अपने प्रियतम से विरह की पीड़ा,
साधुओं के पाखंड का पूज्यनीय लीला,
सत्संग में मिथ्यावादियों का शिकवा गीला,
मानव मस्तिष्क स्वतंत्र हीं पवित्र, सशक्त अकेला ....
ज्ञान की लालसा, बुद्ध का आरण्यक वास,
माया की इच्छा अपने धन का आंशिक त्याग,
पुण्य-प्राप्ति की लालसा में करना उपवास,
ब्राह्मणवाद से कुंठित विद्वता, दिग्भ्रमित बुद्धिजीवी समाज ....
ईश्वर की साधना, जन्मदाता की आराधना,
आश्रित का पोषण, भिक्षुक की पूर्ण मनोकामना,
मित्रों का सहयोग, निर्बल को नहीं दुत्कारना,
सफ़ल गृहस्थी, यही श्रेष्ठ ईश्वर वंदना...
दिल में बैर, जुबां पर मीठी वाणी,
विचलित मन ख़ुशहाल जिंदगानी,
कपटी मन जरूरत बनाये दिवानी,
सिर्फ मेरी नहीं संपूर्ण जग की यही कहानी ....
वही सबसे दोषी जिसकी मीठी नहीं वाणी,
सरल स्वभाव, मुश्किल यहाँ जिन्दगानी,
विघ्नों का डेरा, जग का दस्तूर हैवानी,
प्रफुल्लित मेरा मन, नहीं करना इंसानियत से बईमानी ...
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