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८८. सफ़लता कदम चूमती रहे @

सफ़लता नित्य कदम चूमती रहे ...

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

किसी की खुशियों का क़त्ल हुअा था,
एक मासूम बच्चा जब अपने घर से बेदख़ल हुअा था,
कई दिनों तक आँखो से अश्रुधारा रुकती नहीं थी,
हंसमुखी चेहरे पर मुस्कान दिखती नहीं थी ...

वक्त के साथ उसने समझौता कर लिया था,
नए शहर में नए लोगों से रिश्ता जोड़ लिया था,
लड़कपन में माँ के हाथों का निवाला भी नसीब नहीं था,
भाई के महत्वाकांक्षा तले दबा बचपन बदनसीब था ...

पिता की मजबूरी, जरूरतों पर भारी थी,
कक्षा में अव्वल आने की अजीब लड़ाई थी ...
धन और साधन खूब अभाव था,
मुस्कुरा कर गम छुपाने का बेहतरीन स्वभाव था...

हाथ फ़ैलाने की आदत नहीं थी,
घर के मुसीबतों से राहत नहीं थी,
लोगों की ग़लतियाँ नजरंदाज करता था,
वक्त के ढ़ाए सितम हंस कर बर्दाश्त करता था

जिद्द और जुनून से मुसीबत हार गया,
सफ़लता का डंका, संसार में हुंकार गया,
वक्त जानता है, मेधा का हुअा है सम्मान...
सफ़लता नित्य कदमों को चूमती रहे, यही ईश्वर से आह्वान .....

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