#निर्लज्ज_सवाल
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
संस्कारों का यह सनातन बंधन है,
नज़र मिलते हाथ जोड़ना छोड़िये नहीं,
कलमकार हुआ कभी नहीं अकिंचन है,
पतितों का दंभ तोड़ने से मुंह मोड़ीये नहीं...
सुर, कबीर की परंपरा का होता रहे निर्वहन,
धनानंद से विक्षिप्त दुष्टों से डरिये नहीं,
दिनकर, दुष्यंत के शब्द बाणों का हो महिमा मंडन,
कलम की प्रतिष्ठा धूमिल करने वाला काम करिये नहीं,
पीड़ा सृजन का मूल आधार है,
पीड़ितों के जख्मों को भरीये नहीं,
विध्वंस से हो शोषकों का समूल नाश,
ऐसा चिंगारी उत्पन्न करने में देर कीजिए नहीं,
अपने ही अपनों का ग़ुलाम बन गए,
दरिद्रता दूर करने वाले धनवान बन गए,
जनता का आशीष पाकर भगवान बन गए,
जनसेवक नरभक्षी दानव हैवान बन गए,
आंसुओ का सैलाब भी अब सूखने लगा है,
मूक बधिर भी निर्लज्ज हो सवाल पूछने लगा है,
कर्तव्य भूल अपनी हिस्सेदारी में ख़ूब मशगूल हो,
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