मेरा ओकाद
गैरों से ज्यादा मेरे अपने परेशान थे,
मेरे वजूद से ज्यादा मेरी सोच से हैरान थे,
मेरी खुशियों से बड़ी तकलीफ़ उन्हें होती थी,
मेरी मूर्खता पर भगवान भी हैरान थे ...
मैं अपना दुःख जिनके संग बांटता था,
मेरी समस्याओं का उनके पास समाधान था,
मैं जिनके हौंसले पर योजनाएं बनाता था,
वही लोग मेरे सफ़र का सबसे बड़ा व्यवधान था ...
षड्यंत्र का क्या ख़ूब जाल उन्होंने बुना था,
मदद के लिये जिन अपनों को मैंने चुना था,
मेरे उतने रुपयों को उन्होंने बरबाद कर डाला,
जितना मेरी अंगुलियों ने पहले कभी ना गिना था ...
इन कागज के टुकड़ों में कोई ख़ास बात नहीं थी,
जिंदगी का सौदा था, किसी की खैरात नहीं थी,
हौंसला टूट गया था, क़िस्मत जाग कर भी रूठ गया था,
तुम्हें कैसे बताऊँ, तुम्हें भूलने की मेरी ओकाद नहीं थी ...
बेशक मेरी मजबूरियों का सजा तुमने पाया था,
किस रात को तेरी यादों ने मुझे नहीं रुलाया था,
तन्हाइयों के हर पल में दिल ने सिर्फ़ तुझे चाहा था,
कागज के इन्हीं टुकड़ों ने मेरी बगिया को थोड़ा सजाया था...
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