*मेरी १०१ कविताएं*
जीवनधारा (कविता संग्रह)
संक्षिप्त परिचय
बिपिन कुमार चौधरी
माता : श्रीमती इंदु देवी
पिता : जय प्रकाश चौधरी
पत्नी : ममता कुमारी (शिक्षिका)
जन्मदिवस : 10 दिसंबर 1984
जन्म स्थान : बिहार (कटिहार)
शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी)
नालंदा ओपेन युनिवर्सिटी पटना (बिहार)
सम्प्रति : मध्य विद्यालय रौनिया, कटिहार (बिहार) में शिक्षण कार्य एवं साहित्य सृजन ब्लॉग और Bipin writer के नाम से यूट्यूब चैनल का संचालन
वर्तमान निवास : बिपिन कुमार चौधरी, ग्राम - बलुआ, पोस्ट - सिक्कट, वाया - सेमापुर, प्रखंड - बरारी, जिला - कटिहार, बिहार
पिन कोड - 854115
मोबाइल नम्बर - 7717702376
eMail - bipinkrchoudhary1@gmail.com
✍🏻 दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा में करियर, युवा एवं आर्ट एंड कल्चर से संबंधी फीचर लेखन,
✍🏻 मुंबई से प्रकाशित साहित्यनामा पत्रिका और दिल्ली से प्रकाशित निभा पत्रिका में कई कविताएं प्रकाशित
✍🏻पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के "बात बे बात" कॉलम में बीस से ज्यादा व्यंग्य प्रकाशित
✍🏻 सभी प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं में पांच सौ से ज्यादा संपादक के नाम पत्र प्रकाशित
साझा संग्रह : काव्य स्पर्श, काव्यांजलि, चलते चलते, ए ब्यूटीफुल मिस्टेक, लॉक डाउन, प्यार का जन्म, द लव दैट हर्ट्स, ए डे इन योर ड्रीम वर्ल्डस, तेरे जैसा यार कहां, ए पिंच ऑफ स्टार्स, आदि
सम्मान : काव्य श्री साहित्य सम्मान, हिन्दी साहित्य रत्न सम्मान, भारती साहित्य सागर सम्मान, रेणु समृद्धि सम्मान, साहित्य शिल्पी सम्मान व अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक, सामाजिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा साहित्य के क्षेत्र में सम्मान प्राप्त।
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कवि की कलम से
कलम की धार थोड़ी कुंद पड़ गयी है,
वर्ना लोग कभी इसके दीवाने थे,
बहुत दिनों बाद फुरसत मिली है,
अपने पहले प्यार से ईश्क फरमाने के,
ए वक्त तेरी रफ्तार बहुत तेज है
पर रुकना मुझे भी आता नही है
ठोकरें तो मैंने भी बहुत खाई है
पर झुकना मुझे भी आता नही है
अबकी जख्म कुछ ज्यादा गहरा है
पर तू भर देगा उसे भी
क्योंकि तुझे पता है
कि तेरा यह मुसाफिर कभी ठहरा नही है...
लोग हर मंज़िल को मुश्किल समझते है,
हम हर मुश्किल को मंज़िल समझते है.
बड़ा फ़र्क है लोग और हमारे नज़रिए में,
लोग दिल को दर्द और हम दर्द को दिल समझते है.. !!!
आपने तो गुलाब देखा होगा ,
होते हैं वहाँ काँटे भी ,
खुशबू की चाहत रखने वाले ,
कांटों से कभी डरते नही . . .
- बिपिन कुमार चौधरी
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१.शब्द
शब्द होते हैं अनमोल,
जुबां पर लाएं तौल तौल,
भावनाएं रखें नियंत्रित,
बने नहीं फूटा ढ़ोल,
दिल को अगर छू जाए,
बन्द दरवाजे देता है खोल,
अगर चोट लग जाए,
बदल जाता है इतिहास, भूगोल,
दुष्टों की यह प्रवृति,
करते हैं बातें गोल मटोल,
लाख करें हम कोशिश,
भावनाओं का खोल देता है पोल,
क्रोध होता है विनाशकारी,
जिसका कारण कोई बोल,
इंसानों का कोई दोष नहीं,
देवता होते प्रसन्न सुन मंत्रो का बोल,
निरर्थक सभी मेवा, मिष्ठान,
धन, वैभव भी नहीं आता काम,
दिल में चुभ जाए अगर कोई बोल,
इसलिए जुबां पर लाएं इसे तौल तौल...
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२. पाखंड
लेकर नाम धर्म का,
छिपाते काज कुकर्म का,
कैसा यह ज्ञान बांटते हैं,
धर्म का विरोधी, लोग धर्म को मानते हैं,
परमात्मा की तलाश में,
ज्ञान प्राप्ति की उल्लास में,
जिन्हें हम भगवान का डाकिया मानते हैं,
मिथ्याडंबरों से धर्म को कुरूप बनाते हैं।
हमारी श्रद्धा का कर नृशंस हत्या,
नफ़रत फैलाना जिनकी तपस्या,
भीड़ को उन्मादी उपदेशों से बरगलाते हैं,
धर्मगुरुओं का ऐसा भीड़ आम जन को रुलाते हैं,
धर्म की आड़ में,
निज स्वार्थ के जुगाड़ में,
राष्ट्रहित से भी विरोध करना सिखलाते हैं,
ऐसे पाखंडी देशभक्तों के क्रोधाग्नि को जलाते हैं
लाख टके का एक सवाल,
धर्म के नाम पर क्यों है बबाल,
सृष्टि को चाहे जिसने भी बनाया है,
हमने अपनी रचना में कौन सा भेद पाया है...
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३. नकारात्मकता
नकारात्मकता तेरा अद्भुत अनुसंधान,
थाली में सजा हो कई स्वादिष्ट पकवान,
पनीर में नमक कम होने का होता गुणगान,
शत शत नमन, तेरी दुष्टता को प्रणाम...
शख्सियत हो चाहे कितना महान,
संघर्ष पथ में जीवन हुआ हो कुर्बान,
जीवन कर दिया भले उन्होंने समर्पित,
त्रुटियां ढूंढने में महारत जज्बे को सलाम,
सृजशीलता का तूं विध्वंसक परिणाम,
सौहाद्र बिगड़ता होता कोई बदनाम,
नफ़रत की ज्वालाग्नि में तड़पता इंसान,
अतृप्त मानसिकता तेरे ज्ञान को प्रणाम,
बोया बबूल याद रख फलेगा नहीं आम,
इसी नफ़रत में होगा तेरा भी काम तमाम,
ईर्ष्या द्वेष के बीज का होगा विभत्स परिणाम,
इसका ज्वलनशील ताप होगा तेरा इनाम,
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४. इबादत
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
ए रब, कर तूं कुछ ऐसी इनायत,
ख़त्म हो जाए कलह कष्ट का कहर,
मानव जाति की सुरक्षा हो मुमकिन,
आओ सब मिलकर बोलें आमीन...
सुन मेरे परवरदिगार, ओ मेरे भगवान,
कर रहे सब त्राहिमाम, संकट में इंसान,
कर कुछ ऐसा करिश्मा, रुक जाए कोहराम,
आओ सब मिलकर बोलें, जय श्री राम...
गलतियां हमसे लाख हुई, हम तेरे ही संतान,
तेरी रहमत की आरज़ू में तड़प रहे कई भाईजान,
कर तूं कुछ ऐसी मेहरबानियां, हो सबको फख्र,
आओ सब मिलकर बोलें, अल्लाह हो अकबर...
तेरे हैरतअंगेज कारनामे, करता सारा जग नमन,
स्वीकार कर हमारी प्रार्थना, कर दे ईर्ष्या द्वेष का पतन,
लंगर में सब साथ बैठ, तेरे दरबार में माथा सकें टेक,
आओ सब मिलकर बोलें, वाहेगुरु दा खालसा वाहेगुरु दी फतेह ...
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५. भेद (कोरोना संकट)
अपनी जान बचाने की खातिर,
आज इंसान कुछ दिनों के लिए कैद है,
असली दर्द हम बेजुबानों से पूछो,
बिना गुनाह आजीवन कैद हैं,
इस कैद से निकल, जीवन नहीं बचा पाओगे,
तेरे कैदी होने का यह मूल भेद है,
तुम्हारे शौक की खातिर आजीवन आंसू बहाता हूं,
क्या तुमलोगों को कोई खेद है...
तुम्हारी तरक्की से हमें शिकवा नहीं,
फिर आपस में क्यों इतना मतभेद है,
अपनी जाति के जीव भी तुम्हारे दुश्मन हैं,
किस काम का बाइबिल, कुरान और तुम्हारा वेद है...
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६. कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...
काम तो है यूं ही बदनाम,
बहुत मुश्किल दिन रात आराम,
जिंदगी को खूबसूरत बनाता काम,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...
सारी दुनिया है परेशान,
हिन्दू हो या हो मुसलमान,
सारा धर्म तेरे लिए एक समान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,
गिरफ्त में तेरे आए जो इंसान,
दूर से करता उसे हर कोई सलाम,
सोचे मूर्ख किसके लिए बेचा ईमान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,
आता नहीं है बैंक बैलेंस भी काम,
व्यर्थ हुआ गलत सही काम तमाम,
कठोर सच्चाई से रू ब रू होता इंसान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,
पड़ोसी भूखा लोग बेफिक्र खाए पकवान,
इस सोच को भी तूने बदल दिया हैवान,
कोई पड़ोसी नहीं हो संक्रमित, सब परेशान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,
मानव का हत्यारा बेशक तू बदनाम,
इंसानियत खुद भूल कर, आदमी बोले दोषी भगवान,
निज स्वार्थ में अंधा कितना गिर चुका इंसान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम,
खोजे सब इस समस्या का समाधान,
सबको आया समझ क्यों संकट में है जान,
प्रकृति से खिलवाड़ और गलत विज्ञान,
कोरोना तेरा यह खूबसूरत पैग़ाम...
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७. इंसानियत का सबक
फ़ुरसत नहीं, कितना व्यस्त थे हम,
कोरोना ने ढाया ऐसा सितम,
सबके सब बेरोजगार हो गए,
दर्द पूछो उनसे जो बीमार हो गए...
दिहाड़ी से जिनका चलता था चूल्हा,
लॉक डाउन से कितना लाचार हो गए,
सरकारी मदद एक मात्र ठिकाना,
बदनसीबी पूछो उनसे, खैरात से जो महरूम हो गए...
कोरोना से लड़ाई में सफलता का राज,
रहे नहीं कोई घर दाने को मोहताज,
बच्चों के आंखो का आंसू, पेट की आग,
गरीबों का विद्रोह कराएगा उनसे विश्वासघात...
मजबूरियों से अगर कोई लाचार हो गया,
बंदा पड़ोस का कोई बीमार हो गया,
ख़तरा सभी पर बड़ा मंडराएगा,
लाखों का दौलत कोई काम नहीं आएगा,
बढ़ाओ होंसला, करो जरूरतमंद की मदद,
ख़तरे में मानव जाति, बचाएगा इंसानियत,
कोरोना हारेगा, ख़तम होगा यह मुसीबत,
शर्त बस इतना, हमारा और पड़ोसी का हो हिफाज़त...
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८. कोरोना तूने पागल सबको बनाया है...
काम धंधा सब हुआ सरपट चौपट,
सड़क पर निकलते पुलिस मारे लट्ठ,
यह दुर्दिन ऐसा कैसा आया है,
कोरोना तूने सबको पागल बनाया है,
गरीब हो या हो आदमी खास,
मजदूर हो या कोई सरताज,
तेरे खोफ़ ने सबको डराया है,
कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,
कीमती था जिनका एक एक पल,
काम नहीं आया पद और धनबल,
आदमी को ओकाद खूब बताया है,
कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,
एक शिकायत तुझसे है शैतान,
गरीब आदमी कुछ ज्यादा परेशान,
यह फर्क तूने भी दिखाया है,
कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,
तुमसे उन्हें खौफ नहीं, जिनके घर नहीं रोटी,
मौत से खेलना उनके लिए बात छोटी मोटी,
ऐसे लोगों को ही खूब सताया है,
कोरोना तूने पागल सबको बनाया है,
मानवता करे मानव से पुकार,
करो सबकी मदद बचा लो संसार,
यह संदेश सारे जहां में फैलाया है,
कोरोना तूने पागल सबको बनाया है...
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९. एहसास
बेजुबानों को करके पिंजरे में बन्द,
शौक हमने अपना खूब पूरा किया है,
घरों में कैद होकर फिर क्यों बैचैन हैं,
सोचो बेजुबानों को कितना दर्द दिया है...
दीवारों से टकड़ा टकड़ा कर,
अक्सर परिंदों के पंख टूट जाते हैं,
अपनी बेबसी पर वो छटपटाते हैं,
तब हम मानव खूब खिलखिलाते हैं...
भावनाओं के पैरों में घुंघरू बांध कर,
दूसरों को नचाने में मजा बहुत आता है,
अपनी भावनाओं से जब खिलवाड़ होता है,
घुंघरुओं की आवाज में भी आनंद नहीं आता है...
अपनी जान पर जब आफत आई है,
आज कोई पंख हमारे काम नहीं आई है,
तिलमिला कर खुद पर खीझ जाते हैं,
पिंजरे का दर्द हमें एहसास दिलाते हैं
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१०. प्रकृति का बदला
दहशत के इस माहौल में,
मौत का आतंक छाया है,
मानव तू कितना बुद्धिमान,
प्रकृति ने औकाद बताया है...
चमगादड़ के सूप से भले नहीं,
जैविक हथियार से ही आया है,
अपनी मौज की खातिर तूने,
कितने जीवों का अस्तित्व मिटाया है
अपनी बादशाहत की खातिर,
जिसने धरती पर उत्पात मचाया है,
उस विवेकशील जाति पर ख़तरा देख,
ईश्वर ने भी खूब आंसु बहाया है,
जिंदगी सबकी कैदखाना बन चुकी है,
संक्रमित होते अपनों की भोहें तनी है,
सूक्ष्मजीव कोरोना ने ऐसा कहर बरपाया है,
अपनों ने भी लाशों को गले नहीं लगाया है,
तरक्की का चहुंओर घमासान है,
प्रदूषित वातावरण सब परेशान है,
यह कैसा आफत हमने बुलाया है,
जहां कोई विज्ञान काम नहीं आया है,
अपनी सुविधाओं की खातिर,
सारी सीमाएं हम तोड़ गए हैं,
कई नदियां नाला बन चुका है,
कई जलिय जीव विलुप्त हो गए हैं ...
प्रकृति से इस बेरहम छेड़छाड़ का,
कीमत मानव जाती को चुकाना होगा,
धरती पर मानव जाती की सुरक्षा हेतु,
मानव को अंदर का हैवान मिटाना होगा...
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११. व्यर्थ_सारा_जखीरा
बमों का जखीरा, विध्वंस का मदिरा,
संकट में सब जन हैं, सबकी यही पीड़ा,
तरक्की हमने बहुत की, फिर कैसा यह अंधेरा,
ऊर्जा किया कहां नष्ट, काम आया नहीं ज़ख़ीरा,
सामने दिख रहा सबको काल है,
सारी दुनियां में क्यों इतना बबाल है,
अदृश्य सा एक कण है, विचलित सबका मन है,
सुपर पावर भी है डरा, व्यर्थ सारा जखीरा,
भयभीत है अंतर्मन, करे करबद्ध सब निवेदन,
संकट में अस्तित्व है, सृष्टि पर खतरा बड़ा,
मानव की लोलुपता, ले रही है कठिन परीक्षा,
संयम सहयोग की तपस्या, निदान होगा समस्या,
आश्चर्यजनक अद्भुत है, मानव कितना दुष्ट है,
विपदा में सब हलकान हैं, लूटने में कुछ पहलवान हैं,
अश्रु उन्हें दिखता नहीं, आत्मा भी कांपता नहीं,
ये लोग सच में महान हैं, मृत्यु से भी सामर्थ्यवान हैं,
नाम उनके कई हैं, लेकिन उन्हीं से आस है,
किया जिसने सृष्टि का सृजन, पापियों का नाश है,
कोतुहल एक बड़ी, बड़ा मुश्किल एक सवाल है,
मौत सामने देख भी लालच की मिटती क्यों नहीं प्यास है,
अंतरात्मा से आती आवाज, नर मत हो निराश,
विध्वंस का भी होगा सर्वनाश, मानव रचेगा इतिहास,
एक नया सवेरा आयेगा, आतंक मिट जाएगा,
दूर हो जाएगा यह पीड़ा, काम न आयेगा तेरा ज़ख़ीरा
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१२. आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है...
हम सभी का पालनहार यह धरती - माता है,
फ़िर अन्नदाता से ही क्यों नाराज़ भाग्य विधाता है,
कभी बाढ़ से पीड़ित कभी सुखाड़ आता है,
कठोर मेहनत कर भी नहीं भरपेट भोजन पाता है...
