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४६. ज्यादती @

४६. ज्यादती @

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

हमदर्द बन कर आए वो,
जिन्हें हमारे दर्द का पता नहीं था,
कितने नासमझ बनते हैं ये लोग,
जिन्होंने हमें यह दर्द दिया था ...

तेरी गुस्ताखी कुछ ख़ास नहीं है,
मैं हीं कुछ ज्यादा समझदार हूँ,
भरोसा हर किसी पर करना मुनासिब नहीं,
बिना दक्षिणा इस ज्ञान को देने का कर्जदार हूँ ...

मेरे यक़ीन का महल राख हुआ है,
बेशक बहुत बड़ा विश्वासघात हुआ है,
फ़िर भी ख़ुश हूँ क्योंकि तेरी अदा गजबनाक है,
खंजर भौंक कंधे पर हाथ रखना अब नहीं शर्मनाक है...

गिरगिट भी शर्म से पानी-पानी हुआ,
भीड़ में जब तूने रब से मेरे लिये मांगा दुआ,
इतना बेहयापन तूने कहाँ से पाया है,
सबकुछ निगल कर ख़ुद को भूखा बताया है...

सत्ताधारी ना जाने क्यों भूल गये हैं,
कितने सल्तनत धूल में मिल गये हैं,
जनता इन कष्टों को झेलने की आदि है,
तेरा इस कदर हमदर्द बनना सबसे बड़ी ज्यादती है ...

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