अरमानों का निजीकरण ...
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सरस्वती के मंदिर में, धनवानों का डेरा है,
लक्ष्मी की कृपा से वंचित, जीवन में अंधेरा है,
सरकारी विद्यालयों में कई योजनाओं का बसेरा है,
भेदभाव ग्रसित शिक्षकों को हीन भावना ने घेरा है,
समानता का अधिकार फिर यह कैसा फेरा है,
शिक्षा दान करने वालों के जीवन में अंधियारा है,
निजीकरण का कुचक्र, गरीबों का मुश्किल गुज़ारा है,
अच्छे दिनों की चक्की में पीस रहा जनता बेचारा है,
सेवा की गुणवत्ता सिर्फ एक छलावा है,
जियो का फोर जी स्पीड ने यही बताया है,
पूंजीपतियों के हाथों में सत्ता का केंद्रीयकरण,
चंदा का गन्दा खेल, वोट बैंक का ध्रुवीकरण,
योग्यता करेगा सिर्फ दरबानी, कुबेर करेगा राज,
अब भी नहीं जगे हम, होंगे दाने दाने को मोहताज...
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