जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी अपनों से धोखा खाये लोगों का कारवां निकला है, हर घर ख़ाली हुअा, हर कोई अकेला है, उम्मीदें आसमां पर है, सब निज स्वार्थ का झमेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... जिन्होंने जन्म दिया, वह भी ख़ुश नहीं है, जिसने सल्तनत पाया कम उसका भी दुःख नहीं है, जिंदगी की भीड़ में तंगदिल अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... पुत्र परेशान, पिता भी हैरान है, किसी के सपने टूटे हैं, किसी ने दुःख बहुत झेला है, किसी ने किया नाउम्मीद, कोई बुढ़ापे में अकेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... माँ को भी शिक़ायत है, बहन भी बहुत नाराज है, आरोपों से छलनी यह जग तबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है... अर्धांगिनी की क़िस्मत फूटी है, पतियों का शिकायत भी अलबेला है, सबकी भावनाओं से यहाँ सबने खेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ... चाहतों पर अंकुश, संतुष्टि का ख़्यालात, निःस्वार्थ सहयोग की भावना, ईश्वर पर विश्वास, शांति का मरहम यह असर अलबेला है, जरूरतों की यारी, स्वार्थवश...