सपने जिनके मजबूरियों के भेंट चढ़ जाता है,
सरकार उदासीन रब भी कहर ढाता है,
बीमार हालत में दवाई बिन स्वर्ग सिधार जाता है,
संघर्ष पथ में नित्य बिना कसूर यह सजा पाता है...
बच्चे जिनके अन्न को मोहताज हो जाता है,
जिस घर की देवियों की दशा देवताओं को रुलाता है,
उन्हीं के कर्मों से हर कोई थाली में भोजन पाता है,
आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है...
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१३. किसका_इंतिज़ार
(डॉ. प्रियंका रेड्डी के बहाने)
चौकीदारों के इस देश में,
अवलाओं के अस्मत का पहरेदार कोई नहीं है,
सबसे ज्यादा जिस राष्ट्र में पूजी जाती है,
वहां इन देवियों सा लाचार कोई नहीं है...
सती प्रथा की साक्षी देवियां,
धन, ज्ञान और वैभव पर राज है जिनका,
सृष्टि का सृजन करने वाली नारी,
गिद्ध निगाहों से असुरक्षित तन-बदन इनका...
पुत्र-मोह से बचपन कुंठित,
जवानी मनचलों से व्यथित,
दहेज़ का पहाड़ बनाता भार,
फ़िर भी बांटती सबको प्यार...
प्यार बांटने वालों से ऐसा व्यवहार,
जीवन भर सिसकने को यह लाचार,
जन्म देने वालों के लिए होती पराई,
ससुराल और समाज में सीमित जिनका अधिकार,
समाज के बुद्धिजीवी करें विचार,
नारी शक्ति वहशियों का क्यों है शिकार,
अपराधियों से ज्यादा हम हैं गुनाहगार,
क्या अपनों के आबरू लूटने का हमें है इंतिजार...
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१४. नकाबपोश फहरिस्ते
मैंने बहुत कुछ पाया है,
मैंने बहुत कुछ खोया है,
पाकर कभी संतुष्ट नहीं हुआ,
खो कर कभी हिम्मत नहीं खोया है...
भीड़ में भी अक्सर तन्हा रहा हूं,
अकेले भी भीड़ को पीछे धकेला है,
सोचने वाले तक्कलूफ में रहते हैं,
ईश्वर की इनायत ऐसा अलबेला है...
मैं भले ही कितना भी मजबूर रहा हूं,
कीचड़ उछालने वालों से दूर रहा हूं,
फिर भी इनलोगों में बैचैनी छाई हुई है,
इन धूर्त लोगों की शामत आई हुई है...
अब तक चुप रहा हूं लेकिन,
अब बातें करना जरूरी है,
रंगे सियार की जिंदगी जीने वालों,
मुझ जैसों से दुश्मनी तुम्हारी मजबूरी है..
फहरिस्ते का ताज पहन कर,
कब तक काली करतूत छिपाओगे,
अरे बेनकाब करना शुरू कर दिया,
अंधेरे में आइने को भी चेहरा नहीं दिखाओगे...
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१५. बनावटी चेहरे
बनावटी चेहरा सजाकर,
आइना को झूठा बतलाते हैं,
कुकर्मों की काली बदरी ढककर,
क्या हैं और क्या दिखाते हैं...
कड़कती धूप में तपकर,
कम समझदार पसीना बहाते हैं,
मौसम हो चाहे कितना प्रतिकूल,
फूलों की खूबसूरत बगिया सजाते हैं...
बगिया के खूबसरत फूल,
मिलकर सुंदर माला बनाते हैं,
किसी के चरणों के स्पर्श की इच्छा,
अफसोस बनावटी चेहरे को सजाते हैं...
इत्र का मनमोहक सुगंध,
पसीने को बदबूदार बताते हैं,
निज स्वार्थ में फुलवारी रौंद कर,
बनावटी लोग बनावटी आंसू बहाते हैं...
पसीना बहाने वाले को मूर्ख समझकर,
ये लोग उनका उपहास उड़ाते हैं,
आंसू बहाना इन मूर्खों को नहीं आता,
मजबूर होकर ये लोग खून की नदियां बहाते हैं...
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१६. नाटकीय आख्यान
नाटक की नाटकीयता अभिनय का ज्ञान,
सरस्वती की कृपा बनाता कलाकार महान,
मंदिर की आरती मस्जिद का अजान,
इस भेद में उलझ कर मानवता बनता श्मशान...
अद्भुत आज की मानवता अनमोल ज्ञान,
गालियां देकर लोग चाहते खुद का समाधान,
समस्या हो बड़ी, चाहे हो कितना व्यावधा न,
सहयोग की सकारात्मकता से संभव सबका कल्याण...
समस्या कहां नहीं, कहां नहीं व्यावधान,
हम हैं किनके भरोसे कौन करेगा समाधान,
आप आगे बढ़ो पीछे हम हैं भाई जान,
संघर्ष में सहयोग से विमुखता देते आख्यान...
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१७. कुत्तानियत
कुत्तों की महफिल में सरदार ने फरमाया,
इंसानों को काटना अब हमने छोड़ दिया है,
एक दूसरे को काटने के लिए इंसान ही काफी हैं,
अपनी बिरादरी के सारे रिकार्ड को भी तोड़ दिया है...
हमारी वफादारी के आजकल बहुत चर्चे हैं,
इतना मुकम्मल मुकाम हमने हासिल कर लिया है,
इंसानों पर नहीं किसी का कोई भरोसा है,
इंसानी वफादारी ने शायद आत्महया कर लिया है ...
संगति का असर नहीं खुद पर हमें आने देना है,
हम कुत्तों से ख़तरनाक आजकल ये इंसान हैं,
विकट परिस्थिति में भी नहीं बेचते हम अपना ईमान हैं,
बदलते वक्त में भी हमारी ख़ास पहचान है,
नमक खा कर हम कर्ज अदा करते हैं,
मौत हो सामने फ़िर भी नहीं डरते हैं,
इंसानों के कमिनेपन का असर नहीं होना चाहिए,
हम कुत्तों को कुत्ता बन कर जीना चाहिए ...
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१८. अनोखा आशियाना
तिनके तिनके को जोड़ कर हमने आशियाना बनाया है,
वहां बनाया है जहां पहले किसी ने नहीं बनाया है,
दुनिया की नजरों में मैं बेशक पागल हो सकता हूं,
इन्हीं पागलों की जमात ने मुझे पागल बनाया है...
पंख है आसमान में उड़ सकता हूं,
सुरक्षित आशियाने की जगह ढूंढ सकता हूं,
क्या करूं यह धरा वीरान हो गया है,
बुद्धिमानों का जमात हैवान हो गया है...
ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं की हमें चाहत नहीं है,
हम जैसे कितने विलुप्त हो गए लेकिन कोई आहत नहीं है,
इन पागलों का नाश निकट अब आया है,
महत्वाकांक्षा में मानवता ने बस इतना ही पाया है...
प्रकृति की गोद में चहक हम परिंदे खुश हैं,
हमारा किसी से यहां कोई बैर नहीं है,
हमारी दुर्गति देख आप अब भी सचेत नहीं हुए,
यकीन मानो मानवता की ख़ैर नहीं है...
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१९. नारी अस्मिता की विजयी
अय्याशो की महफ़िल में मर्दानगी की बाज़ी लगी थी,
अबला के चीख़ से पत्थरों की चारदीवारी भी सहमी थी,
दानवी ठहाकों के बीच लाचार क्रंदन था,
रावण दहन वाली सभ्यता में नारी अस्मिता का अभिनंदन था...
आँखो की अश्रुधारा को कृष्ण का इंतिजार था,
सभ्यताओं के संस्कृति में सुदर्शन चक्र लाचार था,
हवस के हब्शियों को अपनी शक्ति पर विश्वास था,
नारी शक्ति को भी अपनी दुर्बलता का एहसास था...
अचानक हीं अबला को देवी शक्ति की अनुभूति हुई,
शक्ति प्रदर्शन को लालायित हब्शियों की ख़ूब दुर्गति हुई...
एक झटके में नग्न वदन को पंजे से छुड़ाया था,
मौत भी काँप जाये क़हर उसने ऐसा मचाया था...
कोमल हथेलियों ने जब कटार को थाम लिया,
मर्दानगी ठोंकने वाले कईयों का जान लिया,
अंतिम शख़्स नारी शक्ति के इस अद्भुत पराक्रम से अनजान था,
क़रीब आने पर पता चला यह उसकी ख़ास सखी का भाईजान था ...
ऐसे भाइयों के शव पर उसकी बहन ने भी थूका था,
हब्शियों के दुःसाहस पर नारी अस्मिता के विजयी का सुनहरा मौका था ...
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२०. मोबाइल जिंदगी
कबाड़ी में पड़ा मोबाइल,
इंसानी फ़ितरत का हुअा शिकार,
कभी जिंदगी में सबसे ख़ास था,
अहंकार टूटा जब हुअा बेकार ...
चिपक कर जिसने संग घंटो बिताया,
दोस्तों संग अपनी प्रेमिका को पटाया,
जिसकी बदौलत सोशल मीडिया में सुर्खियां पाया,
अचानक हीं उसे कबाड़ी को थमाया ...
धरती पर यह जो मानव है,
स्वार्थवश पल में बनता दानव है,
मानवीय स्नेह कृपा का जिसे होता अहंकार,
कष्टदायक होती यह जिंदगी नरक बनता संसार...
कबाड़ी वाला भी बिल्कुल हतप्रभ था,
अपनी दुर्गति का मोबाइल को भी कहाँ ख़बर था,
नशा जब तलक उसका टूटा था,
सिम और चिप से उसका साथ छूटा था ...
सिम खुशनुमा हालात है,
चिप संजोने लायक यादाश्त है,
मानव की इतनी हीं अहमियत है,
फ़िर सबकुछ सुपुर्दे ख़ाक है...
सूर्य चन्द्रमा इस सृष्टि में गवाह हैं,
मानवीय स्वार्थ कृत अनंत गुनाह हैं,
गुनहगारों की भी पूजा होती है,
यह सिर्फ वक्त और हालात की बात है ...
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२१. ठगी
ठगी बहुत बढ़िया धंधा है ,
खुद को समस्या से बाहर निकालने का,
बस थोड़े बड़े-बड़े बोल बोलने होते हैं,
सच-झूठ के खट्टे-मीठे जहर घोलने होते हैं....
वक्त पर सच सामने आ जाता है,
सहयोग और मदद करने वाला कठोर सजा पा जाता है,
बहुत दर्द होता है ठगे जाने पर,
कसक उस समय और भी बढ़ जाता है,
ठगने वाला जब हो अपना कोई...,
वक्त का मरहम हर दवा का ईलाज है....
पश्चाताप की बीमारी लेकिन लाईलाज है ...
यह एहसास ही बहुत पीड़ादायक है...
इस दर्द को झेलना आसान नहीं,
अक्सर लोग इसे भूल जाते हैं,
शायद यही इसका समाधान है,
अन्यथा डिप्रेशन, मानसिक असंतुलन, आत्महत्या कई व्यवधान हैं ....
हर कुछ आपके मनमुताबिक नहीं हो सकता ...
ये कोई जन्नत नहीं,
ये दुनियाँ जहाँन है ...
फिर भी एक बात है ...
ठगी उतनी बड़ी समस्या नहीं,
जितना कि इसका एहसास है,
आप ठगी की समस्या से उबर सकते हो ...
लेकिन अगर कोई हर पल आपको इसका एहसास दिलाये ...
भूली बातों को भी याद दिलाये ...
समस्या ये बहुत बड़ी होती है ...
इसके कारण कई जिंदगी खत्म होती है ......! ! ! !
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२२. आदमी का रंग . . .
कुत्ता चाहे जितना तगड़ा हो
दुम टेढ़ी होती है
आदमी जितना दुष्ट हो
जुबां उतनी मीठी होती है
वैसे मीठा मैं भी बोलता हूँ
किसी की जिंदगी मे ज़हर नही घौलता हूँ
पर इन मीठी जुबान वालों का
दिल चाहे जितना काला हो
चेहरा बहुत भोला होता है
जब मतलब निकाल जाते हैं इनके
हर शब्द शोला होता है
इसका ये मतलब नही
तीखी बोलने वाले
बड़े अच्छे होते हैं
विचार मे जिनकी सादगी हो
जुबां भी शहद से मीठे होते हैं
धोखा अक्सर लोग वहाँ खा जाते हैं
जिनकी जुबां शहद सी मीठी हो
लेकिन दिल अलबेली जलेबी हो
ये गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं
हर पल ढंग बदलते हैं,
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२३. 🤓🤓 कुटिल वाणी 🤓🤓
इस जहाँ में सिर्फ आदमी बोलता है,
अपनी वाणी से कुछ लोग शहद
तो कुछ लोग ज़हर घोलता है,
अक्सर उनकी बातें बड़ी हो जाती है,
उनका शख्सियत भी बड़ा हो जाता है,
वाणी में जिनकी इंसानियत बोलता है,
कुछ लोगों की बातें
दिल को छू जाती है,
कुछ लोग अपनी जुबान से
कई जख्मों पर मरहम लगा जाते हैं,
कुछ की बातें आदमी तो आदमी
कई कौम को तबाह कर जाते हैं,
बड़ी शिद्दत से
भगवान ने इंसान को बनाया है,
इसी जुबान ने कितने को हैवान बनाया है,
महाभारत का शकुनि,
रामायण की सुमिंत्रा,
ये कोई गैर नही थे,
जिन्होंने अपना होकर
अपनों का अस्तित्व मिटाया,
अक्सर हम लफ्जों के जाल में फंस जाते हैं,
शातिर लोग इन्हीं लफ्जों से कई चाल चल जाते हैं,
कई लोग दिल के बिल्कुल बुरे नही होते हैं,
इन्हीं शातिरों के जाल में कई घर जल जाते हैं,
दुश्मन अगर करे सामने से हमला,
अक्सर उसे अपनी ओकाद समझ आ जाती है,
अपना बन कर जो चलाए,
जुबां से कुटिल बाण,
सुंदर चमन को भी वो मिटा जाती है!
इनकी फितरत, इनका नज़रिया,
खुद पर ना हावी होने दीजिये,
अपने मस्तिष्क के अंतरंग में,
किसी को विषफल के पौधे नही बोने दीजिये,
ऐसे लोगों की जुबां बहुत मीठी होती है,
जिंदगी को बीच मझधार में ले जा कर ये तो डुबोती है....
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२४. दिल को फ़िर से बच्चा बना दे . . .
वो दोस्त कहाँ गये
जो देखते ही मुस्कुरा देते थे
उन्हे सिर्फ मेरी फिक्र थी
मेरी बट्वे की नही
आज रिश्ता उतना ही घन्सिठ होता है
जितना बटवा भारी हो
वरना कोई आँख भी नही मिलाता
चाहे सड़क कितनी भी संकरी हो
निगाहों से गिर कर भी
लोग उनसे निभा लेते है
आपका बटवा अगर भारी हो
तो लोग सिर पर उठा लेते हैं
धोखा खा खा कर बहुत कुछ सीखा है
लेकिन कैसे कह दूँ
अब ठगा नही जाऊँगा
इसलिए एक चीज मुझे लौटा दे
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे
वैसे तो जंग मैंने ही छेड़ा है
क्योंकि इम्तिहान से मुझे डर नही लगता
ये बात अलग है कि
तू इम्तिहान सबका लेता भी नही
पर हो सके तो एक चीज़ मुझे लौटा दे
मेरे दिल को फ़िर से बच्चा बना दे
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२५. पैसा
पैसा ने दिन दिखाया ऐसा
कुत्तों को देखा
उनकी दुम भी देखी
कभी जो भौंकते थे
चेहरा देख कर
उन्हे तलवा चूमते भी देखा
पैसों के लिये
मैंने खुद को भले ना गिराया हो
पर इस पैसे ने मुझे बहुत गिराया है
अगर ये है तो बहुत कुछ पास है
अगर ये होता तो बहुत कुछ पास होता
कुत्तों को भी देखता
भौंकते भी देखता
तलवा चाटते भी देखता
पर राज़ की बात
शायद नही जान पाता
जिंदगी बहुत प्यार है मुझे तुमसे
पर तुम बहुत बेवफा हो
मैंने कई जिंदगी सजाने को सोचा
कि तुम मुझे प्यार करोगी
पर तुमने हमेशा मुँह चिढाया
कि तेरी औकाद है क्या ????
जब जिंदगी से नफरत होने लगी
तभी ये पैसा आया
थोड़ी इज्जत थोड़ा प्यार लाया
पर जिंदगी अब मै तुम्हे फ़िर प्यार करने लगा हूँ
इन पैसों के कारण नही
वो तो है मेरी . . . 😜😜😜
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२६. बलिदान
वो लोग कुछ और थे . . .
उनकी बात कुछ और थी . . .
