्यवहार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन के नजरों से घायल भारतीय संस्कार है .. अतिथि देवो भवः, सबसे बड़ा धर्म परोपकार है,  इस पावन धरती पर कुसंस्कृति का कलुषित अत्याचार है,  मानसिक दरिद्रता से नष्ट हुई, मानवता लाचार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... दीपमालाओं से सजा कर जहाँ मनाया जाता त्यौहार है,  साधु-संतो की सेवा, निर्धन को दान जहाँ धर्म का आधार है,  मोह माया के त्याग का पाखंड करने वालों के मन में अब व्यभिचार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजरों से घायल भारतीय संस्कार है ... पूज्यनीय जहाँ नदी-तालाब, मूर्ति संग पूजा जाता मूर्तिकार है, पशु-पक्षी संग नाग देवता भी श्रद्धा से प्राप्त करता आहार है,  सृष्टि में मानव के सृजनकर्ता माँ-बाप की उपलब्धि बेकार है,  माँ भारती चिंतित, किस डायन की नजर...

६५. लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... @

लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बडे़ शौक से जिनके सिर दिया ताज, बड़ी बेरहमी से उन्होंने दबाई जनता की आवाज, अब समझ आया सबसे बेहतर विकल्प नोटा है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... जाति, धर्म के नाम पर जिसने किया वोट, अपनी फ़रियाद अनसुनी किये जाने से आंसू बहाये रोज, लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़, आख़िर जनता क्यों रोता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है  ... महापर्व के जश्न में हमने निर्धन को किया अनसुना, खेती किसानी लूट गयी, महँगाई हो गयी दूना, अब क्यों भगवान को इसका जिम्मेदार तूं बताता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ... निरंकुश प्रसाशन, ईमानदारी लाचार, मेधा मुश्किल में, युवा बेरोजगार, हम काटते वही हैं, मानव जैसा बोता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है... खैरात पाकर जिन्होंने की सुखद अनुभूति, विकास चक्र का किया इसी ने दुर्गति, अपने राष्ट्र के भविष्य के लिये अब क्यों चिंतित होता है, लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है . .. काली...

६७. लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... @

लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी सत्ता का न्याय से यह कैसा गठजोड़, न्याय के चक्कर में जनता लगा रही भाग-दौड़, सिपाही मांगे भीख, काला कोर्ट बोले दिल मांगे मोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर .... धारा की अटकलबाजी, न्याय ना मिले किसी ओर, तारीख़ पर तारीख़, जनता का जाये दिल तोड़, लाचारी देख खुशी मनाये चोर ... ऊपर का भगवान जब हो रूठा, नीचे सज्जन को ना मिले ठौर, बिन धन-बल कोई जब ना सुने, न्याय की आश जनता देती छोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर... मंदिर का भगवान रूठा, दलितों का सम्मान लूटा, जनता उलझी इसी बात में, अजान मचाए  क्यों शोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... आया जब चुनाव नजदीक, नेताओं ने पीड़ित के घर लागाया दौड़, अखबारों के पन्ने रंग गये, जनता ने उसी को बनाया मोर, लाचारी देख खुशी मनाये चोर... राजसिंहासन पर सुशोभित जब हुअा चोर, देश का खजाना ख़ाली हुअा, जनता चैन की बंसी बजाए चारो ओर..., लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... नौकर नौकरी बांट रहा, मेधा किनारे, वोट बैंक छांट रहा, युवा दिनरात खोजे आरक्षण का तोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर, मत को अपना बेच...

६८. याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ... @

याद रखना मैं आम इन्सान हूँ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी मेरे पिछे साजिश करने वालों, तुम्हें कैसे लगता है, मैं अनजान हूँ, तेरी गुनाहों की मिलेगी मुक्कमल सजा, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ... इस गफलत में बेशक तुम बहुत ख़ुश रहो, कुर्सी पाकर लगता है, मैं भगवान हूँ, यह क़िस्मत तेरी, मैं अभी मेहरबान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ... अभी ख़ुद की उलझनों से परेशान हूँ, मजबूरी के हाथों बिक कर बेईमान हूँ, तेरी हुकूमत का यह असर शैतान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ... दिनकर और दुष्यंत की मैं जुबान हूँ, अपनी हद में आकर एक पल सोच तूं जरा, मैं हर पीड़ का अंतिम समाधान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ... अधूरा रह गया वो अरमान हूँ, सिसक रही जिंदगी, बेजुबान हूँ, हर क्रांति के पीछे का आह्वान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ... अपनी क़िस्मत पर यूं नहीं इतराओ, तेरी नियत से बिल्कुल हैरान हूँ, जल्द लाने वाला कोई तूफ़ान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ... इतिहास के पन्नों को कभी उलट कर देखना, अनंत पापियों का इकलौता व्यवधान हूँ, कितने सिकंदर को पहुँचाया कब्रिस्तान हूँ, याद रखना मैं आम इन्सा...

