#सिसकियां...
✍🏽 बिपिन कुमार चौधरी
हर तरफ अंतहीन तबाहियों का दौड़ है,
लेकिन यहां चारों ओर अजीब शोर है,
परमात्मा को टुकड़ों टुकड़ों में बांट कर,
धर्म के ठेकेदार एक दूसरे को बताते चोर हैं,
इंसानियत से जिनका कोई नहीं वास्ता,
ऐसे ही सिरफिरों का हर जगह जोर है,
मजहब की दीवारें खड़ी कर दी जिन लोगों ने,
वही बताते रहे, कौन चौकीदार और कौन चोर है...
तुम्हारी ताकत से हमें कोई शिकवा नहीं,
हमारी मोहब्बत में फिर जहर क्यों घोलते हो,
कुर्सी की लड़ाई में तुम सिरफिरे बनकर,
खतरे में हमारा धर्म, क्या खूब बोलते हो,
फिरंगियों की दास्तां से ज्यादा दर्द अब होता है,
राजा रहते महलों में, आम इंसान भूखा सोता है,
तकलीफ हमारी दूर करने का वादा खूब होता है,
बाबा पर उठती अंगुली, बापू नोटों में छप रोता है,
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