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५७. शक्की बीबी @

शक्की बीबी
(हास्य कविता)

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

बीमारी का बहाना बनाकर,
अपने कुछ नखरे दिखाकर,
मेरे संडे को ख़राब करने की उसने ठानी थी,
बड़ी अजीब उसकी मनमानी थी...

कूलर से गर्म हवा आ रही थी,
गर्मी से ज्यादा बीवी का डर सता रही थी,
कर्म फुट गये इस निठल्ले को पाकर,
ऐसा हीं पड़ोसन को बता रही थी,

आते हीं सिर पर चढ़ कर बोली,
तुमसे खाना भी ठीक से बनता नहीं,
झाड़ू-पोंछे के लिये मौजूद है नौकरानी,
कपड़े अब तक क्यों धोये नहीं,
कूलर में कब  भरागे  पानी ...

बंदा मैं भी हाजिर जवाब था,
नौकरानी का कर रहा हिसाब था,
मालिक बनने की मेरी कोई ख्वाजाईश नहीं,
मैं तुम्हारी हीं नौकरानी के पास था...

बीवी का माथा हुअा गर्म,
आती नहीं है तुमको शर्म,
तनख्वाह मैंने कब कर दिया भुगतान,
ख़ूबसूरत बीवी के रहते करते हो ऐसा काम...

आज मैंने भी मौका पाया था,
गाय समझ कर साड़ पाया था,
कभी कहती हो करने को काम,
कभी लगती हो लगाने इल्जाम,

मैं तेरे झांसे नहीं आने वाला हूँ,
काम के डर से नहीं भागने वाला हूँ,
तुमसे भली यह नौकरानी है,
कूलर में उसने भर दिया पानी है,
जाओ जा कर करो आराम,
मुझे करने दो नौकरानी संग काम,

बीवी का चेहरा हैरान है,
मैं कर लूंगी जो बचा काम है,
जाओ जाकर धोनी की batting देखो,
टूटेगी टांग ज्यादा डोरे ना फेंको,
तबियत मेरी इतनी ख़राब नहीं,
मेरी खुशियों का तो कोई हिसाब नहीं .....

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