६९. इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...@

इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी इंसान से इन्सान,  इतना क्यों है परेशान, निज स्वार्थ में बना ऐसा हैवान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... क़ीमत लगाओ बिकाऊ ईमान, थानेदार और क्लर्क पर अंगुली मत उठाओ, यहाँ तो हर कुर्सी है बईमान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... सफ़ेद लिबास के अंदर का भगवान, डोनेशन पैरवी के बल लिया कमान, बच गये तुम्हारी किस्मत, वर्ना जि़म्मेदार भगवान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान... सजाया गया बड़ा-बड़ा दुकान, मिलता कहीं नहीं है ईमान, मिलावट कर मिलावट से मर रहा इन्सान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... उपदेश देते बनने का राम, हनीप्रीत की तलाश में बने आशाराम, साधु-संत भी हैं परेशान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान... सत्ता की कुर्सी, अवार्ड, सम्मान, बड़ी दूर इनसे ईमान, चापलूसी-चमचागिरी से क़िस्मत मेहरबान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... पैसा मजहब, यही चारों धाम, यही करता सबका कल्याण, इसकी कृपा से वंचित ईमान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ... पॉकेट की गर्मी, शहद जुबान, फटेहाली में मालिक है भगवान, न्याय जिसकी दासी, उदास ईमान, इंसानियत ख़ुद है आज हैरा...

७०. आंसू ग़म का पहचान होता है ... @

आंसू ग़म का पहचान होता है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी बच्चों का रोना, पूरी रात नहीं सोना, माँ के लिये कठिन इम्तिहान होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... दुधमुंहे बच्चे के दर्द को समझना, बिना बोले मुसीबत से निबटना, वाकई मातृशक्ति महान होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... हर मांग पूरी करने के लिये जीना, उसकी ख़ुशी के लिये बहाना पसीना, बेहद कठिन काम होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... अनिष्ट के ख्याल से मन विचलित होना, किसी की सफ़लता के लिये ख़ुद नहीं सोना, जिंदगी ताउम्र परेशान होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... उम्र पौधे को सींचने में खोना, उसी के दिये गम से तन्हाई में रोना, जिंदगी जहन्नुम इसका नाम होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... गैरों पर रहम, अपनों पर सितम, अपना ख़ून हीं गम से अनजान होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... बूढ़ा पेड़ और बूढ़ी गाय, बगिया की रौनक नहीं असहाय, इनकी दुआ से जिंदगी मेहरबान होता है, आंसू गम का पहचान होता है ... आंसू का समंदर, होकर औलाद बेखबर, कभी चैन की नींद नहीं सोता है, आंसू गम का पहचान होता है ... बुढ़ापे की लाठी, जन्मभू...

७१. बहुत बड़ा यह है राज @

बहुत बड़ा यह है राज ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी दाने-दाने को मोहताज़, सिर पर अन्नदाता का ताज, आमदनी क्यों हो जाती है सिफर, बहुत बड़ा यह है राज ... मुर्गे के बांग से पहले, पहुंच करता दिन रात काज, बच्चे भूखे क्यों रह जाते उनके, बहुत बड़ा यह है राज ... जिनके पुरुषार्थ के बल पेट भरता समाज, जिनके परिश्रम पर राष्ट्र को नाज, आत्महत्या के ख़ून से रंगा क्यों उनका इतिहास, बहुत बड़ा यह है राज ... पूस की रात, सवा शेर गेहूँ, आंसू बहाता बुद्धिजीवी समाज, आख़िर क्यों इतने दयनीय हालात, बहुत बड़ा यह है राज ... मंच पर जिनके दर्द का कर बखान, चढ़ी जिन्होंने राजनीति की ऊंची उड़ान, हतप्रभ क्यों नहीं इनकी नियति से आज, बहुत बड़ा यह है राज ... ईश्वर की क्रूरता सबसे ज्यादा शिकार, फ़िर भी करता नित्य परोपकार, काम आयी नहीं मंदिर की आरती और नमाज बहुत बड़ा यह है राज ...

