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४५. मेरे अपने जो रूठ गये @

मेरे अपने जो रूठ गये ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी शिकायत तो सबको मुझसे है,  तुम्हें है तो क्या बात हुई, आज तक किसी की शिकायत खत्म ना हुई, मैं थक गया और आधी जिंदगी बर्बाद हुई ... बेशक मुझसे कोई खुश नहीं है, मुझे खुश रखने का प्रयास कितनों ने किया है,  सारी जिंदगी में दूसरों को खुश रखने का प्रयास करूं, क्या इस धरती पर मैंने इसलिए जन्म लिया है... अपने दुख का लोग खूब ढोल पीटते हैं,  अपने गिरेबान में यहां झांकने की किसी को फुर्सत नहीं है, शिकायती लोगों से मैंने यूं ही दूरियां बना ली है, हर किसी के शिकायत को दूर करना अब मेरी आदत नहीं है... बहुत लोग पहले से रूठे हैं, कुछ और लोग रूठ जाएंगे, फिकर जिन्हें मेरी है वह आज भी मेरे साथ हैं, अफ़सोस क्यों करूं कुछ मतलबी लोग और भी टूट जाएंगे ... अकेलेपन से अब मुझे डर नहीं लगता है, हां आस्तीन के सांपों से बहुत डरता हूं, हर किसी को दिल में अब मैं नहीं बसाता हूँ, जो दिल में बसता है  उसी के लिये जीता- मरता हूं ...