सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

शिक्षक बंधु को यूं मूर्ख नहीं बनाओ ...

शिक्षक बंधु को यूं मूर्ख नहीं बनाओ ...

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

संघ-संघ का गीत हम सबने बहुत गाया,
सत्ता और स्याह कोट ने इसी का फायदा उठाया ...
सम्मान और स्वाभिमान की लड़ाई को किसी ने नहीं,
सभी संघों के मठाधीशों के अभिमान ने हराया ...

हमें मतलब नहीं,
किसने क्या खाया क्या पचाया,
अपनी नाक लंबी रखने के चक्कर में,
शिक्षक समाज के नाक को कटवाया ...

हाई कोर्ट के न्याय पर जब अंगुली उठाया,
ये लोग किसी लालच में एक मंच पर नहीं आया,
हमने हरबार नादानी को सिर पर उठाया,
इसी नादानी ने हमें मूर्ख बनाया ...

बैनर ढोने में हमने बहुत समय है गवाया,
क्रांति के शंखनाद का अब समय है आया,
शिक्षक एकता आज है समय का बुलावा,
करे कोई किसी संघ का महिमामंडन,  है यह छलावा...

मांग एक संघ अनेक,
भेद इसका हमें समझाओ,
पद-प्रतिष्ठा के लोभ में,
शिक्षक बंधु को यूं मूर्ख नहीं बनाओ ....

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पिता का छत्रछाया

पिता का छाया  (कहानी) ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी एक लड़की के जन्म लेते हीं सबसे ज्यादा ज़िम्मेदारी का भार एक पिता के ऊपर हीं आ जाता है। समय कितना भी बदल गया हो लेकिन एक लड़की की जिंदगी का भविष्य आज भी सिर्फ इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पिता की क्या हैसियत है और उसका पिता अपनी लड़की के सुरक्षित और उज्जवल भविष्य के लिये कितना धन खर्च करने की इच्छा रखता है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो उस लड़की का होता है जिसके सिर पर पिता का छत्रछाया हीं नहीं हो। सुगंधा एक पढ़ी लिखी और समझदार लड़की है। भगवान ने भले हीं उसे बहुत सुंदर काया नहीं दिया हो लेकिन थोड़े छोटे कद की वह एक आकर्षक महिला है। दिल उसका बिल्कुल निश्छल और उम्र के हिसाब से थोड़ा बच्चा है। अपने आस-पास के लोगों का ख्याल रखना और दूसरे के गम से तुरंत गमगीन हो जाना उसके स्वभाव की सबसे बड़ी खासियत है। किसी पर भी भरोसा कर लेना और घर आने-जाने वाले लोगों की खातिरदारी में तुरंत तल्लीन हो जाना उसे सभी के बीच लोकप्रिय बनाता है। इन सबके बीच एक कसक जो उसे अंदर हीं अंदर सालती है वह है उसकी अपनों से उन उम्मीदों का पहाड़ जो एक बिना बाप के लड़की की शायद हीं पूरी होती...

वाग्देवी का आशीष

वाग्देवी का आशीष भांति भांति के लोग यहां, भांति भांति के विचार, सोच, समझ कीजिए भरोसा, परखिए मिश्री, फिटकरी का व्यवहार, मान सबको प्यारा लगे, मार्गदर्शन करे अपमान, मूर्ख धनानंद की धृष्टता, मौर्य का हुआ उत्थान, बदनामी से डरिये नहीं , बदगुमानी है बड़ा रोग, नित्य आगे बढ़ते रहिये, विजय रहस्य है मनोयोग, संवाद में बहुत शक्ति है, विवाद करे ऊर्जा ह्रास, समय कीजिए नहीं व्यर्थ, कीजिए नहीं कभी उपहास, भय में याद आते भगवान, जिनकी इच्छा हम बने इंसान, व्यर्थ रहा कृष्ण का भी ज्ञान, निज स्वार्थ में पतित सर्वोपरि संतान, निंदा में आनंद बहुत है, बुद्धि करता यह भ्रष्ट है, विवेकवान दूरी बनाते हैं, वाग्देवी का आशीष पाते हैं,

गांव से निकला, छोरा मस्तमोला*

*गांव से निकला, छोरा मस्तमोला* गांव से निकला, छोरा मस्तमोला, साथ में सपनों का एक बड़ा बोझ, कब होगी नौकरी, कब कमाओगे रुपया, पूछे फोन पर सब यहां हर कोई रोज, दिल का हाल, यहां किसे बताएं, सबको लगे शहर में काट रहे हम मौज, सतुआ खिचड़ी खा कर रहे खूब प्रयास,  हर रिजल्ट बाद देते खुद को खूब दोष, रोना धोना कहां सीखा हमने, दुनियां को दिखाना है जोश, हम गंवारों का मत उड़ाओ मजाक, एक झटके में हम उड़ा देंगे सबका होश... ✍🏻 *कवि विपिन वियान 'हिंदुस्तानी'*