*जनता के मन की बात...*
✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*
लाशों से आजकल आ रही है खूब दुर्गंध,
किसी का दिल हुआ पत्थर, किसी का मुंह बंद,
आंखों का आंसू पोंछने को भी कोई तैयार नहीं,
फिर कैसे कह दूं, हमारे सियासी आका गद्दार नहीं,
बड़ी शिद्दत से जिन्हें ताज पर बिठाया था,
स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार के सपने सजाया था,
आज भी वह, ना जाने क्यों सत्तर साल पर अटकी है ?
फिर कैसे कह दूं, हमारी सरकार नहीं भटकी है,
विदेशों में परचम लहराने से पहले,
हर घर में चूल्हा जलाना जरूरी है,
पूंजीपतियों के वर्चस्व से आने वाली समृद्धि है,
फिर कैसे न कह दूं, यह मिथ्या प्रसिद्धि है,
बदनसीबी हमारी, यह कैसी मजबूरी है,
आधी आबादी के लिए दो रुपए में चावल जरूरी है,
आंकड़ों की कलाबाजी से सच नहीं बदलता है,
फिर कैसे न कह दूं, घोषणापत्र में पाखंड झलकता है,
गम नहीं, काला धन वापस नहीं आया,
अफसोस देश का धन काला होने से बच नहीं पाया,
यहां मिल बांट कर जो लोग इसे खा रहे हैं,
यही लोग दूसरे को गद्दार का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं...
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