शिक्षक बंधु को यूं मूर्ख नहीं बनाओ ...

शिक्षक बंधु को यूं मूर्ख नहीं बनाओ ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी संघ-संघ का गीत हम सबने बहुत गाया, सत्ता और स्याह कोट ने इसी का फायदा उठाया ... सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई को किसी ने नह...

७२. ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ... १

ऐसे कर्मवीर को हीं सफ़लता मिलता है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी पथ के पथिक लक्ष्य की तलाश में, कर्मभूमि पर सफ़लता की प्यास में, जीवनपथ के कठिन राह पर निरंतर चलता है, ऐसे हीं कर्मवीर को सफलता मिलता है ... जिद्द के जुनून, संघर्ष की आग में, हालात के विघ्न, प्रतिस्पर्द्धा के संसार में, हर पल तूफ़ान में दीपक की तरह जलता है, ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ... चुनौतियों के समंदर, बाधाओं की रार में, असफ़लता के भी भयावह घनघोर अंधकार में, अपने पथ से तनिक नहीं टलता है , ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ... कर्तव्यों के बोझ, षड्यंत्र के व्यापार में, कलुषित राजनीती व भ्रष्टाचार के बाज़ार में, अपने ईश्वर पर अडिग भरोसा करता है, ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ... सूर्य की तपिश, आमवश्या की अँधेरी रात में, ज्वालामुखी के विध्वंस, सुनामी के हाहाकार में, अपने आत्मबल को फ़िर भी स्थिर रखता है, ऐसे हीं कर्मवीर को सफलता मिलता है ... दुर्जन की दुष्टता, सज्जन के प्रभाव में, सहयोग और साधन के बिल्कुल अभाव में, जुगनू की तरह अँधेरे से निरंतर लड़ता है, ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ... ...

४०. ऐसी ममता को नित्य नमन (निभा पत्रिका) @

ऐसी ममता को नित्य नमन ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी माँ के ममता की छाँव है अनमोल,  इससे बढ़कर नहीं कोई स्वर्ग और भवन,  तेरे आशीषपूर्ण स्पर्श से हर जाए सारे दुःख,  ऐसी ममता क़ो नित्य नमन .... इनके कठिन संघर्ष का मुश्किल वर्णन,  इनके त्याग का कठिन विवरण,  संतान की ख़ुशी के लिये सर्वस्व त्याग दे,  ऐसी ममता क़ो नित्य नमन ... धड़कन की आवाज भी जिनकी देन है, जिसने इस सुंदर संसार में क्या हमारा सृजन,  जिनके दूध का कर्जदार शरीर का कण-कण, ऐसी ममता को नित्य नमन ... ऊंचाई चाहे जितनी कर ले हम हासिल,  छू ले क्यों ना चाहे हम गगन,  जिनकी गोद में खेला हमारा बचपन,  ऐसी ममता को नित्य नमन ... हमारी छोटी सफलता से पुलकित जिसका मन,  सबसे ज्यादा हमारी सफलता से मनाता हो जश्न,  कर्जदार उसका यह शरीर और यौवन,  ऐसी ममता को नित्य नमन ... इस सृष्टि में अगर हो जाएं हम दफन,  मेरी मौत से पहले, ख़ुद के लिये मांगे कफ़न,  अपने कलेजे के टुकड़े के लिये करे सर्वस्व अर्पण,  ऐसी ममता को नित्य नमन ...

