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लेखक की कलम से (जीवनधारा)

*लेखक की कलम से*

मनुष्य कितना भी प्रयत्न कर ले लेकिन  अक्सर मनुष्य की नीयत और नियति में एक बहुत बड़ा फासला होता है। इसके लिए निसंदेह बहुत सारी स्थितियां और परिस्थितियां जिम्मेदार होती है और विषम से विषम परिस्थितियों में भी सबसे बड़ा सत्य वर्तमान होता है। भूत को हम कोस सकते हैं और बेहतर भविष्य की कामना कर सकते हैं लेकिन इन तमाम किन्तु परन्तु के बीच जीवनधारा अपने ही मदमस्त चाल में अनवरत चलती रहती है। अपनी प्रथम पुस्तक काव्य संग्रह जीवनधारा में जीवन के विभिन्न कालक्रम में अपनी अनुभूतियों को छंदबद्ध पंक्तियों में प्रस्तुत करने का मैंने छोटा सा प्रयास किया है।

एक साधारण किसान का लड़का होने के कारण, किसानों की समस्याओं, उसके टूटते - बिखरते सपनों और फिर एक नई आशा की मद्धिम सी किरण एवं सुनहरे भविष्य की तलाश में नए उत्साह के साथ जीवन जीने का पराक्रम, मैंने बहुत करीब से महसूस किया है। इसलिए मैंने अपनी कविताओं में अन्नदाता किसान परिवार  की पीड़ा के चित्रण का भी प्रयास किया है। पालनहार का संस्कार और मजबूर अन्नदाता मेरी इन्हीं भावनाओं को अभिव्यक्त करती हुई कविताएं हैं। मैंने उदास, निराश और जीवन यापन के आर्थिक संकट से जूझते किसानों के हृदय में ईश्वर के प्रति असीम श्रद्धा एवं अनंत विश्वास का अवलोकन किया है और सबसे बड़ी बात अपनी तमाम तकलीफों को ईश्वर की इच्छा मान कर सहज स्वीकार करने की इनकी प्रवृति और प्रकृति ने अनंत बार बार मुझे इनका कायल बना दिया है। इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम का नाम लेकर मेरी कविता "लेे लो राम का नाम" जीवन के तमाम झंझावत को झेल जाने का मेरे कवि मन को पूर्ण भरोसा है।  वैश्विक महामारी कोरोना ने मेरी व्यस्तम दिनचर्या में एक ठहराव लाकर मानवीय इतिहास के इस स्याह अध्याय की परिस्थितियों को चित्रित करने के लिए मुझे उद्वेलित किया है, जो मेरी कई कविताओं में परिलक्षित होती है, लेकिन इस आपदा के कारण मानवीय मूल्यों और संस्कारों में आये बदलाव को प्रस्तुत करती हुई मेरी कविता "कोरोना तेरा खूबसूरत पैग़ाम" मेरी प्रिय रचना है। सुपर पावर बनने की अघोषित होड़ में उत्पन्न मानवीय अंहकार को नेस्तनाबूत करती कोरोना वायरस ने मुझे "व्यर्थ सारा जखीरा" कविता लिखने को मजबूर किया है। "इंसानियत का सबक" प्रेम, सहयोग और आपसी तालमेल से जीवन यापन में संसार की सभी समस्याओं के निराकरण की सार्थकता को इंगित करता है। प्रकृति से खिलवाड़ और कथित विकास के नाम पर छेड़छाड़ ने मानव जाति के समक्ष अपने वजूद की सुरक्षा की गंभीर समस्या खड़ी कर दी है। यही कारण है कि मेरा कोमल कवि मन प्रकृति प्रेम और इसके संरक्षण को व्याकुल रहता है और मेरी यह भावना भी कुछ कविताओं में प्रतिबिंबित होती है। मुझे पता है कि सिर्फ मेरे लिख देने और पाठकों के पढ़ लेने से समस्या का समाधान नहीं होने वाला है लेकिन बिना लिखे मेरे अंदर विचारों के उठने वाले तूफान को शांत करना भी अत्यंत दुष्कर कार्य है, जिसकी बानगी "कलमकार की ख्वाहिश" में पाठक सहज ही महसूस कर सकते हैं। सृष्टि के निर्माण से वर्तमान तक के सफ़र में मानव जाति के संघर्ष और पुरुषार्थ का गौरवशाली इतिहास हमें हर पल यह एहसास दिलाता है कि इंसान हारता नहीं, हालात हार जाते हैं। इसके बावजूद मानव जीवन की कुछ विडंबना है, जिसे मैंने अपनी पुस्तक की शीर्षक कविता "जीवनधारा" में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

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