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संदेश

इंकलाब जिंदाबाद...

इंकलाब जिंदाबाद... संप्रभुता का आया गंभीर संकट, उचित नहीं राजनीतिक नाटक, मां भारती कर रही पुकार, विश्वासघाती चीनियों का हो संहार, नेपाल सिर्फ एक मोहरा है, षड्यंत्र बहुत ही गहरा है, बेशक सीमा पर वीर जवानों का पहरा है, देश के अंदर कुछ चेहरों पर कई चेहरा है, बासठ का ज़ख्म हमें भूलना नहीं चाहिए, वाजपेईजी के जिम्मेदार विपक्ष का अनुकरण करना चाहिए, राजनीतिक प्रतिद्वंदिता चलती रहेगी, हमारी एकता और राष्ट्र की अखंडता अक्षुण्ण रहना चाहिए, देश के कोने कोने से आ रही एक आवाज, बता दो दुश्मनों को उसकी औकाद, हर धर्म से ऊपर हमारा राष्ट्रवाद, आओ सब मिलकर बोलें, इंकलाब जिंदाबाद...

हमदर्द

हमदर्द ----------------------------------- दुश्मन बनाने का मुझे शौक नहीं, कोई इसी काबिल है, तो मैं क्या करूं, मेरे जनाजे को कंधा देने वाले, बेशक मेरे अपने होंगे, मेरा जनाजा उठने की चाहत रखने वाले, तुझे मैं कैसे अपना कहूं, आंखो का आंसू,  हमेशा सच नहीं होता है, किसी की मुस्कुराहटों की खातिर, अपनी आंखो का आंसू छिपाने वाले, दुनियां में इससे बड़ा हमदर्द नहीं होता है,

श्रद्धांजलि

श्रद्धांजलि --------------------------------- सूनी गोद का दर्द, हृदयविदारक चीत्कार, जल्दी लौट कर आऊंगा मा, जब देखा था उसे आखरी बार, उजड़ी हुई मांग, जिंदगी का होना वीरान, तुम्हें तेरे सुहाग की सौगंध, रोना मत, मेरी जिंदगी, मेरी जान, कौन देगा इन्हें तस्सली, कौन सुनाए इन्हें पैग़ाम, तेरे बलिदान को शत शत नमन, तेरे परिजनों को प्रणाम ...

सिंहालोकन

सिंहावलोकन ------------------------------------- हकीकत में दिखता नहीं है, महफिलों में बिकता वही है, उलझनों की गठरी में फंसी जिंदगी, जो कहता है, करता नहीं है, जो करता है, कहता नहीं है, संन्यास, विकास, एहसास, इतिहास और सत्यानाश, छिपाए छिपती नहीं है, बताए दिखती नहीं है, लेकिन आदमी होशियार है, करता कई कई श्रृंगार है, चांदनी रात चाहे कितनी ख़ूबसूरत हो, उगते सूर्य के सामने सब बेकार है...

राजपूत सुशांत

राजपूत सुशांत... ---------------------------------------------- राजपूत सुशांत, तेरे चाहने वाले आज बहुत अशांत, पवित्र रिश्ता से बनाया अपनी पहचान, पर्दे पर किया तूने जीवंत, द ग्रेट धोनी महान, जिंदादिली थी तेरी पहचान, सोसल मीडिया पर तेरे लाखों फॉलोअर्स, सभी बिहारियों का तूं था अभिमान, फिर किस बात ने किया तुझे यूं परेशान, किंकर्तव्यमुढ़ कर गया तेरा देहांत...

लेखक की कलम से (जीवनधारा)

* लेखक की कलम से * मनुष्य कितना भी प्रयत्न कर ले लेकिन  अक्सर मनुष्य की नीयत और नियति में एक बहुत बड़ा फासला होता है। इसके लिए निसंदेह बहुत सारी स्थितियां और परिस्थितियां जिम्मेदार होती है और विषम से विषम परिस्थितियों में भी सबसे बड़ा सत्य वर्तमान होता है। भूत को हम कोस सकते हैं और बेहतर भविष्य की कामना कर सकते हैं लेकिन इन तमाम किन्तु परन्तु के बीच जीवनधारा अपने ही मदमस्त चाल में अनवरत चलती रहती है। अपनी प्रथम पुस्तक काव्य संग्रह जीवनधारा में जीवन के विभिन्न कालक्रम में अपनी अनुभूतियों को छंदबद्ध पंक्तियों में प्रस्तुत करने का मैंने छोटा सा प्रयास किया है। एक साधारण किसान का लड़का होने के कारण, किसानों की समस्याओं, उसके टूटते - बिखरते सपनों और फिर एक नई आशा की मद्धिम सी किरण एवं सुनहरे भविष्य की तलाश में नए उत्साह के साथ जीवन जीने का पराक्रम, मैंने बहुत करीब से महसूस किया है। इसलिए मैंने अपनी कविताओं में अन्नदाता किसान परिवार  की पीड़ा के चित्रण का भी प्रयास किया है। पालनहार का संस्कार और मजबूर अन्नदाता मेरी इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करती हुई कविताएं हैं। मैंने उदास, निरा...

नया इतिहास

नया इतिहास -------------------------------------------- विकास - विकास, करते - करते, नाश हम अपना कर बैठे, प्रकृति के साथ करके छेड़छाड़, अपने अस्तित्व का उपहास कर बैठे, खुशहाली के लिए किया जतन, जीवन के आनंद का ह्रास कर बैठे, वन समाप्त, आश्रितों का जीवन समाप्त, आहार श्रृंखला का सर्वनाश कर बैठे, पानी की किल्लत, सांस लेने की जिल्लत, यह कैसा विकास हम कर बैठे, जीडीपी का मचा कर हाय तौबा, इंसानों को मशीन बना बैठे, शक्तिशाली होने का कैसा भूत सवार, विध्वंस का जखीरा सज़ा बैठे, सोशल मीडिया की क्या धूम मची है, पड़ोसी को अजनबी बना बैठे, सूचना क्रांति का कोई जोड़ नहीं, बच्चों को वयस्क बना बैठे, शांति की तलाश, सुकून की प्यास, क्या क्या नहीं हम गवां बैठे, ग्रुर हमें अपनी तरक्की पर बहुत था, कोरोना की तबाही से एक नया इतिहास बना बैठे....