७४. फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ... @

फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी एक स्वराज का आँधी आया था, फ़िरंगी ताकत को जड़ से मिटाया था, शोषण और दमन के स्याह का पटाक्षेप करने, भारत माँ के सपूतों ने ख़ून की नदियाँ बहाया था ... बच्चे-बूढ़े, मजदूर-किसान, मातृशक्ति हो या ग़रीब घर का नौजवान, सबकी आँखे चमक उठी थी, लोकतंत्र के मठाधीश करेंगे सब समाधान... उषा की इस नई बेला में, नेतागीरी की इस झमेला में, हिंदु-मुस्लिम, मंदिर मस्जि़द पर देश हमारा अटका है, अमर शहीद स्वर्ग में सोच रहे लोकतंत्र कहाँ ये भटका है ... भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है, जमीन से जुड़ी जनता का नहीं यहाँ कोई सुनने वाला है, लोकतंत्र के मठाधीशो ने न्याय के पर को भी क़तर डाला है, आम आदमी आज भी निर्बल,  सिस्टम गड़बड़झाला है ... विकास का दिवास्वप्न दिखाने वाले, ख़ुद को जनता का मसीहा बताने वाले, जुबां शहद सा मीठा और दिल तुम्हारा क़ाला है, तेरे कुकर्मों का हिसाब करने, फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ...

७५. समस्या है गंभीर, करना होगा चिंतन ... @

समस्या है गंभीर, करना होगा चिंतन ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी चारों ओर घमासान हाहाकार, प्रकृति करती मानवता से पुकार, ऐसी तरक्की को है धिक्कार, मानव-अस्तित्व मुक्त जो करे संसार... जीवन के लिये अनमोल है पानी, इसके बग़ैर बड़ी मुश्किल जिन्दगानी, पेय जल के दुरुपयोग की मनमानी, परेशान है बचपन, तंग जवानी ... गंभीर समस्या बना जल प्रदूषण, पर्यावरणविद कर रहे गंभीर मंथन, विकास कर रहा नित्य विनाश का सृजन, भविष्य क्या वर्तमान में भी व्याकुल  जीवन... कितने विलुप्त हो गए, कितनों का संकट में है जीवन, निज स्वार्थ में प्रकृति का दमन, यही मूर्खता नष्ट कर देगा यह उपवन ... पीने का पानी है अनमोल रत्न, इसके संरक्षण का करें जतन, इसके अभाव मे मुश्किल जीवन, समस्या है गंभीर, करना होगा चिंतन ...

संघर्ष से भागने को तैयार हम नहीं हैं ...

संघर्ष से भागने को तैयार हम भी नहीं हैं.... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी      (BPNPSS MUL,कटिहार) अगर है सेल्फी का विरोध, खुल कर सामने आइए .. जुबानी जंग से हालात नहीं सुधरेंगे, संघर्ष में कंधा से कं...

७६. गृहस्थ माँझी @

गृहस्थ माँझी ✍ बिपिन कुमार चौधरी रिश्तों का डोर, खींचे कई ओर ... परेशानी वाला मोड़, दिल देता है तोड़ ... वक्त की नजाकत, भरोसे  की ताकत, अपनों के साथ दावत, हर इंसान की है चाहत ... जिम्मदारी का एहसास, ईश्वर पर विश्वास, चिंता से बेफिक्री, खुशनुमा बनाता है आज ... जीवन की चुनौती, गैरों से अपनोती, दिल छूने वाली आवाज, पूजता है समाज ... उम्मीद का टीला, तोड़े शांति का क़िला, रखते ख़ुद पर जो भरोसा, नहीं करते किसी से शिकवा-गीला .. मुसीबतों की आँधी, बनना ग़रीबी में गाँधी, लोकाचार के इसी कर्मपथ में नाव खेता है गृहस्थ माँझी..

दिल से निकाल फ़ेंकना इतना जरूरी भी नहीं है ...

दिल से उसे निकाल फेंकना जरूरी भी  नहीं है ... ✍🏻  बिपिन कुमार चौधरी ग़म तुम्हारा बहुत कम है, आँखें मेरी भी तो नम है, हालातों से लड़ के दिखाओ, अगर तेरे प्यार में भी इतना हीं दम है ... शा...

दिल लगाने का अभी जज़्बा जिंदा है ..

