सिंहावलोकन
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हकीकत में दिखता नहीं है,
महफिलों में बिकता वही है,
उलझनों की गठरी में फंसी जिंदगी,
जो कहता है, करता नहीं है,
जो करता है, कहता नहीं है,
संन्यास, विकास, एहसास,
इतिहास और सत्यानाश,
छिपाए छिपती नहीं है,
बताए दिखती नहीं है,
लेकिन आदमी होशियार है,
करता कई कई श्रृंगार है,
चांदनी रात चाहे कितनी ख़ूबसूरत हो,
उगते सूर्य के सामने सब बेकार है...
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