लोग पूछते हैं
उन्होंने क्या दिया
आत्मसम्मान के लिये
अपने देश के लिये
हम भारतीयों के लिये
अपनी मिट्टी के लिये
औरतों की सुरक्षित आबरू के लिये
बच्चों के स्वर्णिम भविष्य के लिये
उन्होंने वो दे दिया
जिसके लिये आज लोग कहते हैं
कि वो है तो जहाँ है
नमन उस वीर सपूत को
जिसने अपनी मातृभूमि के लिये
अपना सबकुछ समर्पित कर दिया . . .
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२७. खाली सफे
मुझे रहने दो कागज़ पर
ही लफ्ज़ बनकर
यहाँ खुलती है जुंबा
होंठ सील जाते है
कहना नहीं चाहते
कमबख्त चंद शेर धोखा दे जाते है
और क्यों गला घोटूं नीली स्याही का
जब खाली सफ़े भी बहुत कुछ कह जाते है,
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२७. जिंदगी
ए जिंदगी सुना है तेरे बहुत रंग है
दुनियाँ तेरी बड़ी रंगीन है
आदमी कुछ ज्यादा ही गिर गया है
तू मान या ना मान
मामला बड़ा संगीन है
आरजू बड़ी हो
कोई बात नही
मंजिल मुसाफिर को ना मिले
उतने बुरे हालात नही
लेकिन दिमाग तो सदियों से बुरा रहा है
दिल भी बुरा हो चुका है
अब प्यार कोई दिल से नही
हैसियत से करने लगा है
कल तक लोग अपनो के लिये
अपनी हैसियत मिटा देते थे
आज हैसियत की फिक्र मे
आदमी बेमौत मरने लगा है
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२८. नया_मोड़
वक्त की निर्बाध प्रवाह में,
जिंदगी के पन्ने पलटते गए,
अश्रु की तेज धार में,
सपनों के महल लूटते गए,
हक़ीक़त के पथरीले पथ पर,
कठिन दौड़ से होता रहा सामना,
मजबूरियों का भेंट चढ़ गया,
जिन सुखद अहसास का था कामना,
गैरों से निरर्थक भय था,
अपने ही सपनों के हत्यारे थे,
दिल पर कहर उन्होंने ही ढ़ाया,
जान से ज्यादा जो प्यारे थे,
मानव मन का दृढ़ संकल्प,
ढूंढता उल्लास का नया विकल्प,
टूट कर बिखर फ़िर संभल जाता है,
अक्सर नया इतिहास बनाता है,
जीवन के ज्वार भाटे से,
बवंडर में थोड़ा डगमगाते से,
जिजीविषा के शरण में जाता है,
उन्नति का नया मार्ग पाता है,
लक्ष्य अक्सर जिसने चुना कठिन,
पुरुषार्थ से बनाता रहा मुमकिन,
भावनाओं से जब भी खिलवाड़ हुआ है,
जीवन को एक नया मोड़ मिला है,
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२९. भीड़_तंत्र_की_निर्दयता_से_सारा_देश_डर_गया...
कितना अजीब,मांगा खूब रहम का भीख,
सामने थे दुष्टों के वंशज, क्रूर दानव पतित,
बिना गुनाह तीनों तड़प तड़प कर मर गया,
भीड़ तंत्र की निर्दयता से सारा देश डर गया,
हिन्दू ह्रदय सम्राट की पावन धरती पालघर,
पागल कुत्तों का झुंड थे बिल्कुल बेखौफ निडर,
अत्याचार की अनंत गाथा से मानवता सिहर गया,
भीड़ तंत्र की निर्दयता से सारा देश डर गया,
लाठी डंडों से बुजुर्ग साधु संतो पर निर्मम वार,
अनसुनी रह गई उनकी हृदयविदारक चीत्कार,
कानून का रखवाला ही इज्जत उसकी हर गया,
भीड़ तंत्र की निर्दयता से सारा देश डर गया,
आम आदमी के जेहन में सिर्फ एक सवाल,
किन पापियों ने किया इंसानियत को कंगाल,
क्षत विक्षत शव सबको आतंकित कर गया,
भीड़ तंत्र की निर्दयता से सारा देश डर गया,
हर भारतीय के दिल से आती सिर्फ एक आवाज,
क्रूरता का नंगा खेल खेलने वालों का हो सत्यानाश,
उपद्रवियों का उत्पात सोचने को विवश कर गया,
भीड़ तंत्र की निर्दयता से सारा देश डर गया
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३०. देखिए, एक परिंदा प्रतिद्वंदी समझकर निगरानी करने वाले ड्रोन पर ही आक्रमण कर बैठा...
डर
हमें बहुत डर लगता है,
तेरी नादानियों से,
अनवरत अनंत मनमानियों से,
अपने अस्तित्व की भीख मांग रहे,
मूक असहायों की अनसुनी कहानियों से,
असंतुष्ट अतृप्त तेरी कामनाओं से,
तरक्की की उन्माद में,
मृत दूषित हो चुकी तेरी भावनाओं से,
जीवों के अनसुनी चीत्कार हाहाकार से सराबोर,
हर्षित होकर नृत्य करने वाले तेरी दुर्भावनाओं से,
हमारा आश्रय छीनकर,
उन्मुक्त परिंदों को कैद करने वाले मेहरबानियों से,
अपना अस्तित्व खो चुके हम जैसों की कुर्बानियों से,
सारी सीमाओं को क्षत विक्षत करने वाली,
प्रकृति से होने वाले नित्य छेड़खानियों से,
जलवायु परिवर्तन से हैरान,
जीवन संकट में डालने वाली कठिनाइयों से,
विषाणु जनित रोगों के कारण,
तिल तिल कर मर रहे मानव जीवन की परेशानियों से,
विध्वंस के ढ़ेर पर बैठ,
तेरे मन में पनप रहे शैतानियों से,
फिर भी मुझे पता है,
मानव तुम्हें डर नहीं लग रहा,
मैं खुद डर रहा हूं,
तेरी अति महत्वाकांक्षाओं को देख,
मेरे मन में उत्पन्न होने वाले हैरानियों से...
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३१. पालनहार का संस्कार
सिक्कों की खनकती आवाज,
इसी चाहत में लूट गया बचपन बिंदास,
फिर भी समझौता गमों से किया नहीं,
लोकतंत्र के आकाओं ने क्या दर्द दिया नहीं ??
रोटियों के लिए रहा मोहताज,
किसान का बेटा कैसे उठाऊं आवाज,
अन्नदाताओं ने कैसा कष्ट सहा नहीं ?
जिसे भी बनाया मालिक, किसानों का अपना रहा नहीं,
परिश्रम हमारा परम धर्म,
फल की चिंता नहीं, करता हूं अपना कर्म,
लाख चुनौतियों में भी डरा नहीं,
कैसे कह दूं, अपनों का पेट भरा नहीं ?
आत्मा करती है विद्रोह,
हमारी उपज का उचित मूल्य दो,
बिचोलियों ने कौन सा जुल्म किया नहीं ?
हमारे अरमानों की हत्या से किसी को फर्क पड़ता नहीं,
दर दर पर खाता हूं फटकार,
ऐसे जीवन को धिक्कार,
बिना दलालों के बैंकों ने ऋण दिया नहीं,
हमारी आत्महत्याओं से भी किसी का दिल पसीजा नहीं,
प्रजातंत्र के आका हो जाते अन्तर्ध्यान,
सत्ता की शक्ति, वेतन भत्ता का भी गुमान,
हमारी फटेहाली में कोई साथ रहा नहीं,
मेरी लाश उठ गई लेकिन मैं रिटायर हुआ नहीं,
उद्योगतियों का है खुमार,
उसके राहत को धन अपार,
किसी ने आत्महत्या किया नहीं,
आश्चर्य किसी नेता का काला धन मिला नहीं,
यह कैसा लोकतंत्र का संस्कार,
अपनी किस्मत पर रोता जहां पालनहार,
शहीदों ने ऐसी आजादी का कल्पना था किया नहीं,
फिर भी खुश हैं हम, आजतक देशद्रोह किया नहीं।
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३२.करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण
कर रहे तर्पण, श्रद्धा सुमन अर्पण,
प्रज्वलित दीपमालाओं का समर्पण,
अपने भक्तों का स्वीकार करो निवेदन,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
आपके भक्तों की परीक्षा कठिनतम,
है पूर्ण विश्वास, होंगे लज्जित ना हम,
इसी आस में कर रहे दीपों का अर्पण,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
विपदा बड़ी, विचलित है सबका मन,
आप पर आश्रित और कहां जाएं हम,
आपका दिया विवेक, आपसे ही जीवन,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
है पूर्ण विश्वास, समाप्त होगा यह तम,
आप जल्द करेंगे प्रकाशपुंज का सृजन,
हम दरिद्रों ने किया है प्रयास अधिकतम,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
हमारे पालनहार, आप सृष्टि में श्रेष्ठतम,
दीपों की श्रृंखला से भक्त करें आह्वान,
करो कृपा हो शैतानी ताकतों का उन्मूलन,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण
स्वीकार करो प्रभु हमारा अभिवादन,
चलाओ सुदर्शन, रुक जाए चीरहरण,
संकट में अस्तित्व,आपके शरणागत हम,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
घनघोर अंधकार का तोड़ने घमंड,
हम मानव करें दीपों का प्रज्वलन,
अपनी दिव्य ज्योति से मिटा दो आतंक,
करो प्रभु अपने संतानों का संरक्षण,
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३३. कलमकार की ख्वाहिश
नहीं आह की कोई चिंता,
नहीं वाह की है ख्वाहिश,
निष्पाप मां करूं तेरी साधना,
मेरे मस्तिष्क को रखना पवित्र...
विवेक रखना मेरा शुद्ध,
साहस से करना नहीं वंचित,
मानवीय पीड़ाओं का मैं,
वर्णन कर सकूं बेबाक सचित्र...
शब्द मेरे हो इतने अनमोल,
छलियों को करे अचंभित,
वेदनाओं का करूं ऐसा वर्णन,
पल में पत्थर हो जाये द्रवित,
माया की तराजू तोले नहीं,
बदले कभी नहीं मेरा चरित्र,
कलम बंधन में बंधे सके,
मुझे बनाना नहीं इतना दरिद्र,
निश्चिंत रहूं मैं इतना,
निर्बल का कर सकूं जिक्र,
हक की लड़ाई का हो मामला,
किसी तीस मार खां का ना करूं फिक्र,
मजबूर कर सके कोई नहीं,
लालसाएं हो इतना सीमित,
गलतियां ख़ुद की स्वीकार करूं,
मेरे दिल को रखना पवित्र...
कपटियों का भय कम नहीं हो,
विचारधारा हो नहीं मेरा दूषित,
मेहरबानी तेरी मुझपर इतनी रहे,
नई रचना तेरे चरणों में करता रहूं अर्पित,
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३४. ले लो राम का नाम
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम,
अरे हम भी परेशान,
तुम भी परेशान,
होगा सबका निश्चित समाधान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम
गरीब होगा धनवान,
कमजोर बनेगा बलवान,
मूर्ख भी एक दिन पायेगा ज्ञान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम...
चोर हो या बेईमान,
दुर्जन हो या शैतान,
करेंगे सबका वही हिसाब तमाम,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम,
परेशान पहलवान,
संकट में खुलती नहीं जुबान,
सबका रखेंगे वही मान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम
भैया अमीर भी परेशान,
धन की लड़ाई का घमासान,
रखो विश्वास होगा सबका कल्याण,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का जन्म,
रोगी को मिले प्राण,
डाक्टर भी हैरान,
सारे रोगों का करता वही निदान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम,
संकट में हो प्राण,
या निकलती नहीं जान,
जुबां पर आता एक ही नाम,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम,
भीड़ हो या सुनसान,
बारात हो या श्मशान,
सब बिगड़ी बनावे वही महान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम...
हम भी अनजान,
भाई तुम भी अनजान,
किस रूप में वो आये करने समाधान,
ले लो राम का नाम,
ले लो राम का नाम...
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३५. #झमेला
लेकर आए, मेरे लिए लाख दुवाएं,
फिर भी दिल ने मुझको रोका है,
कर परख कर स्वीकार दुवाएं,
दरिया दिल दिखावा, अंदर धोखा ही धोखा है,
रजनी की भयावह कालीमा से क्यों भयभीत,
इसकी सादगी दुर्लभ, सरलता अनोखा है,
चकाचौंध रोशनी करती भले आकर्षित,
कलंक अदृश्य, श्रृंगार बहुत ही मैला है,
डगर कठिन, मगर है मुमकिन,
आत्मविश्वास तेरा क्यों डोला है,
पथ सुगम बताता है दुर्जन,
बिना तर्क बनता क्यों भोला है,
मित्रों के भीड़ में मत बन भेड़,
यह भेड़ियों का टोला है,
अपेक्षाएं रख अपनी सीमित,
परिस्थितियों ने मित्रों को तौला है,
आए जो काम, कठिनता तमाम,
होने देते नहीं तुम्हें अकेला है,
रखो इनका ख्याल, हो चाहे कितना बबाल,
यही अपने तुम्हारे, बांकि झमेला है...
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३६. दिया जलाने की आदत है ...
छोटा आदमी हूँ
मेरा ओकाद भी छोटा है,
अपने ईश्वर पर मुझे पुरा भरोसा है,
चाहे क़िस्मत कितना खोटा है,
कर्म करता रहता हूँ,
फल मीठे कम खट्टे ज्यादा है,
हौंसला कई बार टूट जाता है,
फ़िर भी कुछ ख़ास करने का इरादा है,
आंसू भी आंखो में आ जाता है,
मेहनत मेरा फल कोई और पाता है,
मायूस मैं कोई इतराता है,
किसी का हक़ हड़पना मुझे नहीं आता है,
वक्त का पहिया,
कब रुका जो अब रुकेगा,
क़िस्मत वालों बेशक खुशनसीब हैं,
हौंसला कब झुका जो अब झुकेगा ....
अतीत गवाह है,
साहस कई मर्ज की दवा है,
हार कर भी जिसे पूजता जहाँ है,
इसलिय कुछलोग हमसे खफ़ा है..
कई अपनों का मन भर गया है,
कई गैरों को अपना बना लिया है,
कुछ अपनों को आज भी शिक़ायत है,
कुछ गैरों को अपना बनाने की मेरी चाहत है ...
मैं सिर्फ़ अदना इन्सान हूँ,
छल-प्रपंच की दुनियाँ से थोड़ा अनजान हूँ,
दोष जहाँ लोग भगवान पर भी थोप देते हैं,
शिक़ायत से बच सकूं नहीं मैं ऐसा भगवान हूँ,
अंधेरी गलियों से अक्सर गुजर जाता हूँ,
लड़खड़ा कर गिरता फ़िर संभल जाता हूँ,
फ़िर भी इन गलियों में आने की चाहत है,
अंधेरा घना सही दिया जलाने की आदत है ...
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३७. जन क्रांति
जय जन क्रांति जय जन क्रांति,
जय जन क्रांति जय जन क्रांति
आओ मिलकर भरें ऐसी हूंकार,
स्वस्थ बने समाज, शिक्षा का हो प्रसार,
चारों ओर हो शांति ही शांति ...
जय जन क्रांति जय जन क्रांति...
जनता के सेवक से जनता सताए जा रहे हैं,
लोकतंत्र के मालिक आंसू बहाए जा रहे हैं,
आओ मिलकर दूर करें भ्रष्टाचारियों की भ्रांति,
जय जन क्रांति जय जन क्रांति
लाचारों के आंखों का आंसू जब पोछेंगे हम,
पूरा होगा स्वामी विवेकानंद वाले भारत का स्वप्न,
आयेगी हमारे देश में अमन चैन और शांति,
जय जन क्रांति, जय जन क्रांति
माना हमारा डगर थोड़ा कठिन है,
अपनी चट्टानी एकता पर हमें भी यकीन है,
हमारी चाहत सबकी तरक्की, सबकी उन्नति ...
जय जन क्रांति जय जन क्रांति
सेवा का जुनून जलाए रखना है,
संघर्षपथ पर नित्य आगे बढ़ते रहना है,
तभी मिलेगी चंद्रशेखर सुभाष भगत के आत्मा को शांति,
जय जन क्रांति, जय जन क्रांति
आओ बंधु हाथों से हाथ जोड़ लें,
राष्ट्र हित में अपने सारे मतभेद छोड़ दें,
हमारे प्रयास से भारतवर्ष में आयेगी क्रांति,
जय जन क्रांति जय जन क्रांति...
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३८. कर्तव्य पथ
आज फिर एक वर्ष बदल रहा है,
बेशक हालात भी बदलेंगे,
चुनौतियां भी बदलेगी,
परिस्थितियां भी बदलेगा,
ना बदलेगा सूरज,
ना ही चांद बदलेगा,
निज स्वार्थ में पतित,
ना कोई इंसान बदलेगा,
मानवता के पुजारियों का,
नहीं कोई सिद्धांत बदलेगा,
अपने ही बनाए उलझनों में उलझ कर,
फिर हर इंसान बदलेगा,
गर्त में खुद को गिड़ाकर,
सम्मान खोजते हैं,
अहंकार में जिसे खो दिया,
अब वही पुराना सुकून ढूंढ़ते हैं,
वक्त ने कई जख्मों को भरा है,
यह भी भर जाएगा,
कलुषित भावनाओं से बाहर आकर,
हमें अपना कर्तव्य पथ दिखेगा...
