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६१. इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...@

इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... ✍🏻  बिपिन कुमार चौधरी उन्हें रब से भी शिक़ायत है, रब के बंदों से भी शिक़ायत है, अपने कर्मों से कोई गीला शिकवा नहीं, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... जीवन हाथी पर बैठा महावत है, सृष्टि में सबसे सुंदर यह इनायत है, चींटी भी वक्त पर करता बगावत है, अहंकार के मद में ऊंचाई खोता महावत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... दूसरों की तरक्की देख मन आहत है, सब कुछ पाकर भी हमें नहीं राहत है, चाहतों के मकड़जाल में फंसा इंसानियत है, ईश्वर को शबरी के जूठे बैर की चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है माना कि जिंदगी में बहुत कमी है, फ़िर भी कब हमारी जिंदगी रुकी है, जिसे हम हासिल कर चुके, दूसरों की सिर्फ चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... अपने बच्चों के मनमानी में हम हीं सबसे बडे़ रूकावट हैं, यही वक्त की सबसे गूढ़ नजाकत है, हम जिस रब के बच्चे उनकी भी कुछ चाहत है, इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ... अपने मन से नहीं कर्मों के हिसाब से मांगो, दूसरों के दोष को तबेला के खूंटी में टांगों, फ़िर चारों ओर स्वर्ग सी यह इनायत है,...

६२. जरूरतों की यारी स्वार्थवश यह मेला है ... @

जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है  ... ✍🏻  बिपिन कुमार चौधरी अपनों से धोखा खाये लोगों का कारवां निकला है, हर घर ख़ाली हुअा, हर कोई अकेला है, उम्मीदें आसमां पर है, सब निज स्वार्थ का झमेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... जिन्होंने जन्म दिया, वह भी ख़ुश नहीं है, जिसने सल्तनत पाया कम उसका भी दुःख नहीं है, जिंदगी की भीड़ में तंगदिल अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... पुत्र परेशान, पिता भी हैरान है, किसी के सपने टूटे हैं, किसी ने दुःख बहुत झेला है, किसी ने किया नाउम्मीद, कोई बुढ़ापे में अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... माँ को भी शिक़ायत है, बहन भी बहुत नाराज है, आरोपों से छलनी यह जग तबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... अर्धांगिनी की क़िस्मत फूटी है, पतियों का शिकायत भी अलबेला है, सबकी भावनाओं से यहाँ सबने खेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... चाहतों पर अंकुश, संतुष्टि का ख़्यालात, निःस्वार्थ सहयोग की भावना, ईश्वर पर विश्वास, शांति का मरहम यह असर अलबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश...