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मजाकिया इश्क

मजाकिया इश्क

शर्तों के ढ़ेर पर मुझे बिठाकर मेरे वजूद को तलाश रहे हैं।
शर्तों ने वजूद मिटा दिया, अब मुझे छलिया बता रहे हैं।।
आंखों का आंसू सुख चुका, ख्वाइशों का चिता भी जल गया।
आजकल सरेआम वह शख्स, मेरे दिल को पत्थर बता रहे हैं।।

खुद को बदलते बदलते, अपनी ही नजरों में काफिर बन गया।
बड़ी शिद्दत से वही शख्स, मुझे मोहब्बत का धर्म बता रहे हैं।।
जिस इश्क में डूबकर मैंने सबकुछ गंवाना सिख लिया था।
प्यार के उन्हीं पवित्र उसूलों का मुझे सबक सीखा रहे हैं।।

महलों के मोहब्बत से तुलना कर जिसने किया शर्मसार।
आजकल मेरे अंदर प्यार के चिथड़ों को तलाश रहे हैं ।।
अपनी शर्तों के वज्रगृह से बाहर निकलने का फुरसत नहीं।
मेरे जज्बातों को हर पल आंख दिखा मुझे पाना चाह रहे हैं।।

जिस दुनियां की परवाह, मैंने वर्षों पहले छोड़ दिया था,
उसी दुनियां की दुहाई देकर मुझे बदलना चाह रहे हैं,
अपनी दुनियां में मैंने जिसे दिया बहुत ऊंचा मुकाम,
वही मेरी जन्नत को मुख्तक्सर वीरान बना रहे हैं,

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