नया बहाना...
----------------------------------------------
दूर रहूं तो मेरे अपने तड़पते हैं,
पास रहूं तो मैं खुद तड़पता हूं,
मेरे मासुम बच्चे इतने अक्लमंद हैं,
वो अपनी भूख और मैं आंसू छिपाता हूं...
घर लौट आया था कि वापस नहीं जाऊंगा,
पत्नी पूछती है, बच्चों को कैसे खिलाऊंगा,
बूढ़े मां बाप बस एक कोने में ख़ामोश हैं,
परदेश में मौत का भय, सिर्फ यही अफसोस है,
कामचोर नहीं हूं साहब, काम देकर देखो,
ईमान बेचा नहीं है, उसी का ईनाम देकर देखो,
इंसानियत का ढोल पिटते हो, इंसान बन कर देखो,
हम जैसों की आखरी उम्मीद, हमारा भगवान बन देखो,
हमें पता है, प्रवासी श्रमिक ही नियति हमारी,
क्योंकि नीयत कुछ लोगों की ठीक नहीं है,
किस अन्तर्द्वंद में जीवन घुट घुट कर काटता हूं,
लफ़्ज़ों में बयां करना उसे मुमकिन नहीं है,
पांच वर्ष में ख़ूब खेल तमाशे होते हैं,
परदेश में हम पग पग अपमान सहते हैं,
हमारी मजबूरियों पर मातम मत मनाना,
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें