कोई सत्ता पाने के लिए, हिंदू होने का करता है ढोंग,
कोई बिना रोजा किए, इफ्तार के लिए करे औन पौन,
आस्था के साथ यूं ही होता रहता है बेरहम खिलवाड़,
भावनाओं में बह हम करते सत्यानाश, किसे समझाए कौन,
यहां हर किसी को किसी न किसी वजह से अफसोस है,
हर किसी के शिकायतों को सुनकर भी वह रहता खामोश है,
जिंदगी भर हम ख्वाइशों के समंदर में डूब कर मरते रहते हैं,
हमारे अरमानों के बोझ तले कितने दुखी, किसी को नहीं अफ़सोस है,
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