देशकाल
@ बिपिन कुमार चौधरी
गरीबों का शोषण, अमीरों का ख्याल,
सत्ता की संस्कृति, मनोवृत्ति और चाल,
ईमानदारी की बांसुरी बजाने वाले कंगाल,
राजदरबार में मलाई खाता चापलूस, दलाल...
चरण वंदना का नाटक, लोकतंत्र का मायाजाल,
पांच वर्ष में सेवक पूछने आते जनता का हाल,
संग रहता जाति धर्म का ठेकेदार वाचाल,
भविष्य के मायावी सपने, झूठे वादों का ताल,
जनता के आंखों का आंसू पूछे एक ही सवाल,
वोट मेरा पाकर तूं बन बैठा वीआईपी कैसे कंगाल,
शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार की आस में हम बेहाल,
तेरे बाप को लगी लॉटरी, पांच वर्ष में तूं मालामाल,
पैसों वालों के लिए अलग स्कूल, अलग अस्पताल,
हमारे जीवन की कीमत नहीं, सरकारी शिक्षा बेहाल,
बेहतर रोजगार की चाहत में हमारी जिंदगी फटेहाल,
फिर भी खुश हैं, कोटा में पाकर गेहूं चावल, दाल,
हर छोटी छोटी बातों पर होता देश में बबाल,
जनता के सेवक से ज्यादा कोई नहीं खुशहाल,
राजनीति में कोई दुश्मन नहीं, पूछते सबका हालचाल
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