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३९. ऐसी ममता को नित्य नमन ...
माँ के ममता की छाँव है अनमोल,
इससे बढ़कर नहीं कोई स्वर्ग और भवन,
तेरे आशीषपूर्ण स्पर्श से हर जाए सारे दुःख,
ऐसी ममता क़ो नित्य नमन ....
इनके कठिन संघर्ष का मुश्किल वर्णन,
इनके त्याग का कठिन विवरण,
संतान की ख़ुशी के लिये सर्वस्व त्याग दे,
ऐसी ममता क़ो नित्य नमन ...
धड़कन की आवाज भी जिनकी देन है,
जिसने इस सुंदर संसार में क्या हमारा सृजन,
जिनके दूध का कर्जदार शरीर का कण-कण,
ऐसी ममता को नित्य नमन ...
ऊंचाई चाहे जितनी कर ले हम हासिल,
छू ले क्यों ना चाहे हम गगन,
जिनकी गोद में खेला हमारा बचपन,
ऐसी ममता को नित्य नमन ...
हमारी छोटी सफलता से पुलकित जिसका मन,
सबसे ज्यादा हमारी सफलता से मनाता हो जश्न,
कर्जदार उसका यह शरीर और यौवन,
ऐसी ममता को नित्य नमन ...
इस सृष्टि में अगर हो जाएं हम दफन,
मेरी मौत से पहले, ख़ुद के लिये मांगे कफ़न,
अपने कलेजे के टुकड़े के लिये करे सर्वस्व अर्पण,
ऐसी ममता को नित्य नमन ...
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४०. संघर्ष
झूठ की बुनियाद पर,
इंसान चतुर बन सकता है,
सत्य का पथरीला डगर पर,
जीवन मधुर बन सकता है,
मुंह पर जवाब नहीं पाकर,
खुद को हम शेर समझते हैं,
मजबूरियों से दबे इंसानों को,
बलि का सुलभ भेड़ समझते हैं,
परेशानियों से मुक्ति का एक ही रास्ता,
परिणाम से बेफिक्र कर्म से वास्ता,
लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में कोई अवरोध नहीं,
अपने कर्तव्यों के निर्वहन से जिन्हें कोई क्षोभ नहीं...
वक्त जब- जब अंगड़ाई लेती है,
चतुराई का पहाड़ मिनटों में ढहती है,
पाप के घड़े का फूटना तय है,
संघर्षशील की दुनिया करती जय है...
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४१. अपनों की उड़ान
जिंदगी है हर पल इम्तिहान,
डर नहीं लगता है,
बिना गुनाहों की सजा पाता रहा हूं,
इसी बात से दिल डरता है...
मुस्कुरा कर गम छिपा लेता हूं,
जबकि अंदर एक ज्वालामुखी जलता है,
अंधेरों से हमारी पुरानी दोस्ती है,
मेरी जिजीविषा से थोड़ा थोड़ा यह भी जलता है...
अस्कों को इसलिए संभाल कर रखा है,
साथ जलने वाले दियों की तपिश कम ना हो जाए,
मेरा हौंसला जिनके उड़ान का कारण है,
उनकी ऊंचाई कम ना हो जाए ...
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४२. जिंदगी का बोझ
माना कंधे पर थोड़ा कम वजन है,
बचपन की ख्वाहिशें भी दफन है,
खुश हूं क्योंकि बदन से दूर कफन है,
छोटी उम्र लेकिन हौसला मेरा बुलंद है...
मेरी उम्र के बच्चे अक्सर रो लेते हैं,
निश्चिंत होकर बेफिक्र सो लेते हैं,
मैं सिर्फ क़िस्मत को गालियां दे लेता हूं,
अपने पसीने से पेट की आग बुझा लेता हूं...
मेरा बोझ देख दया बहुतों को आती है,
कामचोर शराबी बाप को मां बहुत समझाती है,
मेरे कमाए पैसों को यहां वहां छिपाती है,
यही पीड़ा मेरे होंसले को बहुत रुलाती है ...
मैं धीरे - धीरे रोना भी भूल गया हूं,
वक्त के जालिम झूलों पर झुल गया हूं,
कष्ट पहुंचा कर मैं भी अब खुश हो लेता हूं,
दुनिया ने जो मुझे दिया वही उसे देता हूं ...
मुझे किसी से मदद की उम्मीद नहीं है,
मेरे जैसा हौसले का कोई अमीर नहीं है,
मुझ पर दुनिया वाले बिल्कुल दया नहीं दिखाना,
वक्त ने सिखा दिया है मुझे जिंदगी का बोझ उठाना...
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४३. सफलता का बहाना
लोगों के तानों से तंग इन्हीं तानों से तना,
बुनता रहा मैं जिंदगी का ताना बाना,
नहीं मेरी परेशानियां खत्म हुई और नहीं ताना,
हकीकत मेरे हिस्से आई और जमाने का हो गया अफसाना ...
इन तानों के चटकारे में हकीकत बना अफसाना,
सबको पहचान कर भी बनना पड़ा मुझे अनजाना,
मेरा हौंसला देख फ़िर भी हैरत में है ज़माना,
तेरी इसी हैरानी को देख खुश है यह संघर्ष का दीवाना...
सलाम तेरे हुनर को सलामत रहे तेरा ताना,
जख्मों पर नमक छिड़कने में अव्वल तुं हो जाना,
ऊपर वाले मुझ पर सिर्फ इतनी रहमत तुम फरमाना,
कठिन हालातों में भी विचलित न कर सके मुझे कोई ताना...
मेरी मजबूरियों का मज़ाक सोच समझकर बनाना,
कोई मजबूर ऐसा नहीं जिसे ताना मारती नहीं ज़माना,
इन ताने मारने वालों के बस में नहीं कोई जिंदगी सजाना,
और हम जैसे पागल बनाते हैं इसे सफलता का बहाना,
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४४.मेरे अपने जो रूठ गये ...
शिकायत तो सबको मुझसे है,
तुम्हें है तो क्या बात हुई,
आज तक किसी की शिकायत खत्म ना हुई,
मैं थक गया और आधी जिंदगी बर्बाद हुई ...
बेशक मुझसे कोई खुश नहीं है,
मुझे खुश रखने का प्रयास कितनों ने किया है,
सारी जिंदगी में दूसरों को खुश रखने का प्रयास करूं,
क्या इस धरती पर मैंने इसलिए जन्म लिया है...
अपने दुख का लोग खूब ढोल पीटते हैं, अपने गिरेबान में यहां झांकने की किसी को फुर्सत नहीं है,
शिकायती लोगों से मैंने यूं ही दूरियां बना ली है,
हर किसी के शिकायत को दूर करना अब मेरी आदत नहीं है...
बहुत लोग पहले से रूठे हैं,
कुछ और लोग रूठ जाएंगे,
फिकर जिन्हें मेरी है वह आज भी मेरे साथ हैं,
अफ़सोस क्यों करूं कुछ मतलबी लोग और भी टूट जाएंगे ...
अकेलेपन से अब मुझे डर नहीं लगता है,
हां आस्तीन के सांपों से बहुत डरता हूं, हर किसी को दिल में अब मैं नहीं बसाता हूँ,
जो दिल में बसता है उसी के लिये जीता- मरता हूं ...
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४५. ज्यादती
हमदर्द बन कर आए वो,
जिन्हें हमारे दर्द का पता नहीं था,
कितने नासमझ बनते हैं ये लोग,
जिन्होंने हमें यह दर्द दिया था ...
तेरी गुस्ताखी कुछ ख़ास नहीं है,
मैं हीं कुछ ज्यादा समझदार हूँ,
भरोसा हर किसी पर करना मुनासिब नहीं,
बिना दक्षिणा इस ज्ञान को देने का कर्जदार हूँ ...
मेरे यक़ीन का महल राख हुआ है,
बेशक बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ है,
फ़िर भी ख़ुश हूँ क्योंकि तेरी अदा गजबनाक है,
खंजर भौंक कंधे पर हाथ रखना अब नहीं शर्मनाक है...
गिरगिट भी शर्म से पानी-पानी हुआ,
भीड़ में जब तूने रब से मेरे लिये मांगा दुआ,
इतना बेहयापन तूने कहाँ से पाया है,
सबकुछ निगल कर ख़ुद को भूखा बताया है...
सत्ताधारी ना जाने क्यों भूल गये हैं,
कितने सल्तनत धूल में मिल गये हैं,
जनता इन कष्टों को झेलने की आदि है,
तेरा इस कदर हमदर्द बनना सबसे बड़ी ज्यादती है ...
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४६. पूज्यनीय
सुना-सुना लगती है यह जिंदगी,
अनसुना जब रह जाये कोई विनती,
सुनना हीं हमेशा समाधान नहीं होता है,
सुन कर भी मनुष्य मनुष्यता खोता है...
सुमिन्त्रा को सुन कर आयोध्या रोया था,
दुनियां की सुन कर राम ने सीता खोया था,
राज पाठ लूट गया जब हरिश्चंद्र सोया था,
कहना मुश्किल किसने क्या काटा क्या बोया था ??
अक्सर परीक्षा अच्छे लोगों की होती है यहाँ,
अद्भुत प्रेम फ़िर भी श्याम से महरूम हुई राधा,
कर्ण दानवीर था, इसलिय ईश्वर ने हीं उसे छला,
स्त्री दाव पर लगी, युधिष्ठर से सवाल किसने किया ? ? ?
भीष्म ने अपनों के लिये सिंहासन त्याग दिया,
उन्हीं अपनों ने संपूर्ण शरीर को बाणों से सजा दिया ...
जीतने वालों की गलतियों को कौन पूछता है,
पूज्यनीय वही यहीं यहाँ अंत में जो जीतता है ...
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४७. हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है ...
पथ कठिन, कांवरियों क़ी भीड़ कहाँ हारा है,
बाबा भोला को सब भक्तों ने पुकारा है,
चारों ओर बोल बम का गूंजता नारा है,
हम भक्तों का बाबा सिर्फ़ तू हीं सहारा है..
सावन का महीना, बारिश का मौसम,
बाबा क़ी नगरी पहुँच झूमता है मन,
बीच भंवर से निकाल करता किनारा है,
हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है ...
ना कोई बड़ा, ना कोई यहाँ छोटा है,
तेरे दर आनेवाले के मन तू हीं बैठा है,
हर बिगड़ी को बाबा तूने हीं संवारा है,
हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है...
महिला-पुरुष हो या बच्चे जवान,
बोल बम का नारा करता सब समाधान,
तेरी महिमा बाबा सबसे न्यारा है,
हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है ...
भंगेड़ि गंजेड़ि भी तेरी भक्ति में झूमता है,
सबके दिल क़ी एक तू हीं सुनता है,
इतना दयालु बाबा भोला हमारा है,
हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है ...
तेरी सरलता का मैं क्या करूं बखान,
बैजू महामण्डित तोड़ा रावण का गुमान,
इसलिय तू भक्तों को सबसे प्यारा है,
हम भक्तों का बाबा तू हीं सहारा है ...
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४८.जाहिल
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
महफ़िल में तीन लोग थे,
मैं, मेरी ख़ुशी औऱ मेरी जिंदगी,
जिंदगी को झुक कर आदाब क्या किया,
ख़ुशी बिल्कुल रूठ गयी है,
ग़म को जबसे अपनी जिंदगी बनाया है,
बहुतों से दोस्ताना टूट गयी है,
इन टूटे दोस्ताने से मैं फ़िर भी बेख़बर हूँ,
सच्चे दोस्तों से रू ब रू हुई मेरी जिंदगी है ...
भीड़ में थोड़ा तन्हा जरूर हूँ,
फ़िर भी सुकून महसूस होता है,
ख़ुशी अपने साथ भीड़ लेकर आयी थी,
ग़म ने उनका तासीर बताया है,
ख़ुद को बहुत होशियार समझता था,
मेरे जिंदगी ने मुझे कितना जाहिल बताया है...
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४९. मुसाफिर
मुसाफ़िर ढूंढ़ते हैं तो किनारा मिल हीं जाता है,
मुसीबत हो चाहे कितनी बड़ी, रब का इशारा मिल हीं जाता है ...
कृपा अगर उनकी हो, बीच मझधार से भी आदमी निकल जाता है,
इशारे समझना जो नहीं चाहते, किनारे पर भी वह डूब जाता है ...
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५०. समाधान
शब्दों के बहुत मायने होते हैं,
सवांद अदायगी रिश्तों के आईने होते हैं,
बातें संसद औऱ अदालत में भी बहुत होती है,
आधा कुतर्क आधे स्वार्थ-सिद्धि के अफ़साने होते हैं ....
हक़ीक़त अत्यंत क्रूर होता है,
इन्सान कब हमेशा मजबूर होता है,
वक्त को करवट बदलने की आदत है,
चुनौतियों से मुंह मोड़ने वालों को मिलती नहीं राहत है,
अफ़साने की दुनियाँ में जब कोई मगरूर होता है,
अपने जीवन की कश्ती किनारे पर डुबोता है,
वक्त के हाथों कौन यहाँ लाचार नहीं होता है,
कर्म से बड़ा कोई उपचार नहीं होता है,
सरलता से हर समस्या का समाधान नहीं होता है,
सुखकी तलाश में अक्सर सुख हीं कुर्बान होता है,
हमेशा भगवान की दहलीज पर सर पटकना समाधान नहीं होता हैं,
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५१.जवानी
जीवन के अतीत के पन्नों की भी अजीब कहानी है,
जिंदगी उमंगों में बिताना हीं जिन्दगानी है,
बचपन बडे़ होने के सुखद अहसास का भेंट चढ़ गया,
बुढ़ापा आने पर समझ आया सबसे बेहतर जवानी है...
जिससे पूछो समस्याओं से घिरी एक कहानी है,
बेरहम वक्त ने किया बहुत मनमानी है,
नर निराश ना हो समस्याएं आनी-जानी है,
सच पूछो बिना संघर्ष व्यर्थ यह जवानी है....
जीवन सुख-दुःख का हीं रवानी है,
खुशियों का एहसास भी आँखो में लाता पानी है,
बाधाओं से मुस्कुरा कर जूझने वालों का जग भी दीवानी है,
चुनौतियों के चोटी पर झंडा फहराये वही जवानी है,
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५२.न्याय का बाज़ार
काला कोर्ट भी दागदार हुअा है,
अन्याय के जख़्मों से यादगार हुअा है,
लक्ष्मी की बेवफ़ाई से निर्धन लाचार हुअा है,
न्याय का मंदिर भी बाज़ार हुअा है ..
काले कोर्ट की धाराओं में पढ़ा लिखा गंवार हुअा है,
धनवानों के गुनाहों को छिपाने का यह हथियार हुअा है,
कानूनबाजी के गफलत से जीवन इनका गुलजा़र हुअा है,
न्याय का मंदिर भी अब बाज़ार हुअा है ....
शोषण दमन से पीड़ित व्याकुल संसार हुअा है,
इनकी कारिस्तानि से अपराधी होशियार हुअा है,
इंतिज़ार में पलकें पथराई न्याय की आश में बेकरार हुअा है,
न्याय का मंदिर भी अब बाज़ार हुअा है ...
अंबेडकर के वंशजो का यह क्या हाल हुअा है,
विधियों की उलझनों में आमजन बेहाल हुअा है,
न्याय के विश्वास पर आघात बहस शानदार हुअा है,
न्याय का मंदिर भी अब बाज़ार हुअा है ...
विश्वसनीयता धूमिल काले कोर्ट का अजीब संस्कार हुअा है,
न्याय मिले ना मिले पूज्यनीय यह मजार हुअा है,
गरीबों के अरमानों का यहाँ कई बार बलात्कार हुअा है,
न्याय का मंदिर भी अब बाज़ार हुअा है ...
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५३. मानवता से प्रेम का साहस
जीवन में आँधियों का दौड़ है,
समस्याओं का पहाड़ चहुंओर है,
मानव की जिजीविषा कहाँ रणछोर है,
साहस का सिकंदर हीं जगत में सिरमौर है...
आने वाला अभी कठिन कई मोड़ है,
चुनौतियों के वज्रपात का चारों ओर शोर है,
कर्मवीर की कर्मठता का हीं सर्वत्र ठौर है,
साहस का सिकंदर हीं जगत में सिरमौर है,
अश्रुधारा के स्नेहाशीष से पावन दिल कठोर है,
महत्वाकांक्षा का उल्लास करता नृत्य जैसे मोर है,
अंधकार पर विजय हेतु आनेवाला संघर्ष का भोड़ है,
साहस का सिकंदर हीं जगत में सिरमौर है,
अपना-पराया के अहंकार को वक्त ने दिया झकझोड़ है,
स्वार्थी अपनापन का भीड़ भागा छोड़ है,
इंसानियत से रु ब रु मानवता का स्वर्णिम दौड़ है,
साहस का सिकंदर हीं जगत में सिरमौर है,
कुरआन की आयत, भगवान की इनायत,
आराधना की सभी विधियों का अंतिम निचोड़ है,
ढ़ाई आखर प्रेम से बढ़िया धर्म नहीं कोई और है,
साहस का सिकंदर हीं जगत में सिरमौर है...
