*चुनावी भिखारी* ✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी* आज दर पर एक पुराना भिखारी आया था, मक्के की रोटी संग सरसों का साग खाया था, इन्द्रा आवास संग वृद्धापेंशन का कभी सपना दिखाया था, चुनावी बयार ने पाँच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था .... काकी के चरणों पर लोट-पोट शरमाया था, कैंची सी जुबां वाली काकी को देख घबराया था, चरणों से उठा काकी ने खाट पर बिठाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था, कमबख्त के चेहरे को देख बेटा तूफ़ान था, सरकारी दफ़्तरों में ठोकर खा-खा कर परेशान था, बदसलूकी ना कर भिखारियों से काकी ने समझाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद भिखारी बनाया था ... भोजन संग आशीर्वाद पाकर भिखारी गदगद था, संस्कारों के बंधन में काकी ने दबाया नफ़रत था, बेशर्मों के बादशाह ने ख़ुद को महान बताया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ... सामने खड़ी एक पगली थी, कालिख पोत भिखारी संग मनाई होली थी, बात बड़ी नहीं भिखारी ने बाथरूम आलीशान बनवाया था, चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ... शरीफों की बस्ती में एक पागल ने कुछ ऐसा कर दिया, क़लम के सिपाहियों...