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हुनरबाज़

*हुनरबाज*

✍🏻 *बिपिन कुमार चौधरी*

हमारे मुल्क़ में हुनरबाजों की कोई कमी नहीं है,
जुबां खोलने की गुस्ताखी कोई दिल्लगी नहीं है,
आबरू खो कर वह न्याय को दरदर भटकती रही,
इंसाफ के दरख्वास्त की सजा यह मामूली है...

हमेशा के लिये रब ने उसे ख़ामोश कर दिया है,
जिंदा लाश के न्याय की गुहार से सबका मन भर गया है, 
न्याय के दहलीज़ पर ठोकरें खाकर बहुत मायूस थी,
आजा़द देश में बोलने का इनाम उसे मिल गया है ...

हश्र उसका देख हर बेटी का बाप थोड़ा डर गया है,
डरने की कोई बात नहीं, उसका बाप पहले हीं मर गया है,
कैसे कह दूँ इस देश में लोगों के पास हिम्मत नहीं है,
अपनी बेटियों के आंखो में आंसू आने तक कोई जरूरत नहीं है...

इस मुल्क़ में कभी एक  दामिनी मर गयी थी,
एक हादसा जिससे सारी दुनियां डर गयी थी,
डर कर जीने वालों की सिर्फ़ आबरू यहाँ लूटती है,
हिम्मत दिखाने पर बेवजह अर्थियां  सजती है,

मैं लिख कर अक्सर थोड़ा शर्मिंदा हो जाता हूँ,
कागज को गंदा कर थोड़ा जिंदा हो जाता हूँ,
मेरे शब्दों से किसी अबला को न्याय मिल नहीं सकती है,
भूल जाओ सबकुछ, कहीं कुछ भी हुआ साजिश नहीं है ...

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