लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी सत्ता का न्याय से यह कैसा गठजोड़, न्याय के चक्कर में जनता लगा रही भाग-दौड़, सिपाही मांगे भीख, काला कोर्ट बोले दिल मांगे मोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर .... धारा की अटकलबाजी, न्याय ना मिले किसी ओर, तारीख़ पर तारीख़, जनता का जाये दिल तोड़, लाचारी देख खुशी मनाये चोर ... ऊपर का भगवान जब हो रूठा, नीचे सज्जन को ना मिले ठौर, बिन धन-बल कोई जब ना सुने, न्याय की आश जनता देती छोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर... मंदिर का भगवान रूठा, दलितों का सम्मान लूटा, जनता उलझी इसी बात में, अजान मचाए क्यों शोर, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... आया जब चुनाव नजदीक, नेताओं ने पीड़ित के घर लागाया दौड़, अखबारों के पन्ने रंग गये, जनता ने उसी को बनाया मोर, लाचारी देख खुशी मनाये चोर... राजसिंहासन पर सुशोभित जब हुअा चोर, देश का खजाना ख़ाली हुअा, जनता चैन की बंसी बजाए चारो ओर..., लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ... नौकर नौकरी बांट रहा, मेधा किनारे, वोट बैंक छांट रहा, युवा दिनरात खोजे आरक्षण का तोड़, लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर, मत को अपना बेच...