ना जाने हम क्या ढूंढते हैं...
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लगा कर शहर में आग, हम बरसात ढूंढते हैं,
कोहिनूर के ढ़ेर को करके बर्बाद, खाक ढूंढते हैं,
अपनी तरक्की का ढिंढोरा क्या खूब पीट रहे हैं,
जो नेमतें थी जन्मजात, वही इन्तेज़मात ढूढते हैं...
खुद ही बना कर जहन्नुम, कायनात ढूंढते हैं,
निज कुकर्मों से आई कयामत का इलाज ढूंढते हैं,
अंजाम से भयभीत, शरीर पीला, हलक सुखा,
इंसानियत भूला कर, इंसानी जज्बात ढूंढते हैं,
लालच में गंवा कर सुकून भरा एहसास ढूंढते हैं,
बैचेन करने वाला भूख और प्यास ढूंढते हैं,
मखमली सेज पर हम रात भर बैचेन रह कर,
पुरुषोत्तम राम, माता जानकी वाला वनवास ढूंढते हैं,
करके अथाह अर्जन, अब बुद्ध वाला संन्यास ढूंढते हैं,
आखिर क्यों नहीं हम अपना स्वर्णिम इतिहास ढूंढते हैं,
पश्चिमी सभ्यता की नकल में हमने बहुत कुछ गंवा दिया,
ढूंढना चाहिए हमें क्या और ना जाने हम क्या ढूंढते हैं,
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