बिछड़ा प्यार
बड़े शौक से खुद ही खुद को मिट्टी में मिलाया था,
जिसे भुलाना नामुमकिन है, उसे ही भुलाया था,
आज जिंदगी का तिजौरी खाली देख क्यों गमजदा हूं,
किस जलजले में इतनी हिम्मत, यह आग मैंने ही लगाया था,
सफ़र में हमसफर का साथ छूट जाना मुमकिन है,
बैचेन क्यों होना, रात के बाद फिर आना दिन है,
मगर अगर पता हो, फिर होगी नहीं उनसे मुलाकात,
इस दर्द की दवा सिर्फ कठिन नहीं नामुमकिन है,
सफर चाहे जितना कठिन हो, मंजिल भी हो भले ही दूर,
इतनी रहमत खुदा जरूर बख्सना, हमसफर रहे ना दूर,
तेरी इतनी इनायत से सारी खुशियां मयस्सर हो जाती है,
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