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५४. उम्मीदों का शीशमहल @

उम्मीदों का शीशमहल

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

अपनी हीं परछाईं से लोग ना जाने क्यों परेशान  है,
गंगू तेली बन बैठा सिकंदर राजा भोज गुमनाम है,
नक़ली आंसुओं के भेंट चढ़ गये भव्यता लिये जो अरमान है,
रब की मेहरबानी है या किसी के दिये सौगातौ का एहसान है,

उलझनें अक्सर उनकी बढ़ जाया करती है,
उम्मीदों के शीशमहल में करता जो आराम है,
छटपटाहट अक्सर उनकी कुछ ज्यादा दीखती है,
इंसानी कायदों से रहते जो अनजान है,

अपनों के अपनापन की इतनी भी तलाश क्यों ? ?
नीड़ के सागर के बीच बेसब्री की यह प्यास क्यों ? ?
ऊपर वाले भी हमारी मजे ले रहे हैं,
प्रसन्नता की चाहत में हर कोई इतना उदास क्यों ? ?

हालात समझना मुश्किल अंगुली उठाना आसान है,
जीवन के तपोभूमि में खचाखच भीड़ के बीच सुनसान है,
इस भीड़ में भी अपनी चमक खोने नहीं देना,
कर्मवीर की यही सबसे बड़ी पहचान है...

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