सुकून
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रोजी रोटी का फिकर,
भागते रहे लोग दर ब दर,
छोड़ आये गांव की मिट्टी व गोबर,
खुश हैं स्लम बस्तियों में पाकर घर,
बिजली बत्ती की चकाचौंध,
हर घर में जहां एसी और कूलर,
फिर भी कौन पूछे उनके दिल से,
गांव की यादें ताज़ा होती घुट घुट कर,
बासी खाना खाने वाले देहाती,
खाते हरी सब्जी फ्रिज में सड़ाकर,
छोटी बातों में घर में मेला लगने से परेशान,
बहुत खुश हैं व्हाट्स एप पर ग्रुप बनाकर,
पक्की सड़कों का जाल बहुत है,
छोटे बच्चे रहते पिंजरों में कैद होकर,
खेत खलिहानों में मद मस्त घूमने वाले,
पलक झपकते खा जाते हैं ठोकर,
मर्ज बड़ा, अस्पताल भी हैं जहां बड़े बड़े,
अजनबी लोगों की भीड़ कोई जिये चाहे मरे,
दवा मिल जाती है लेकिन हवा नहीं मिलती,
खुशी लाख मिल जाये, सुकून नहीं मिलती...
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