शराफत
@ बिपिन कुमार चौधरी
जिनसे हाल चाल पूछने का इन्तजार था,
वही मुझे गिड़ाने का जाल बुन रहे थे,
जिन्हें खुश करने की तरकीबें खोज रहा था,
वही लोग मुझे रूलाने का मौका ढूंढ रहे थे,
मुझे उड़ने की तम्मना नहीं है,
मुझे कुछ भी खोने का ग़म भी नहीं है,
तुझ जैसा चांडाल मुझे गिरा दे,
तेरे इतनी औकाद और दम नहीं है,
तूं फिर मेरे किसी अपने को ही मूर्ख बनायेगा,
मोहरा कोई और होगा, शिकार तूं मुझको बनायेगा,
इसलिए मैंने भी एक अजीब शौक पाल लिया है,
अपनों पर शक करना मेरी आदत बन गई है,
खुद शीशे के घर में रहने वालों,
मेरे घर पत्थर फेंकते हो,
फेंक सकता हूं, पलट कर वही पत्थर,
तेरा ढाल मेरी खुद की शराफत बन गई है...
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