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८७. भाभी का आतंक @

भाभी का आतंक
  (हास्य कविता)
✍ बिपिन कुमार चौधरी
उसकी आँखो में खौफ़ देख दोस्तों का आँख भर आया था,
पूरे बदन पर जब उसने झाड़ू का दाग दिखलाया था,

ग़लती कुछ ख़ास नहीं दोस्तों के संग दो पेक लगाया था,
मामूली ग़लती का बड़ा बेरहम सजा उसने पाया था...

ऋषि बोला गदहे तूने झाड़ू क्यों नहीं छिपाया था,
इसी ग़लती ने कभी बेलन से उसका नाक तुड़वाया था,

अपनी बहादुरी का बखान करने वाला बुरी तरह शरमाया था,
इसी ख़ुशी में दोस्तों ने फ़िर कई पेक उसे पिलाया था...

नशे में बदहवास फ़िर भी भाभी के डर से किसी ने घर नहीं पहुंचाया था,
दोस्तों के इसी बेरहमी ने उसे आज बहुत रुलाया था..

शुभ मूहर्त में ना जाने किस आफ़त को घर लाया था,
भाभी को सामने देखते हीं उसका सारा नशा उतर आया था...

मुंह की बदबू ने आज फ़िर उसे बुरी तरह फंसाया था,
बेचारा बनवारी भाभी के हाथों  झाड़ू से ख़ूब मालिश करवाया था...

दोस्तों के महफ़िल में इस ख़बर ने हरकंप मचाया था,
सभी की पत्नियों ने भाभी श्री को अपना नेता बनाया था...

दोस्तों के महफ़िल में भाभी के आतंक ने धूम मचाया है,
आजकल सबकी जुबां पर एक हीं  सवाल कौन कमीना आज माड़ खाया है ...




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