दिल लगाने का जिंदा अभी जज़्बा है ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी वो यादों में रहती है, वो ख्वाबों में रहती है, मन की गहराइयों में जिसका डेरा है, वो दिल के किताबों में रहती है, बिना कुछ पूछे, वह सब जानती थी, अल्फाजों की क्या बात करूं, मेरी आहट भी पहचानती थी... मेरी जिंदगी से जब हुई रुखसत, तन्हाइयों का डेरा है, खुशनुमा ख़्वाब विदा हो चुके हैं, जिंदगी में मायूसी का बसेरा है ... यादें आजकल इंसाफ़ माँगती है, वादे जवाब बेहिसाब मांगती है, वफ़ा करना मेरे लिये आसां नहीं था, मेरे दिल के धड़कन में बसने वाली भी यह बात जानती है... रब से मेरी इतनी मिन्नत है, जिस हाल में जहाँ भी मेरी जन्नत है, वक्त के दिए जख्मों को भुलाए रखना, उसकी जिंदगी को खुशियों से सजाए रखना.. वक्त ने जख्मों को भर दिया है, हालात ने आरजू का क़त्ल कर दिया है, जिंदगी तुमसे कोई शिकवा नहीं, तुमसे दिल लगाने का अभी  जज़्बा जिंदा है...

ग़लती

ग़लती ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी (BPNPSS MUL, कटिहार) आप तो चले थे, किसी का कारवां मजबूत बनाने, कारवां मजबूत होते हीं, वो लोग लगे आपको आँख दिखाने ... आपने जीतना चाहा उसका भरोसा, जिसके ख़ुद का को...

७७.युवाओं का जगना होगा ... @

युवाओं को जगना होगा ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी षडयंत्र का आलम ऐसा है, आदमी जो बन नहीं सका, इंसानियत का जिसने माखौल उड़ाया, लोगों के बीच बना बैठा देवता है... अश्रुधारा उन्हें दिखती नहीं है, आलोचना जिन्हें पचती नहीं है, समाजसेवा को जिन्होंने व्यापार बना डाला, कोई सामाजिक कार्यक्रम उनके बग़ैर सजती नहीं है ... आमजन मायूस है, सत्ताभोगीयों के उल्लास में, विपक्ष ख़त्म करने की हो रही है साजिश, पहली बार भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ... देशभक्ति पर आयी है आफ़त, सिर चढ़ बोल रहा अंधभक्तों की ख़ुराफ़ात, भूल गये लोकतंत्र ने दी यह ताकत, कुछ लोगों के अय्याश में देशद्रोही बनाया गया हूँ, अपने लोगों को न्याय दिलाने के प्रयास में ... बग़ावत की आँधी आएगी, माँ भारती फ़िर अलख जलाएगी, अपने हीं कुकर्मों से नष्ट हो जाएंगे, लोकतंत्र नष्ट करने की मिथ्या विश्वास में, युवाओं को जगना होगा, अपनी आवाज बुलंद करने के प्रयास में ...

७८. तांडव बहुत मचाऊंगा @

तांडव बहुत मचाऊंगा .... (वर्तमान सामजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के विरुद्ध युवाओं का क्रांति गीत) ✍🏻   बिपिन कुमार चौधरी कुछ लोग कवि कहते हैं, कुछ मुझको कहते हैं ढोंगी.. उन आँखों का मैं क्या करूं , जिनके पीछे का दिलो-दिमाग है मन का रोगी ... इंकलाब आएगा, संग्राम अभी बांकी है, मेरे पंखों से मत जलो, इम्तिहान मेरा बांकी है.. समस्या का समाधान बाँकी है, अभी हमारा उड़ान बांकी है ... मोह-माया में फंसा हूँ, जुबां इसलिए मेरी बंद है, उस खेल का मैं भी माहिर खिलाड़ी हूँ, जिसका नाम शतरंज है, मेरी कमजोरी का तुमने, फायदा बहुत उठाया है, हक जिसपर तुम्हारा नहीं था, उसे भी तुमने हथियाया है, खैरात किसी का नहीं था ये आजादी, अपने पूर्वजों के मेहनत का फल हमने पाया है, अब भी सुधर जाओ आप, पहले हीं बहुत सताया है .... मानवता के लिये मैं तैयार होकर आऊंगा, सावधान हो जाओ छलियों, रणभेरी की जब बजेगी आवाज, तांडव बहुत मचाऊंगा ....

हाँ हम सेल्फी के लिये तैयार हैं

हाँ हम सेल्फी के लिये तैयार हैं.... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी      (BPNPSS,MUL कटिहार) हाँ हम सेल्फी के लिये तैयार हैं, अपने कर्तव्य को पुरा करने को बेक़रार हैं,  घर-परिवार की जिम्मदारी पूरी कर...