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५४. उम्मीदों का शीशमहल
अपनी हीं परछाईं से लोग ना जाने क्यों परेशान है,
गंगू तेली बन बैठा सिकंदर राजा भोज गुमनाम है,
नक़ली आंसुओं के भेंट चढ़ गये भव्यता लिये जो अरमान है,
रब की मेहरबानी है या किसी के दिये सौगातौ का एहसान है,
उलझनें अक्सर उनकी बढ़ जाया करती है,
उम्मीदों के शीशमहल में करता जो आराम है,
छटपटाहट अक्सर उनकी कुछ ज्यादा दीखती है,
इंसानी कायदों से रहते जो अनजान है,
अपनों के अपनापन की इतनी भी तलाश क्यों ? ?
नीड़ के सागर के बीच बेसब्री की यह प्यास क्यों ? ?
ऊपर वाले भी हमारी मजे ले रहे हैं,
प्रसन्नता की चाहत में हर कोई इतना उदास क्यों ? ?
हालात समझना मुश्किल अंगुली उठाना आसान है,
जीवन के तपोभूमि में खचाखच भीड़ के बीच सुनसान है,
इस भीड़ में भी अपनी चमक खोने नहीं देना,
कर्मवीर की यही सबसे बड़ी पहचान है...
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५५. पहला प्रेम पत्र
(हास्य कविता )
मैंने उसे आज एक ख़त लिखा है,
दिल का इजहारे मोहब्बत लिखा है,
यादों से कभी रुखसत नहीं होती हो,
जिंदगी से रहता हूँ बेख़बर हरवक्त लिखा है,
मैंने आज एक प्रेम पत्र लिखा है ....
उसने भी मुझे प्यार से ख़त लिखा है,
पहली लाईन में हीं कमबख्त लिखा है,
तरस मुझ पर उसे बहुत आया है,
अपनी सेंडील को बड़ा सख़्त लिखा है,
कभी हुअा अगर तेरा मेरा सामना,
प्यार का भूत मिनटों में उतर जायेगा,
ख़ुद को उसने चंडी का भक्त लिखा है...
उसने भी प्यार से मुझे ख़त लिखा है...
पहला ख़त हीं मेरे इश्क़ का दफ़न कब्र निकला है,
जवाब देने का अब तक नहीं मुझे फुरसत मिला है,
भरी बाज़ार में मुझसे हीं टकराने का उसे वक्त मिला है,
सेंडील से पहले उसकी जुबां सख़्त निकला है,
ई मेल के जमाने में गदहे तूने ख़त लिखा है,
सिर्फ 399 के रिचार्ज पर बदल जायेगी तेरी क़िस्मत,
ऐसा प्यारा मुझे मोहब्बत मिला है ...
मैंने आज एक प्रेम पत्र लिखा है ...
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५६. शक्की बीबी
(हास्य कविता)
बीमारी का बहाना बनाकर,
अपने कुछ नखरे दिखाकर,
मेरे संडे को ख़राब करने की उसने ठानी थी,
बड़ी अजीब उसकी मनमानी थी...
कूलर से गर्म हवा आ रही थी,
गर्मी से ज्यादा बीवी का डर सता रही थी,
कर्म फुट गये इस निठल्ले को पाकर,
ऐसा हीं पड़ोसन को बता रही थी,
आते हीं सिर पर चढ़ कर बोली,
तुमसे खाना भी ठीक से बनता नहीं,
झाड़ू-पोंछे के लिये मौजूद है नौकरानी,
कपड़े अब तक क्यों धोये नहीं,
कूलर में कब भरागे पानी ...
बंदा मैं भी हाजिर जवाब था,
नौकरानी का कर रहा हिसाब था,
मालिक बनने की मेरी कोई ख्वाजाईश नहीं,
मैं तुम्हारी हीं नौकरानी के पास था...
बीवी का माथा हुअा गर्म,
आती नहीं है तुमको शर्म,
तनख्वाह मैंने कब कर दिया भुगतान,
ख़ूबसूरत बीवी के रहते करते हो ऐसा काम...
आज मैंने भी मौका पाया था,
गाय समझ कर साड़ पाया था,
कभी कहती हो करने को काम,
कभी लगती हो लगाने इल्जाम,
मैं तेरे झांसे नहीं आने वाला हूँ,
काम के डर से नहीं भागने वाला हूँ,
तुमसे भली यह नौकरानी है,
कूलर में उसने भर दिया पानी है,
जाओ जा कर करो आराम,
मुझे करने दो नौकरानी संग काम,
बीवी का चेहरा हैरान है,
मैं कर लूंगी जो बचा काम है,
जाओ जाकर धोनी की batting देखो,
टूटेगी टांग ज्यादा डोरे ना फेंको,
तबियत मेरी इतनी ख़राब नहीं,
मेरी खुशियों का तो कोई हिसाब नहीं .....
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५७. चुनावी भिखारी
आज दर पर एक पुराना भिखारी आया था,
मक्के की रोटी संग सरसों का साग खाया था,
इन्द्रा आवास संग वृद्धापेंशन का कभी सपना दिखाया था,
चुनावी बयार ने पाँच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ....
काकी के चरणों पर लोट-पोट शरमाया था,
कैंची सी जुबां वाली काकी को देख घबराया था,
चरणों से उठा काकी ने खाट पर बिठाया था,
चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था,
कमबख्त के चेहरे को देख बेटा तूफ़ान था,
सरकारी दफ़्तरों में ठोकर खा-खा कर परेशान था,
बदसलूकी ना कर भिखारियों से काकी ने समझाया था,
चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद भिखारी बनाया था ...
भोजन संग आशीर्वाद पाकर भिखारी गदगद था,
संस्कारों के बंधन में काकी ने दबाया नफ़रत था,
बेशर्मों के बादशाह ने ख़ुद को महान बताया था,
चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ...
सामने खड़ी एक पगली थी,
कालिख पोत भिखारी संग मनाई होली थी,
बात बड़ी नहीं भिखारी ने बाथरूम आलीशान बनवाया था,
चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ...
शरीफों की बस्ती में एक पागल ने कुछ ऐसा कर दिया,
क़लम के सिपाहियों के गाल एक तमाचा जड़ दिया,
झूठे वादों के मकड़जाल में काकी ने उसे माला पहनाया था,
चुनावी बयार ने पांच वर्ष बाद उसे भिखारी बनाया था ...
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५८. आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ...
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है,
ख़ून-पसीने से सींची गई अरमान सिसक रही है,
जिंदगी में घुटन-पीड़ा का उफान आया है,
अन्नदाता के उम्मीदों को श्मशान बनाया है,
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ...
जिन पर बीत रही उनका हाले दिल क्या बताऊँ,
ख़ुद के हलक से नेवाला गटकना हो रहा मुश्किल,
उस महापुरुष को नेवाला कैसे खिलाऊँ,
माँ धरा रो रही, आसमां भी रो रहा है,
ऐसा यह वक्त हैवान आया है,
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ...
जिस हरियाली को देख सीना चौड़ा हो जाता था,
प्रकृति के कहर ने दिल पर हथौड़ा चलाया है,
आंखो के सैलाब से आत्मा रो रही है,
आश्रितों की उदासी, महाजन के तगादे ने आत्महत्या का पैगाम लाया है,
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है...
ऊपर का भगवान रूठा है, नीचे वाला झूठा है,
मजबूरी की आँधी ने ईमान का आबरू लूटा है,
घर के जन की मत पूछिये, जानवर भी भूखा है,
अस्तित्व संकट में, ऐसा इम्तिहान आया है ...
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ...
अश्रुधारा सुखी भी नहीं, बेगैरतों ने क़ब्जे का फ़रमान भिजवाया है,
स्त्री धन पहले हीं हो चुका स्वाहा, कोई पूजा न दान काम आया है,
मालिक आज क्रूर वक्त के हाथों बन कर ग़ुलाम आया है,
आज फ़िर एक तूफ़ान आया है ...
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५९. जीवन
ख्वाइशो के भंवर में फंसा इंसान,
अपने हीं बनाये उलझनों से परेशान,
ख्वाईशौं की गुलामी में संघर्ष करता है,
अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है ...
धन की लालसा, पद की इच्छा,
सत्ता के लिये ईमान का भी हवन करता है,
इसी धुन में अनेकों कुकर्म करता है,
अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है ...
अपने-परायेपन का कुचक्र,
स्वार्थ सिद्धी हेतु सशक्त संपर्क,
जीवन की तलाश में मौत से संपर्क करता है,
अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है,
ख्वाईशो का विस्तारित गगन,
मजबूरियों के हाथों तिरस्कृत उपवन,
किसी की वाह, कोई आंहें भरता है,
अनमोल मानव जीवन को व्यर्थ करता है...
कर्म की साधना, धर्म का शरण,
हक की लड़ाई, दरिद्रता में भी उल्लसित मन,
जीवन के कठिन पथ को सहज करता है,
मानवता को नित्य समर्थ करता है,
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६०. इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...
उन्हें रब से भी शिक़ायत है,
रब के बंदों से भी शिक़ायत है,
अपने कर्मों से कोई गीला शिकवा नहीं,
इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...
जीवन हाथी पर बैठा महावत है,
सृष्टि में सबसे सुंदर यह इनायत है,
चींटी भी वक्त पर करता बगावत है,
अहंकार के मद में ऊंचाई खोता महावत है,
इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...
दूसरों की तरक्की देख मन आहत है,
सब कुछ पाकर भी हमें नहीं राहत है,
चाहतों के मकड़जाल में फंसा इंसानियत है,
ईश्वर को शबरी के जूठे बैर की चाहत है,
इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है
माना कि जिंदगी में बहुत कमी है,
फ़िर भी कब हमारी जिंदगी रुकी है,
जिसे हम हासिल कर चुके, दूसरों की सिर्फ चाहत है,
इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...
अपने बच्चों के मनमानी में हम हीं सबसे बडे़ रूकावट हैं,
यही वक्त की सबसे गूढ़ नजाकत है,
हम जिस रब के बच्चे उनकी भी कुछ चाहत है,
इंसान में दोषारोपण की ओछी आदत है ...
अपने मन से नहीं कर्मों के हिसाब से मांगो,
दूसरों के दोष को तबेला के खूंटी में टांगों,
फ़िर चारों ओर स्वर्ग सी यह इनायत है,
इन्सान में दोषारोपण की ओछी आदत है...
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६१. जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ...
अपनों से धोखा खाये लोगों का कारवां निकला है,
हर घर ख़ाली हुअा, हर कोई अकेला है,
उम्मीदें आसमां पर है, सब निज स्वार्थ का झमेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ...
जिन्होंने जन्म दिया, वह भी ख़ुश नहीं है,
जिसने सल्तनत पाया कम उसका भी दुःख नहीं है,
जिंदगी की भीड़ में तंगदिल अकेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है...
पुत्र परेशान, पिता भी हैरान है,
किसी के सपने टूटे हैं, किसी ने दुःख बहुत झेला है,
किसी ने किया नाउम्मीद, कोई बुढ़ापे में अकेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ...
माँ को भी शिक़ायत है,
बहन भी बहुत नाराज है,
आरोपों से छलनी यह जग तबेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है...
अर्धांगिनी की क़िस्मत फूटी है,
पतियों का शिकायत भी अलबेला है,
सबकी भावनाओं से यहाँ सबने खेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ...
चाहतों पर अंकुश, संतुष्टि का ख़्यालात,
निःस्वार्थ सहयोग की भावना, ईश्वर पर विश्वास,
शांति का मरहम यह असर अलबेला है,
जरूरतों की यारी, स्वार्थवश यह मेला है ...
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६२. नहीं करना इंसानियत से बेमानी ...
अपने प्रियतम से विरह की पीड़ा,
साधुओं के पाखंड का पूज्यनीय लीला,
सत्संग में मिथ्यावादियों का शिकवा गीला,
मानव मस्तिष्क स्वतंत्र हीं पवित्र, सशक्त अकेला ....
ज्ञान की लालसा, बुद्ध का आरण्यक वास,
माया की इच्छा अपने धन का आंशिक त्याग,
पुण्य-प्राप्ति की लालसा में करना उपवास,
ब्राह्मणवाद से कुंठित विद्वता, दिग्भ्रमित बुद्धिजीवी समाज ....
ईश्वर की साधना, जन्मदाता की आराधना,
आश्रित का पोषण, भिक्षुक की पूर्ण मनोकामना,
मित्रों का सहयोग, निर्बल को नहीं दुत्कारना,
सफ़ल गृहस्थी, यही श्रेष्ठ ईश्वर वंदना...
दिल में बैर, जुबां पर मीठी वाणी,
विचलित मन ख़ुशहाल जिंदगानी,
कपटी मन जरूरत बनाये दिवानी,
सिर्फ मेरी नहीं संपूर्ण जग की यही कहानी ....
वही सबसे दोषी जिसकी मीठी नहीं वाणी,
सरल स्वभाव, मुश्किल यहाँ जिन्दगानी,
विघ्नों का डेरा, जग का दस्तूर हैवानी,
प्रफुल्लित मेरा मन, नहीं करना इंसानियत से बईमानी ...
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६३.याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुकम्मल सजा पायेगा...
सत्ता की मदहोशी में कोई इस कदर झूमा है,
जिनके रहमोकरम से इसे हासिल किया वही आज अनसुना है,
पांच वर्ष बाद फ़िर मेरे हीं दर पर आएगा,
याद रख, अपनी गुनाहों का तूं मुकम्मल सजा पाएगा ...
जिसे तूं आजकल आँधी बता रहा है,
अपनी खुशी से फूला नहीं समा रहा है,
तेरे कर्मों से बहुत जल्द ऐसा आँधी फ़िर आयेगा,
याद रख अपने गुनाहों का तूं मुक्कमल सजा पाएगा ...
हम अक्सर रहगुजर पर भी तकिया डाल कर सो जाते हैं,
अपनी क़िस्मत ऐसी है तेरे जैसों के लिये तख़्त सजाते हैं,
अपने हीं किये वादों को अगर भूल जाएगा,
याद रख अपने गुनाहों का तूं मुक्कमल सजा पायेगा ...
हमारी यह क़िस्मत हमें इसी तरह रोना है,
नई उम्मीद में फ़िर नई फ़सल बोना है,
धरती माँ की कृपा से नई सुबह आयेगा,
याद रख अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ...
जाति धर्म में बंटा हूँ, इसलिए मिली यह सजा है,
एक बार नहीं, इन्हीं लोगों ने कई बार ठगा है,
नई पीढ़ी एक दिन नई क्रांति लेकर आयेगा,
याद रख अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ...
दोनों हाथ जोड़ कर सुनहरे सपने दिखाने वालों,
हमारे ख़ून-पसीने की कमाई अपने ऐशो-आराम पर उड़ा लो,
सत्ता के सितम का वो पल बित गया, यह भी बित जायेगा,
याद रख अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ...
मेरी मजबूरीयों में तूने बहुत आँख दिखाया है,
सत्ता की बंदूक का डर लाठी भी चलवाया है,
हमें अपने रब पर भरोसा, तेरा गुरूर बिल्कुल नहीं टिक पायेगा,
याद रख, अपने गुनाहों की तूं मुक्कमल सजा पायेगा ...
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६४. लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
बडे़ शौक से जिनके सिर दिया ताज,
बड़ी बेरहमी से उन्होंने दबाई जनता की आवाज,
अब समझ आया सबसे बेहतर विकल्प नोटा है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
जाति, धर्म के नाम पर जिसने किया वोट,
अपनी फ़रियाद अनसुनी किये जाने से आंसू बहाये रोज,
लोकतंत्र किंकर्तव्यविमूढ़, आख़िर जनता क्यों रोता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
महापर्व के जश्न में हमने निर्धन को किया अनसुना,
खेती किसानी लूट गयी, महँगाई हो गयी दूना,
अब क्यों भगवान को इसका जिम्मेदार तूं बताता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
निरंकुश प्रसाशन, ईमानदारी लाचार,
मेधा मुश्किल में, युवा बेरोजगार,
हम काटते वही हैं, मानव जैसा बोता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है...
खैरात पाकर जिन्होंने की सुखद अनुभूति,
विकास चक्र का किया इसी ने दुर्गति,
अपने राष्ट्र के भविष्य के लिये अब क्यों चिंतित होता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है . ..
