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३३. पालनहार का संस्कार @

पालनहार का संस्कार
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

सिक्कों की खनकती आवाज,
इसी चाहत में लूट गया बचपन बिंदास,
फिर भी समझौता गमों से किया नहीं,
लोकतंत्र के आकाओं ने क्या दर्द दिया नहीं ??

रोटियों के लिए रहा मोहताज,
किसान का बेटा कैसे उठाऊं आवाज,
अन्नदाताओं ने कैसा कष्ट सहा नहीं ?
जिसे भी बनाया मालिक, किसानों का अपना रहा नहीं,

परिश्रम हमारा परम धर्म,
फल की चिंता नहीं, करता हूं अपना कर्म,
लाख चुनौतियों में भी डरा नहीं,
कैसे कह दूं, अपनों का पेट भरा नहीं ?

आत्मा करती है विद्रोह,
हमारी उपज का उचित मूल्य दो,
बिचोलियों ने कौन सा जुल्म किया नहीं ?
हमारे अरमानों की हत्या से किसी को फर्क पड़ता नहीं,

दर दर पर खाता हूं फटकार,
ऐसे जीवन को धिक्कार,
बिना दलालों के बैंकों ने ऋण दिया नहीं,
हमारी आत्महत्याओं से भी किसी का दिल पसीजा नहीं,

प्रजातंत्र के आका हो जाते अन्तर्ध्यान,
सत्ता की शक्ति, वेतन भत्ता का भी गुमान,
हमारी फटेहाली में कोई साथ रहा नहीं,
मेरी लाश उठ गई लेकिन मैं रिटायर हुआ नहीं,

उद्योगतियों का है खुमार,
उसके राहत को धन अपार,
किसी ने आत्महत्या किया नहीं,
आश्चर्य किसी नेता का काला धन मिला नहीं,

यह कैसा लोकतंत्र का संस्कार,
अपनी किस्मत पर रोता जहां पालनहार,
शहीदों ने ऐसी आजादी का कल्पना था किया नहीं,
फिर भी खुश हैं हम, आजतक देशद्रोह किया नहीं।

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