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संदेश

जुनून की ज्वाला...

जुनून की ज्वाला... --------------------------------------------- घनघोर अंधकार से जब घिरा हो मन, राहें सब ओझल, मझधार में हो जीवन, देवता हो कुपित, मुंह मोड़ ले परिजन, जीवन से निराश, विचलित हो अंतर्मन, ऐसे में बंधु तुम बिल्कुल मत घबराना, सारी दुनियां को थोड़ी देर भूल जाना, सिर्फ किताबों से तुम कर लेना याराना, समस्याएं सारी होंगी हल, इज्जत करेगा जमाना। अपेक्षाओं की बोझ से दब क्यों मर रहा है, क्या होगा कल, क्यों इतना डर रहा है, मत हो नर निराश, कर छोटा सा प्रयास, केंद्रित कर अपनी ऊर्जा, लिख नया इतिहास, आंख दिखाने वाले भी एक दिन आंख झुकाएंगे, था एक मेहनती आदमी, शौक से सबको बताएंगे, आओ करें प्रण, जुनून की ज्वाला है जलाना, चुनौतियों के समंदर में हमें खुद को है आजमाना...।

होशियारी

कभी दिल को बहलाता रहा, कभी दिमाग को झुठलाता रहा, जख्म जो वक्त ने दिया था, मुस्कुरा कर छिपाता रहा, लगा कर मुखौटा बहरूपिया वाला, मेरे घरौंदे में आग लगाता रहा, मैं गुस्ताखी करता रहा नजरंदाज, वह अपनी होशियारी पर इतराता रहा,

गांधीगिरी

गांधीगिरी सत्य अहिंसा का देकर नारा, जीवन भर वह अटल रहे, देश परदेश में सहा सितम, कब कहां वो विकल रहे, दुर्बल तन और निर्मल मन, संघर्षपथ पर सदा अविरल रहे, यातनाएं सही, पीड़ाएं झेला, चरखा चला, मचाते हलचल रहे, फिरंगियों के नाक में करके दम, देश आजाद कराने में सफल रहे, किया नहीं कभी पद की चाह, जीवनभर वह सरल रहे, सत्ता के हवसी लेकर उनका नाम, दुर्भाग्य, हर पल जनता को छल रहे, पूछता है, यह दुःसाहसी बिपिन, सही में गांधीगिरी पर कौन चल रहे...

डिजिटल दुनियां

डिजिटल दुनियां छह इंच की स्क्रीन ने मचाया ऐसा भयानक घमासान, फेसबुक पर हजारों दोस्त, पड़ोसी से रहता है अनजान, सोसल मीडिया की भीड़ में नई पीढ़ी है यहां हलकान, खुद की सोसाइटी में वही शख्स बना रहता है गुमनाम, किताबों ने कर ली आत्महत्या, पुस्तकालय सुनसान, पढ़ने की किसे फुरसत, वीडियो बनाने में सब परेशान, पढ़ने का लत क्यों छुटा, बुद्धिजीवियों में मचा घमासान, रायता फैला रहा निरंतर वॉट्स ऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान, एक छत के नीचे बैठे, फिर भी सबका स्क्रीन पर ध्यान, बड़े बुजुर्ग माथा पीटे, गजटो में घूट घूट जीता है इंसान, नई पीढ़ी डाटा खपाने में व्यस्त, भाड़ में जाए खानदान, हर घर की यही हालत, डिजिटल दुनियां से करे त्राहिमाम

नया दीपक जलाना है...

अंधेरे की काली बदरी को आज नहीं तो कल मिट जाना है, जिद्द सिर्फ इतनी रहे कि हमें प्रकाश की रौशनी में नहाना है, हवा हो चाहे कितनी तेज, परिस्थितियां हो भले बहुत विकराल, बिना वक्त गंवाए, बिना थके हर पल एक नया दीपक जलाना है, नया दीपक जलाना है...

सैलाब

इश्क की गहराई में डूबने वाला मतवाला होता है, सारी दुनियां के खुशियों के बीच भी आंख भिंगोता है, आंख से दर्द का दरिया बहे तो मत रोकना दोस्त, यह रुका दरिया अक्सर सैलाब बन कर डुबोता है,

हमनवा

हमनवा बनकर आने वाले अक्सर जो हमदम नहीं बनते हैं। हमनशीं की तरह दिल में रहकर वो  दिलनशीं याद बहुत आते हैं, मयकदा में मैकश बनकर मयकशी से भी यह दर्द कम होता नहीं, बेरहम, बेखबर ऐसे संगदिल यादों की जन्नत में ही खुश रहते हैं,