काली कमाई तुमने कमाया व्यापार में,
मत भूलो छोड़ कर जाओगे सब इसी संसार में,
राष्ट्रहित ऐसे देशवासी के कर्मों पर आंसू बहाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
गुंडे-मवालियों से सुशोभित होकर सदन,
अपनी आबरू बचाने को करता कठिन जतन,
धनबल बाहुबल को भी अपने सिर बिठाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
जिनसे गलबहियां कर गुजारे समय कठिन,
जिनके सहयोग बिन घर-गृहस्थी का चलना नामुमकिन,
किसी के षड्यंत्र में उसे भी अपना दुश्मन बनाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
न्याय की आश, अन्याय से संबंध,
बुद्धिजीवी निज हित में लिखे नित्य निबंध,
कलम हुई गुलाम, सोशल मीडिया अफ़वाह उड़ाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
आजादी के लिये जिन्होंने बहाया अपना ख़ून,
देशवासियों ने ही उनकी विचारधारा का कर दिया ख़ून,
उपेक्षित वर्ग अपनी लाचारी पर आंसू बहाता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
अपने हीं पुत्रों के स्वार्थ-बेड़ियों में जकड़ी माँ भारती,
अपने पुत्रों को चिरनिद्रा से जगने को पुकारती,
आख़िर किस मजबूरी में कर्मवीर के वंशज ने किया यह समझौता है,
लोकतंत्र के मालिक ने स्वयं अपने मुंह कालिख पोता है ...
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६५. ले लो बाबा साईं का नाम
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम
अरे हम भी परेशान,
तुम भी परेशान,
होगा सबका निश्चित समाधान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम
गरीब होगा धनवान,
कमजोर बनेगा बलवान,
मूर्ख भी एक दिन पायेगा ज्ञान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम...
चोर हो या बेईमान,
दुर्जन हो या शैतान,
करेंगे सबका वही हिसाब तमाम,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम,
परेशान पहलवान,
संकट में खुलती नहीं जुबान,
सबका रखेंगे वही मान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम
भैया अमीर भी परेशान,
धन की लड़ाई का घमासान,
रखो विश्वास होगा सबका कल्याण,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का जन्म,
रोगी को मिले प्राण,
डाक्टर भी हैरान,
सारे रोगों का करता वही निदान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम,
संकट में हो प्राण,
या निकलती नहीं जान,
जुबां पर आता एक ही नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम,
भीड़ हो या सुनसान,
बारात हो या श्मशान,
सब बिगड़ी बनावे वही महान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम...
हम भी अनजान,
भाई तुम भी अनजान,
किस रूप में वो आये करने समाधान,
ले लो बाबा साईं का नाम,
ले लो बाबा साईं का नाम...
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६६. लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ...
सत्ता का न्याय से यह कैसा गठजोड़,
न्याय के चक्कर में जनता लगा रही भाग-दौड़,
सिपाही मांगे भीख,
काला कोर्ट बोले दिल मांगे मोर,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ....
धारा की अटकलबाजी,
न्याय ना मिले किसी ओर,
तारीख़ पर तारीख़,
जनता का जाये दिल तोड़,
लाचारी देख खुशी मनाये चोर ...
ऊपर का भगवान जब हो रूठा,
नीचे सज्जन को ना मिले ठौर,
बिन धन-बल कोई जब ना सुने,
न्याय की आश जनता देती छोड़,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर...
मंदिर का भगवान रूठा,
दलितों का सम्मान लूटा,
जनता उलझी इसी बात में,
अजान मचाए क्यों शोर,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ...
आया जब चुनाव नजदीक,
नेताओं ने पीड़ित के घर लागाया दौड़,
अखबारों के पन्ने रंग गये,
जनता ने उसी को बनाया मोर,
लाचारी देख खुशी मनाये चोर...
राजसिंहासन पर सुशोभित जब हुअा चोर,
देश का खजाना ख़ाली हुअा,
जनता चैन की बंसी बजाए चारो ओर...,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ...
नौकर नौकरी बांट रहा,
मेधा किनारे, वोट बैंक छांट रहा,
युवा दिनरात खोजे आरक्षण का तोड़,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर,
मत को अपना बेचने वाले,
न्याय के लिये क्यों लगाये भाग-दौड़,
लोकतंत्र को जिसने स्वयं घायल किया,
न्याय की फ़रियाद करे चारों ओर,
लाचारी देख ख़ुशी मनाये चोर ...
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६७. याद रखना मैं आम इन्सान हूँ...
मेरे पिछे साजिश करने वालों,
तुम्हें कैसे लगता है, मैं अनजान हूँ,
तेरी गुनाहों की मिलेगी मुक्कमल सजा,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ...
इस गफलत में बेशक तुम बहुत ख़ुश रहो,
कुर्सी पाकर लगता है, मैं भगवान हूँ,
यह क़िस्मत तेरी, मैं अभी मेहरबान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ...
अभी ख़ुद की उलझनों से परेशान हूँ,
मजबूरी के हाथों बिक कर बेईमान हूँ,
तेरी हुकूमत का यह असर शैतान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ...
दिनकर और दुष्यंत की मैं जुबान हूँ,
अपनी हद में आकर एक पल सोच तूं जरा,
मैं हर पीड़ का अंतिम समाधान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ...
अधूरा रह गया वो अरमान हूँ,
सिसक रही जिंदगी, बेजुबान हूँ,
हर क्रांति के पीछे का आह्वान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ...
अपनी क़िस्मत पर यूं नहीं इतराओ,
तेरी नियत से बिल्कुल हैरान हूँ,
जल्द लाने वाला कोई तूफ़ान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ...
इतिहास के पन्नों को कभी उलट कर देखना,
अनंत पापियों का इकलौता व्यवधान हूँ,
कितने सिकंदर को पहुँचाया कब्रिस्तान हूँ,
याद रखना मैं आम इन्सान हूँ ...
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६८. इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
इंसान से इन्सान,
इतना क्यों है परेशान,
निज स्वार्थ में बना ऐसा हैवान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
क़ीमत लगाओ बिकाऊ ईमान,
थानेदार और क्लर्क पर अंगुली मत उठाओ,
यहाँ तो हर कुर्सी है बईमान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
सफ़ेद लिबास के अंदर का भगवान,
डोनेशन पैरवी के बल लिया कमान,
बच गये तुम्हारी किस्मत,
वर्ना जि़म्मेदार भगवान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान...
सजाया गया बड़ा-बड़ा दुकान,
मिलता कहीं नहीं है ईमान,
मिलावट कर मिलावट से मर रहा इन्सान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
उपदेश देते बनने का राम,
हनीप्रीत की तलाश में बने आशाराम,
साधु-संत भी हैं परेशान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान...
सत्ता की कुर्सी, अवार्ड, सम्मान,
बड़ी दूर इनसे ईमान,
चापलूसी-चमचागिरी से क़िस्मत मेहरबान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
पैसा मजहब, यही चारों धाम,
यही करता सबका कल्याण,
इसकी कृपा से वंचित ईमान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
पॉकेट की गर्मी, शहद जुबान,
फटेहाली में मालिक है भगवान,
न्याय जिसकी दासी, उदास ईमान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
बड़ी खूबसूरत उनके लिये जहान,
दुश्मन भी बन जाते हैं भाईजान,
अगर माँ लक्ष्मी हो जाये मेहरबान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
ईमानदारी क्यों इतना बदनाम,
सहता हर जगह यह अपमान,
ख़तरे में मानवता और इन्सान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
मुश्किल जिंदगी, दुर्लभ ईमान,
बहुत मुश्किल है यह इम्तिहान,
संकट में सृष्टि बिना समाधान,
इंसानियत ख़ुद है आज हैरान ...
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६९. आंसू ग़म का पहचान होता है ...
बच्चों का रोना,
पूरी रात नहीं सोना,
माँ के लिये कठिन इम्तिहान होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
दुधमुंहे बच्चे के दर्द को समझना,
बिना बोले मुसीबत से निबटना,
वाकई मातृशक्ति महान होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
हर मांग पूरी करने के लिये जीना,
उसकी ख़ुशी के लिये बहाना पसीना,
बेहद कठिन काम होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
अनिष्ट के ख्याल से मन विचलित होना,
किसी की सफ़लता के लिये ख़ुद नहीं सोना,
जिंदगी ताउम्र परेशान होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
उम्र पौधे को सींचने में खोना,
उसी के दिये गम से तन्हाई में रोना,
जिंदगी जहन्नुम इसका नाम होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
गैरों पर रहम,
अपनों पर सितम,
अपना ख़ून हीं गम से अनजान होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
बूढ़ा पेड़ और बूढ़ी गाय,
बगिया की रौनक नहीं असहाय,
इनकी दुआ से जिंदगी मेहरबान होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
आंसू का समंदर,
होकर औलाद बेखबर,
कभी चैन की नींद नहीं सोता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
बुढ़ापे की लाठी,
जन्मभूमि की माटी,
बिना इसके आत्मा बहुत रोता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
सफलता की उड़ान,
माँ-बाप के दुखों से अनजान,
चार धाम के पुण्य को खोता है,
आंसू गम का पहचान होता है...
मुकद्दर का सिकंदर,
पार करता वह तूफ़ान में समंदर,
ऐसा उनका पुण्य-प्रताप होता है,
आंसू गम का पहचान होता है ...
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७०. बहुत बड़ा यह है राज ...
दाने-दाने को मोहताज़,
सिर पर अन्नदाता का ताज,
आमदनी क्यों हो जाती है सिफर,
बहुत बड़ा यह है राज ...
मुर्गे के बांग से पहले,
पहुंच करता दिन रात काज,
बच्चे भूखे क्यों रह जाते उनके,
बहुत बड़ा यह है राज ...
जिनके पुरुषार्थ के बल पेट भरता समाज,
जिनके परिश्रम पर राष्ट्र को नाज,
आत्महत्या के ख़ून से रंगा क्यों उनका इतिहास,
बहुत बड़ा यह है राज ...
पूस की रात, सवा शेर गेहूँ,
आंसू बहाता बुद्धिजीवी समाज,
आख़िर क्यों इतने दयनीय हालात,
बहुत बड़ा यह है राज ...
मंच पर जिनके दर्द का कर बखान,
चढ़ी जिन्होंने राजनीति की ऊंची उड़ान,
हतप्रभ क्यों नहीं इनकी नियति से आज,
बहुत बड़ा यह है राज ...
ईश्वर की क्रूरता सबसे ज्यादा शिकार,
फ़िर भी करता नित्य परोपकार,
काम आयी नहीं मंदिर की आरती और नमाज
बहुत बड़ा यह है राज ...
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७१. ऐसे कर्मवीर को हीं सफ़लता मिलता है ...
पथ के पथिक लक्ष्य की तलाश में,
कर्मभूमि पर सफ़लता की प्यास में,
जीवनपथ के कठिन राह पर निरंतर चलता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफलता मिलता है ...
जिद्द के जुनून, संघर्ष की आग में,
हालात के विघ्न, प्रतिस्पर्द्धा के संसार में,
हर पल तूफ़ान में दीपक की तरह जलता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ...
चुनौतियों के समंदर, बाधाओं की रार में,
असफ़लता के भी भयावह घनघोर अंधकार में,
अपने पथ से तनिक नहीं टलता है ,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ...
कर्तव्यों के बोझ, षड्यंत्र के व्यापार में,
कलुषित राजनीती व भ्रष्टाचार के बाज़ार में,
अपने ईश्वर पर अडिग भरोसा करता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ...
सूर्य की तपिश, आमवश्या की अँधेरी रात में,
ज्वालामुखी के विध्वंस, सुनामी के हाहाकार में,
अपने आत्मबल को फ़िर भी स्थिर रखता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफलता मिलता है ...
दुर्जन की दुष्टता, सज्जन के प्रभाव में,
सहयोग और साधन के बिल्कुल अभाव में,
जुगनू की तरह अँधेरे से निरंतर लड़ता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ...
धरातल की गहराई, ऊंची आकाश में,
असफ़लता के बवंडर, सफ़लता के प्रकाश में,
अपने चरित्र को बिल्कुल नहीं बदलता है,
ऐसे हीं कर्मवीर को सफ़लता मिलता है ...
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७२. माफ़ किया जा सके यह ऐसा पाप नहीं है ...
न्याय के मंदिर पर अंगुली उठाऊं,
ऐसी हमारी औकाद नहीं है,
बिल्कुल भी हम मौन रह जाएं,
इतने आसान हालात नहीं हैं ...
सूर्य को उगने से रोक पाये,
इतनी लंबी कोई रात नहीं है,
किसी के दबाव में यह मंदिर भी है,
सब ठीक हो, ऐसी कोई बात नहीं है ...
न्याय के मंदिर में हो अन्याय,
इतने मुश्किल हालात नहीं है,
लोकतंत्र अगर खतरे में आ गया है,
निःसंकोच काले कोट में लाज नहीं है ...
विरोधी स्वर जो दबाया नहीं गया हो,
ऐसी कोई बुलंद आवाज नहीं है,
पाप का घड़ा उबलाने लगा है,
नजरंदाज करने वाला यह पाप नहीं है...
सत्ता सुख में बेफिक्र मन,
न्याय के चौखट पर न्याय का दमन,
ग़लती का इनको एहसास नहीं है,
माफ किया जा सके, यह ऐसा पाप नहीं है...
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६३. फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ...
एक स्वराज का आँधी आया था,
फ़िरंगी ताकत को जड़ से मिटाया था,
शोषण और दमन के स्याह का पटाक्षेप करने,
भारत माँ के सपूतों ने ख़ून की नदियाँ बहाया था ...
बच्चे-बूढ़े, मजदूर-किसान,
मातृशक्ति हो या ग़रीब घर का नौजवान,
सबकी आँखे चमक उठी थी,
लोकतंत्र के मठाधीश करेंगे सब समाधान...
उषा की इस नई बेला में,
नेतागीरी की इस झमेला में,
हिंदु-मुस्लिम, मंदिर मस्जि़द पर देश हमारा अटका है,
अमर शहीद स्वर्ग में सोच रहे लोकतंत्र कहाँ ये भटका है ...
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला है,
जमीन से जुड़ी जनता का नहीं यहाँ कोई सुनने वाला है,
लोकतंत्र के मठाधीशो ने न्याय के पर को भी क़तर डाला है,
आम आदमी आज भी निर्बल, सिस्टम गड़बड़झाला है ...
विकास का दिवास्वप्न दिखाने वाले,
ख़ुद को जनता का मसीहा बताने वाले,
जुबां शहद सा मीठा और दिल तुम्हारा क़ाला है,
तेरे कुकर्मों का हिसाब करने, फ़िर कोई जे.पी. आने वाला है ...
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७४. समस्या है गंभीर, करना होगा चिंतन ...
चारों ओर घमासान हाहाकार,
प्रकृति करती मानवता से पुकार,
ऐसी तरक्की को है धिक्कार,
मानव-अस्तित्व मुक्त जो करे संसार...
जीवन के लिये अनमोल है पानी,
इसके बग़ैर बड़ी मुश्किल जिन्दगानी,
पेय जल के दुरुपयोग की मनमानी,
परेशान है बचपन, तंग जवानी ...
गंभीर समस्या बना जल प्रदूषण,
पर्यावरणविद कर रहे गंभीर मंथन,
विकास कर रहा नित्य विनाश का सृजन,
भविष्य क्या वर्तमान में भी व्याकुल जीवन...
कितने विलुप्त हो गए,
कितनों का संकट में है जीवन,
निज स्वार्थ में प्रकृति का दमन,
यही मूर्खता नष्ट कर देगा यह उपवन ...
पीने का पानी है अनमोल रत्न,
इसके संरक्षण का करें जतन,
इसके अभाव मे मुश्किल जीवन,
समस्या है गंभीर, करना होगा चिंतन ...
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७५.गृहस्थ माँझी
रिश्तों का डोर,
खींचे कई ओर ...
परेशानी वाला मोड़,
दिल देता है तोड़ ...
वक्त की नजाकत,
भरोसे की ताकत,
अपनों के साथ दावत,
हर इंसान की है चाहत ...
जिम्मदारी का एहसास,
ईश्वर पर विश्वास,
चिंता से बेफिक्री,
खुशनुमा बनाता है आज ...
जीवन की चुनौती,
गैरों से अपनोती,
दिल छूने वाली आवाज,
पूजता है समाज ...
उम्मीद का टीला,
तोड़े शांति का क़िला,
रखते ख़ुद पर जो भरोसा,
नहीं करते किसी से शिकवा-गीला ..
मुसीबतों की आँधी,
बनना ग़रीबी में गाँधी,
लोकाचार के इसी कर्मपथ में
नाव खेता है गृहस्थ माँझी..
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७६. युवाओं को जगना होगा ...
षडयंत्र का आलम ऐसा है,
आदमी जो बन नहीं सका,
इंसानियत का जिसने माखौल उड़ाया,
लोगों के बीच बना बैठा देवता है...
अश्रुधारा उन्हें दिखती नहीं है,
आलोचना जिन्हें पचती नहीं है,
समाजसेवा को जिन्होंने व्यापार बना डाला,
कोई सामाजिक कार्यक्रम उनके बग़ैर सजती नहीं है ...
आमजन मायूस है,
सत्ताभोगीयों के उल्लास में,
विपक्ष ख़त्म करने की हो रही है साजिश,
पहली बार भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ...
देशभक्ति पर आयी है आफ़त,
सिर चढ़ बोल रहा अंधभक्तों की ख़ुराफ़ात,
भूल गये लोकतंत्र ने दी यह ताकत,
कुछ लोगों के अय्याश में
देशद्रोही बनाया गया हूँ,
अपने लोगों को न्याय दिलाने के प्रयास में ...
बग़ावत की आँधी आएगी,
माँ भारती फ़िर अलख जलाएगी,
अपने हीं कुकर्मों से नष्ट हो जाएंगे,
लोकतंत्र नष्ट करने की मिथ्या विश्वास में,
युवाओं को जगना होगा,
अपनी आवाज बुलंद करने के प्रयास में ...
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७७. तांडव बहुत मचाऊंगा ....
(वर्तमान सामजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के विरुद्ध युवाओं का क्रांति गीत)
कुछ लोग कवि कहते हैं,
कुछ मुझको कहते हैं ढोंगी..
उन आँखों का मैं क्या करूं ,
जिनके पीछे का दिलो-दिमाग है मन का रोगी ...
इंकलाब आएगा,
संग्राम अभी बांकी है,
मेरे पंखों से मत जलो,
इम्तिहान मेरा बांकी है..
समस्या का समाधान बाँकी है,
अभी हमारा उड़ान बांकी है ...
मोह-माया में फंसा हूँ,
जुबां इसलिए मेरी बंद है,
उस खेल का मैं भी माहिर खिलाड़ी हूँ,
जिसका नाम शतरंज है,
मेरी कमजोरी का तुमने,
फायदा बहुत उठाया है,
हक जिसपर तुम्हारा नहीं था,
उसे भी तुमने हथियाया है,
खैरात किसी का नहीं था ये आजादी,
अपने पूर्वजों के मेहनत का फल हमने पाया है,
अब भी सुधर जाओ आप,
पहले हीं बहुत सताया है ....
मानवता के लिये मैं तैयार होकर आऊंगा,
सावधान हो जाओ छलियों,
रणभेरी की जब बजेगी आवाज,
तांडव बहुत मचाऊंगा ....
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७८. राष्ट्रहित
मुझे गर्व है, मैं हिन्दुस्तानी हूँ...,
किसी भी धर्म से मेरा बैर नहीं,
अपनी मातृभूमि से मुझे बहुत प्रेम है,
इनसे गद्दारी करने वालों की ख़ैर नहीं,
नेतागिरी की रोटी तुम्हें मुबारक हो,
लेकिन हमारे भाईचारे में जहर मत घोलो,
हम आधी रोटी खा कर भी खुशी से जी लेंगे,
राष्ट्रहित की सुरक्षा में ज़हर भी पी लेंगे,
अन्नदाता अन्न को मोहताज है,
शहीदों का लहू मांगती इंसाफ है,
अब भी अगर किसी का खून नहीं खोलता है,
इंसान नहीं वो तो जल्लाद है,
तिरंगा फहराने का कुछ लोगों को बहुत शौक है,
हमारे लिये तो यह स्वाभिमान है,
धिक्कार है उन निर्लज्जों को...
चंद कागज के टुकड़ों के लिये,
जिन्होंने बेच लिया अपना ईमान है ...
नमाज़ नहीं पढ़ता तो क्या हुआ,
अल्लाह के तो हम सभी बंदे हैं,
आखिर भारत माता की जय क्यों नहीं बोल सकते,
कुर्सी की लड़ाई में कुछ लोग क्यों इतने अंधे हैं....
राष्ट्रहित सर्वोपरि यह हर धर्म बतलाता है,
जब भी हम आपस में लड़ते हैं,
कोई फिरंगी सता कर हमें,
राष्ट्रहित का महत्त्व सिखलाता है ....
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७९. विश्वास
जिंदगी छोटी है,
चाहतें बड़ी बड़ी ...
इच्छाएं भले पूरी ना हो ...
हसरतें रह जाएं अधूरी
आरजू रब से इतना है,
आहत ना हो मुझसे, इंसान कोई ...
दिल का क्या है
ये टूटता हीं रहता है
गलती इंसान करता है
सजा ये दिल पाता है ...
मिन्नत रब से बस इतनी है,
खता ना हो मुझसे ऐसा कोई,
निष्कपट दिल को अगर चोट लगे ....
तो खत्म हो जाये हस्ती हमारी ...
जानबूझ कर कोई गलती नहीं किया,
ऐसा नहीं की मुझसे ना हुई हो गलती,
गलत को बर्दाश्त ना कर सकूँ,
मेरे ईश्वर मुझे दे तूं इतनी शक्ति ...
जिंदगी में गमों का पहाड़ हो,
हर पल नई चुनौती से टकरार हो,
मुसीबतों से मैं भले टूट जाऊं,
आत्मविश्वास भले छिन्न भिन्न हो जाये,
इतनी कृपा मुझ पर बनाए रखना,
किसी भले मानस का मुझसे विश्वास टूटे नहीं,
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८०. दिमाग का अंधा
बेवजह भौंकना कुछलोगों की फ़ितरत होती है,
जाबांज के हौसले तोड़ देना,
कुछ किये बिना हीं श्रेय लेना,
मजलिस में खुद को बलिदानी साबित करना,
पल पल षडयंत्र का जाल बुनना,
उस जाल में फंस कर बेमौत मरना,
ऐसे नाचीज की शहादत होती है,
अरे जिगर जिनका बड़ा होता है,
सपने उनके पूरे भी होते हैं,
ऐसे भौंकने वालों का भला क्या असर,
जिनके दिल में अंगारों के जलजले होते हैं,
परीक्षा उनकी कठिन होती है,
हर पल इम्तिहान जटिल होती है,
खामोशी को उनकी बुजदिली ना समझें,
लक्ष्य पर उनकी निगाहें बड़ी संगीन होती है,
आप रोक सकते हो उन्हें,
तोड़ नहीं सकते,
दिल भले इनका कमजोर होता है,
दया और सहयोग का सैलाब भरा होता है,
वक्त आने पर ये जवाब देते हैं,
हर ज़ख्म का माक़ूल हिसाब लेते हैं,
अगर तबाही खुद की रोकना हो,
इनके क्रोधाग्नि से डरो,
ये शांत हैं तो क्या हुआ,
इनकी विध्वंसक खामोशी से डरो,
लक्ष्य इनके लिये कोई बड़ा नहीं होता,
बाधा इनके सामने ज्यादा दिन खड़ा नहीं होता,
धृतराष्ट्र अगर सिर्फ आँख से अंधा होता,
तो सारा खानदान बेमौत मरा नहीं होता ....
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८१. एक नई दुनियाँ सजाना है ...
वो अपने घर की लाडली थी
जो अब परायी हो गयी है ...
घर में चारों ओर चांदनी का बसेरा है,
बिटिया माँ-बाप से मिलने को घर आयी है ...
घर की चौखट पूछती है,
बहन आजकल कहाँ हो,
इस घर से मन भर गया
या मेरी सेवा से ख़फ़ा हो...
बहना प्यारी अजनबी सी देखती है,
बहुत सोच कर भी मुंह नहीं खोलती है,
मुस्कुरा कर इशारों में बयां कर जाती है,
यह दुनियाँ बड़ी खुशनुमा थी,
तेरी सेवा में भी ना कोई कमी था,
तेरी यादों को झोली आँख नम कर देती है,
फ़िर भी मुझे वापस जाना है...
एक नई दुनियाँ अब मुझे सजाना है....
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८२.कर्मशीलता
अक्सर महत्वकांक्षा ने लोगों को ऊंचाई पर पहुँचाया है,
ऐसे लोगों को रब ने छोटा सपना देखना नहीं सिखाया है,
पराजय का उपहास उड़ाने वालों,
ये बताओ तुमने क्या पाया है ? ? ?
सीढ़ियां चढ़ते अक्सर गिरने वालों को दर्द का एहसास नहीं होता है,
मातृत्व सुख की आकांक्षा में प्रसव पीड़ा का आभास नहीं होता है,
जीवन में सुख-दुःख का ज्वार भाटा आता हीं रहता है,
कर्मशील व्यक्ति सृष्टि में किसी का मोहताज नहीं होता है...
भूमि की गहराई का अट्टालिकाओं की ऊंचाई से अजीब रिश्ता है,
उँचे लक्ष्य रखने वाले जीवन की चक्की में अक्सर पीसता है,
सोना भी कुन्दन बनने से पूर्व सुनार की हाथों में घिसता है,
इतिहास गवाह है मानव उत्थान के पौध को कर्मशीलता हीं सींचता है ...
जग में आये हो तो ऊपर जाना है
क्या लेकर आये जो कुछ ले जाना है
साधनहीन का पथ सरल बनाना सरल नहीं है,
लेकिन कर्मशीलता को अपनी उपस्थिति भी जताना है...
स्वर्ग-नरक की उलझन में अक्सर लोग भटकते हैं,
कर्मशीलता को मानवता की मधुर धुन बजाना है,
अपनी नहीं सही, अपनों के जीवन को स्वर्ग बनाना है..
इसीलिये जग आपका दिवाना है, जग आपका दीवाना है....
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८३. मेरे अपने
(घर-परिवार और अपनो से जुड़ कर जीने वालों *शख्स* की आज के मतलबी दुनियाँ में मानसिक व्यथा)
तुम्हें मुझसे शिकायत है,
मुझे ख़ुद की जिंदगी से ....
अपनों से मेरी कोई शिकायत नहीं,
क्योंकि जिसे भी अपना बनाना चाहा,
वो मेरा अपना हुआ हीं नहीं।
वक्त ने मुझे बहुत तपाया है,
गैरों ने नहीं अपनों ने मुझे सताया है,
गरीब सही, दिल का शहंशाह हूँ,
ये अपने थे, जिन्होंने अक्सर ओकाद बाताया है,
छोटे सपने देखने की मुझे आदत नहीं,
घूटना टेक देना, मेरी फ़ितरत नहीं,
हर पल नई उड़ान भरने का जज़्बा रखता हूँ,
ये मेरे अपने हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा मुझे रुलाया है....,
मजबूरी उनकी थी, दोष मेरा क्या है,
एक भी ऐसा पल बताओ, जब मैंने पीठ दिखाया है,
अपनों की आह, गैरों की वाह जिन्हें पसंद है,
ऐसे अपनो को मैंने पाया है।
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८४. आज का विकास
जिंदगी की जद्दोजहद और ये लालची मन,
सबकुछ यहाँ बिकने लगा है,
बच्चों के मुंह से नेवाले छीन गये,
बिन मुनाफ़े नहीं बिकते अब कफ़न ....
न्याय भी बिकने लगा है,
इलाज़ की भी बोली लगती है,
मेधा पैरवी और डोनेशन की बंधक हुई,
सत्य और ईमानदारी हो चुका है दफ़न ...
कुछ लोग चुनौतियों से लड़ रहे हैं,
कुछ अपनों से लड़ रहे हैं,
अधिकांश अपनी परेशानी से यहाँ परेशान नहीं हैं,
दूसरों की तरक्की देख कर मर रहे हैं....,
किसान निराश है, युवा उदास है,
बहनों के हाथों की मेहंदी, दहेज की दास है,
बच्चों की मुस्कुराहट, किताबों के बोझ से सहमा है,
इंसानियत रो रही है, ये आज का विकास है।
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८५. पहेली
जिंदगी एक अजीब पहेली है,
सुलझाने की कोशिश करने वाले,
अक्सर उलझ जाया करते हैं ...
उलझ कर जीने वाले लोग
जिंदगी के मजे लेते हैं ....
उलझन से हम परेशान होते हैं,
ये आनंद उठाने का पल होता है,
आज से भले हम निराश नहीं हो ...
ये तो बीता पल या आने वाला कल होता है...
चुनौतियों का हाथ फैला कर करें स्वागत,
क़िस्मत पर इतराने की डाले आदत,
किसी को देख कर जले नहीं,
शिकवा जिंदगी से बिल्कुल करें नहीं,
जरूरतों पर लगाम लगाएं
लोगों के मुसीबतों में काम आएं
उम्मीद आपको दुःखी करेगा,
त्याग आपको संतुष्टि देगा,
दिमाग को बोझ से हल्का रखें,
परिश्रम एक दिन जरूर रंग लायेगी,
आपके उम्मीद से बेहतर कल लायेगी,
यही तो है जिंदगी की पहेली...
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८६. भाभी का आतंक
(हास्य कविता)
✍ बिपिन कुमार चौधरी
उसकी आँखो में खौफ़ देख दोस्तों का आँख भर आया था,
पूरे बदन पर जब उसने झाड़ू का दाग दिखलाया था,
ग़लती कुछ ख़ास नहीं दोस्तों के संग दो पेक लगाया था,
मामूली ग़लती का बड़ा बेरहम सजा उसने पाया था...
ऋषि बोला गदहे तूने झाड़ू क्यों नहीं छिपाया था,
इसी ग़लती ने कभी बेलन से उसका नाक तुड़वाया था,
अपनी बहादुरी का बखान करने वाला बुरी तरह शरमाया था,
इसी ख़ुशी में दोस्तों ने फ़िर कई पेक उसे पिलाया था...
नशे में बदहवास फ़िर भी भाभी के डर से किसी ने घर नहीं पहुंचाया था,
दोस्तों के इसी बेरहमी ने उसे आज बहुत रुलाया था..
शुभ मूहर्त में ना जाने किस आफ़त को घर लाया था,
भाभी को सामने देखते हीं उसका सारा नशा उतर आया था...
मुंह की बदबू ने आज फ़िर उसे बुरी तरह फंसाया था,
बेचारा बनवारी भाभी के हाथों झाड़ू से ख़ूब मालिश करवाया था...
दोस्तों के महफ़िल में इस ख़बर ने हरकंप मचाया था,
सभी की पत्नियों ने भाभी श्री को अपना नेता बनाया था...
दोस्तों के महफ़िल में भाभी के आतंक ने धूम मचाया है,
आजकल सबकी जुबां पर एक हीं सवाल कौन कमीना आज माड़ खाया है ...
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८७.सफ़लता नित्य कदम चूमती रहे ...
किसी की खुशियों का क़त्ल हुअा था,
एक मासूम बच्चा जब अपने घर से बेदख़ल हुअा था,
कई दिनों तक आँखो से अश्रुधारा रुकती नहीं थी,
हंसमुखी चेहरे पर मुस्कान दिखती नहीं थी ...
वक्त के साथ उसने समझौता कर लिया था,
नए शहर में नए लोगों से रिश्ता जोड़ लिया था,
लड़कपन में माँ के हाथों का निवाला भी नसीब नहीं था,
भाई के महत्वाकांक्षा तले दबा बचपन बदनसीब था ...
पिता की मजबूरी, जरूरतों पर भारी थी,
कक्षा में अव्वल आने की अजीब लड़ाई थी ...
धन और साधन खूब अभाव था,
मुस्कुरा कर गम छुपाने का बेहतरीन स्वभाव था...
हाथ फ़ैलाने की आदत नहीं थी,
घर के मुसीबतों से राहत नहीं थी,
लोगों की ग़लतियाँ नजरंदाज करता था,
वक्त के ढ़ाए सितम हंस कर बर्दाश्त करता था
जिद्द और जुनून से मुसीबत हार गया,
सफ़लता का डंका, संसार में हुंकार गया,
वक्त जानता है, मेधा का हुअा है सम्मान...
सफ़लता नित्य कदमों को चूमती रहे, यही ईश्वर से आह्वान .....
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८८. आदर्श जन प्रतिनिधि
जनता की सेवा, मेरा एक मात्र धर्म है,
इसलिए विरोधियों में अजीब हड़कम्प है,
चापलूसों का भी काफी विरोध है,
क्योंकि मुझे अपने कर्तव्यों का बोध है,
मैंने अपनी क्षमता के अनुसार यथासंभव काम किया है,
चौखट पर आए जरूरतमंद का साथ दिया है,
मुसीबतों से परेशान लोगों से बात किया है,
गलत लोगों को नज़रंदाज़ किया है,
लाचार लोगों के वाणी को आवाज दिया है,
हर पल जनता के दर्द को एहसास किया है...,
जनता की समस्या का जो विधिसम्मत समाधान करेगा,
ऐसे सरकारी कर्मियों का बेशक़ मैं भी सम्मान करूंगा,
मेरे रहते सरकारी दफ्तर में नहीं किसी को शोषण की आजादी,
मुझे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं ऐसी अफसरशाही....
सामने कितना भी मुश्किल हो,
समस्याएं चाहे कितना भी जटिल हो,
एक गलती मैं बार-बार करूंगा,
गरीब-निर्बल-बेसहारा के लिये लड़ता रहूँगा,
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८९. तेरा साथ
दुनियाँ के इस मेला में,
प्रिय तेरे बिन अकेला मैं,
तुम्हारे मुस्कान की तलाश कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....
तेरे नयनों के इस नीड़ में,
विचलित मेरा मन गंभीर मैं,
सुकून के उन लम्हों का तलाश कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....
तम से घिरे साग़र में,
बहुत ख़ुश हूँ तुझे पाकर मैं,
तेरी खुशियों के लिये विलाप कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....
आमवश्या की विलुप्त निशाकर में,
नई उषा की बेला औऱ दिवाकर मैं,
शशि की भाँति ओझल होने का स्वांग कर रहा हूँ,
रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....
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९०.यही मन का विश्वास है
कोई दिवास्वप्न में मग्न है,
कोई करता बहुत जत्न है,
दिल की गहराइयों में जिसके स्वप्न है,
जग करता उसका अभिनंदन है ..
राह कठिन, संघर्ष जटिल,
ये कर्मभूमि की पहचान है,
अंगारों पर जिसने चलना सीखा,
जग में वही महान है...
वाद-विवाद, जिंदगी बरबाद,
ईश्वर से भी लोग निराश है,
इम्तिहान का जिसने किया सामना,
वही सिकंदर जाबांज है...
संघर्ष त्याग का बलिदान मांगती है,
परिश्रम और समर्पण का ज्ञान मांगती है,
सत्यपथ की डगर बहुत मुश्किल है,
मानवता मनुष्य से समाधान मांगती है ...
पराजय से जिसने मुंह फेर लिया
स्वयं के पुरुषार्थ पर जिनका नहीं भरोसा
कृष्ण भी उसे मार्ग दिखा नहीं सकता
इन्द्र भी उसे विजय बना नहीं सकता
यही कालजयी पुरुषार्थ है,
यही मन का विश्वास है,
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९१. उत्तम_सोंच
समाजसेवा के तीन मोर,
चंदा चोर, योजना चोर,
सबसे काबिल व्यक्ति वह है,
वोटों की खातिर करे शैतानी ताबड़-तोड़,
शामत उसकी आ जाती है,
करे बगावत, मचाए शोर,
ईमानदारी का जिसको काटे कीड़ा,
दुश्मन ही दुश्मन उसके चारों ओर,
बुद्धिमान व्यक्ति यहां वही है,
मिल बांट खाए, भ्रष्टाचार का भोज,
शिकायती कुत्ते हांफे बेमतलब,
दफ्तर का चक्कर लगाए रोज - रोज,
भेड़ियों की महफ़िल में भेड़ निसहाय,
लुटेरे बताए उसे धरती का बोझ,
जनता बनी बैठी मूकदर्शक,
गिद्ध खाए मज़े में नोच - नोच,
अपनी बारी का सब करे इंतिजार,
मुबारक आपको आपका उत्तम सोंच...
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९२. जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ...
जिनके रहमोकरम से हमने यह सतरंगी दुनियाँ पाया है,
रब मैं क्या जानूं रब के बारे में भी जिसने हमें बताया है,
ना जाने किन अपनों के लिये हमने उन्हें रुलाया है,
जिनकी ख़ुशीयां हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है...
किसी ख़ास ने कुछ राज हमें बताया है,
उनकी चाहत में खोट है ऐसा हमें बताया है,
सिर्फ वही हमारी अपनी, मेरे सहोदर से भी उसका मन भर आया है,
जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है,
नन्हें अंगुलियों को पकड़ चलना जिसने सिखाया है,
रास्ते के कंकड़ों को चुन जीवनपथ सपाट जिसने बनाया है,
जीवन की अंतिम बेला में उसको हमने बोझ बताया है,
जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ....
मेरे आंखो में आँसू नहीं आये, इसी धुन में जिन्होंने सारी उम्र पसीना बहाया है,
अपनी छाती का दूध पिला कर जिसने ख़ुद रूखा-सूखा खाया है,
किसी अपने ने उसी से अलग मेरे लिये पकवान पकाया है,
जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ...
मेरी हसरतों पर न्यौछावर कर जिसने जिंदगी गंवाया है,
प्यार के दो मीठे बोल को उनका कान तरस आया है,
मेरे थाली के पकवानों को देख किसी का आँख डबडबाया है,
जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ...
मेरे अंदर के मृत इंसानियत ने तांडव बहुत मचाया है,
इन पकवानों का मैंने किन्हीं के चरणों में भोग लगाया है,
उनकी हाथों से पहला नेवाला मैंने ख़ुद खाया है,
जिनकी खुशियाँ हमसे है, उसके बिन सब पराया है ...
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९३.अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था ...
सितारों की महफ़िल में चाँद को बुलावा आया था,
फ़िर भी ना जाने क्यों उसका आँख भर आया था,
चाँदनी रात में तन्हा भी वह बहुत ख़ुश था,
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...
महफ़िल की अंदाजे बयां कुछ इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही थी,
हर दिल-अजीज अपने शान-शौकत से दूसरे के आबरू को तौल रही थी,
चाँद को यह खुशनुमा महफ़िल बिल्कुल भी रास नहीं आया था,
अमावस्या की रात किसी ने उसे नहीं बुलाया था ...
अचानक हीं चाँद के दिल में यह ख्याल आया था,
इन्हीं सितारों ने हीं उसे बहुत रुलाया था,
वक्त ने चाँदनी रात फ़िर से ख़ूबसूरत बनाया था,
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...
सितारों के बीच उसने अपने अस्तित्त्व को विलुप्त पाया था,
उसके जख्मों पर मरहम लगाने तब कोई नहीं आया था,
जख्मों से ज्यादा इसी तन्हाई ने उसे रुलाया था,
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था ...
सितारों ने चाँद का इजहार कर अपनी क़िस्मत पर इतराया था,
चाँद के आने से महफ़िल में कुछ ऐसा हीं रौनक आया था,
वक्त ने उसे आज एक बार फ़िर बहुत रुलाया था,
अमावस्या की रात उसे किसी ने नहीं बुलाया था...
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९४. मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
प्रतिस्पर्द्धा के इस दौड़ में,
सबसे आगे निकलने की होड़ में,
इंसानियत पीछे छूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ...
सत्ता की मदहोशी में,
परिवारवाद की बेहोशी में,
लोकतंत्र की आबरू लूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ...
भ्रष्टाचार के बाज़ार में,
महत्वकांक्षा के नग्न संसार में,
नैतिकता की क़िस्मत फुट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है,
निज संतान के प्यार में,
ससुराल के भावनात्मक अत्याचार में,
माँ की ममता पीछे छूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
अपनों से टकरार में,
स्वार्थ के हाहाकार में,
पिता का आशियाना टूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
शान-शौकत के व्यापार में,
धन्नासेठों के कालाबाजार में,
ईमानदारी की क़िस्मत रूठ गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
प्रेमिका के प्यार में,
फ़ैशन के बहार में,
संस्कृति की हस्ती मिट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
बुद्दिजीवियों के गुलजार में,
अपने मुंह-मियां मिट्ठू बनने के खूमार में,
कलम की धार कुंद हो गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है,
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९५. स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
आधुनिकता के नए आयाम में,
संस्कृति के संरक्षण-सम्मान में,
जिंदगी की घुटन का एहसास करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
पिता की इज्जत, माता के दिये संस्कार में,
भाइयों की जिद्द, रिश्तेदारों के अहंकार में,
अपनी दिल की बातों को जुबां से नहीं बयां करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
हुनर के शिखर, जिंदगी के कठिन सफ़र में,
समाज के गिद्ध निगाहों, शरीफों के गंदे बाज़ार में,
पल पल आबरू की सुरक्षा के लिये संघर्ष करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
मातृत्व की प्रतिष्ठा, कुल के सम्मान में,
भ्रूण हत्या के क्रूरतम विज्ञान में,
अपनों से अपने अंश के सुरक्षा के लिये लड़ती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
जात-पात और दहेज-दानव के घमासान में,
अपनी पसंद के निरंकुश अपमान में,
अपनों के लिये ग़लत निर्णय के विरोध से डरती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
कुर्बानी और जिल्लत की इंतहां में,
घर-परिवार के ख़ैरियत की पनाह में,
तन्हाई के बीच दूसरों की तन्हाई दूर करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
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९६. इज्जत की रोटी
तेरे शहर में आकर रहना शौक नहीं हमारा,
अनकही मजबूरियों का मारा हुआ हूं,
रूखी सूखी खा कर भी खुश रह लेता हूं,
फिर भी बिना गुनाह तेरे शहर से निकाला गया हूं...
अपनी मिट्टी की याद हमें भी साताती है,
अपनों की याद हमें भी रुलाती है,
तेरे टुकड़ों पर पलने का हमें शौक नहीं,
अपनों के पेट की आग हमें यहां लाती है...
हम मेहनतकशों का लहू पीकर,
कुछ बन गए बादशाह, कितनों के सिर ताज है,
अपने प्रदेश में हमारे हाथों को क्यों नहीं मिलता काम,
यह आज भी बहुत बड़ा राज है,
तेरा शहर बेशक बहुत खूबसूरत है,
क्या तेरे शहर वालों ने इसे ऐसा बनाया है,
अपने खून पसीने से इसे सींचा है हम बैगरतों ने,
कभी सोचना हमने तेरे शहर में क्या पाया है,
लगा कर लाख तोहमत हम पर,
तेरे शहर ने इज्जत हमसे बहुत पाया है,
मजबूरियों में अपने शहर से कर दिया बेदखल,
यह सोच हमारा आंख भर आया है...
खुश रहना अपनी जन्नत में,
हम अपनी बदनसीबी जी लेंगे,
हमारे बच्चे भूखे मर गए तो क्या,
खुद अपनों के दर्द का आंसू पी लेंगे...
घूट घूट कर यूं हम लोगों को,
अब जीने की आदत हो गई है,
अख़बार के पन्नों को पढ़ सब खुश हैं,
ईमानदारों के टेक्स से सबको राहत बंटी है...
ना भीख हमें, ना कोई खैरात चाहिए,
अपने प्रदेश में इन हाथों को काम चाहिए,
अपनों के बीच इज्जत की रोटी खा लेंगे,
तेरे शहर से भी सुंदर अपना शहर बना लेंगे,
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९७. धंधा ए बदनाम
आजाद हमारा देश, आजाद है हिंदुस्तान,
फिर क्यों और किससे हम हैं परेशान,
हो हिंदु,मुस्लिम चाहे सीख या मुसलमान,
सब सामान, करते सब मिलकर मतदान,
बेशक मैं गलत, लेकिन बोलता सारा हिंदुस्तान,
बिना नोटों का नहीं होता, किसी टेबल पर काम,
उपर ही उपर खा जाते, फिर बनते मासूम अनजान,
अपने दिल की कोई ना पूछे, बेवजह सिस्टम बदनाम,
देश का हर युवा ईमानदार व निष्ठावान,
फेक दो उसके आगे मुर्गे का एक टांग,
रहो बेफिक्र करेगा तुम्हारा ही गुनगान,
समझो भेद आप, बन जाओगे महान,
उसके साथ हो जाए थोड़ा मदिरापान,
मस्ती में थिरकेंगे, चाहे लूट जाए जहांन,
यही इनकी समाजसेवा, इतना ही मांग,
लूट लाओ आप या हो कोई गरीब कुर्बान,
मौका का फायदा यहां सभी खूब उठाते हैं,
भरने खुद का पैकेट सिस्टम को गलत बताते हैं,
अगर जनता के प्रतिनिधी मन में लें ठान,
बेरोजगार हो कर फिर किसको करेंगे बदनाम,
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९८.फेसबुकिया_दान_रहस्य
हर चौराहे पर दानवीर खड़ा, फिर जनता काहे इतना रोय।
सेवक अगर लेबे सुधि, जनता दानवीर का करे क्यों खोज।।
अपनी दयनीय हालत पर दिन रात, गरीब आंसु बहाये रोज।
इनकी दुर्दशा का फ़ेसबुक पर, खुशी मनाये दानवीरों का फौज।।
गुप्त दान, महा कल्याण सनातन संस्कृति का पावन सोच।
सोशल मीडिया पर गरीबों का ऐसा मजाक, मानो धरती का बोझ।।
दाताओं के इस देश में दानवीर कर्ण भी बहुत लजाए।
दानदाता समाजसेवी जब, भिखारियों का हक मार खा जाए।।
मत करो मदद गरीबों का, बस करो तुम इतनी मेहरबानी।
अपनी दीनता का तस्वीर देख, उतरे ना किसी गरीब का पानी।।
हाथ को देकर उसके योग्य काम, बनाओ उसको स्वाभिमानी।
दीनता का मजाक उड़ाने वाले, दीन बड़ा और है तूं अभिमानी।।
राह चलते पैरों पर गिर, ताज तूने बड़ा यह पाया है।
क्या तेरी ऐसी तस्वीर सोसल मीडिया पर कोई लगाया है।।
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९९. क्रांति
अभी थोड़ा जगे हैं हम,
जगाना अभी बांकी है,
किया अभी जो हमने है,
वह छोटी सी झांकी है,
शोषण बहुत सहा है हमने,
इसलिए यहां शांति है,
खोफजदा बेकार हैं लोग,
अपने हक की यह क्रांति है
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१००. राधा का प्रेम
जिंदगी की जद्दोजहद,
परेशानियों का सिलसिला,
जब रास्ते कम हो बाधाएं ज्यादा,
ऐसे में प्रेरणा बनती है राधा...
कोई भटक जाता है,
कोई मझधार से नैय्या खेता है,
किसी की जिंदगी बन जाती है,
किसी के आंखों में जीवन भर आंसू रहता है....
हम उन्हें पूजते हैं,
जो कृष्ण की राधा थी,
जिसका प्रेम अद्भुत अनुपम था,
कृष्ण के कर्म पथ में कब वह बाधा थी...
हर किसी को यहां बहुत गिला-शिकवा है,
उनका प्रेम पवित्र हमारा रासलीला है,
प्रेम की पवित्रता को जो समझ नहीं पाया,
कर्मपथ से होकर विचलित जीवन को गंवाया...
राजा बन कर भी कृष्ण के दिल में अजीब खालीपन था,
त्याग समर्पण से भरा राधा का प्रेम पावन था,
उच्छृंखलता दिखाकर अपना स्वाभिमान खोया नहीं था,
काया की दूरी दिलों का मिलन ऐसा अद्भुत प्रेम उन्होंने किया था....
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१०१. "कविता का स्वरूप"
( कविता की बेसिक बातों को कविता का रूप देने का मेरा छोटा प्रयास)
सभी विद्वानों के विचारों का अंतिम सार,
कविता कवि के भावनाओं का उदगार,
मुख्य रूप से इनके तीन प्रकार,
महाकाव्य, खंडकाव्य, मुक्तक काव्य,
कविता के सौंदर्य का भेद है चार,
प्रस्तुत योजना, भाव, नाद, विचार,
प्रेम, करूणा, क्रोध, हर्ष, उत्साह,
मर्मस्पर्शी चित्रण कविता का भाव,
काव्य की आत्मा, सृजन भाुकतावश,
साहित्य शास्त्रों ने बताया इसी को रस,
श्रृंगार, वीर, हास्य, करुण, रौद्र, शांत,
भयानक, अद्भुत, विभत्स, रस के नौ अवतार,
वात्सल्य और भक्ति रस के अन्य प्रकार,
परवर्ती आचार्यों ने किया जिन पर विचार,
विचारों की उच्चता में निहित काव्य की गरिमा,
कबीर, रहीम, तुलसी, वृंद के दोहे, गिरधर की कुंडलियां,
कविता का नाद सौंदर्य, छंदबद्ध रचना,
संगीतत्मकता, गेयात्मकता, सरल जिसे पढ़ना,
लय, तुक, गति, प्रवाह का समावेश,
वर्ण, शब्द का सार्थक समुचित विन्यास,
वर्णों की आवृत्ति, नाद का मोहक आकर्षण,
करे पाठक को मंत्रमुग्ध, साहित्य का सर्वश्रेष्ठ सृजन,
दृश्यों, रूपों, तथ्यों का हृदयग्राही उभार,
उपमा, उपमेय, अप्रस्तुत योजना मूल आधार,
काव्य के छः बाह्य स्वरूप माने साहित्यकार,
लय, तुक, छंद, शब्द योजना, चित्रात्मकता, अलंकार,
भाषा में प्रवाह संघ लय लाये उतार - चढ़ाव,
दोहा, चौपाई, कुंडलियां, सोरठा, सवैया तुक का प्रभाव,
काव्य शास्त्र में अति महत्वपूर्ण, विशिष्ट शब्द योजना,
तीन स्वरूप जिनके, अभिधा, लक्षणा, व्यंजना,
अल्प शब्द में करे भावों को व्यक्त चित्रात्मक भाषा,
अभिव्यक्ति में विशेष सौंदर्य अलंकार की परिभाषा,
अप्रस्तुत योजना अलंकार के तीन रूप - उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा,
व्याज स्तुति, समासोक्ति अलंकार के वाक्य वक्रता,
कविता के आंतरिक स्वरूप के दर्शन का पांच वर्गीकरण,
अनुभूति की तीव्रता,व्यापकता, कल्पनाशीलता, सौंदर्यबोध, भावों का उद्दात्तीकरण...
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