आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था ...
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था,
मेरी क़िस्मत मुझे चाँद नजर आया था,
होठों की मुस्कुराहट बयां कर रही थी,
ऐसे हीं यह दुपट्टा नहीं लहराया आया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था....
खुशनुमा मौसम ने चारों दिशाओं को बताया था,
दुपट्टे का लहराना उसे भी रास आया था,
उसके झील की आंखो की गहराई ने मुझे ख़ुद में डुबाया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था ...
मेरी दिल की बातों को जुबां ने ना जाने क्यों दबाया था,
मेरी गुस्ताखी का मुझको एहसास कराया था,
तेरी मजबूरी के हाथों सिसकने को ख़ुदा ने यह चाँद नहीं बनाया था ...
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था,
निगाहें झुका कर चाँद ने मुझे अपने पास बुलाया था,
कोयल की कुक ने यह पैगाम पहुँचाया था,
मेरे दिल को ना जाने क्यों यह बात रास नहीं आया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था ....
मेरी बेरुखी ने फ़िर आज किसी को रुलाया था,
चिड़ियों की चहक ने इसी बात पर शोर मचाया था,
इसी बात से आज फ़िर मेरा दिल भर आया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था ...
मेरे दिल की धड़कन, मेरे सांसो की सिहरन,
इस बात पर बहुत विरोध जताया था,
अचानक हीं बादलों से चाँद घिर आया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा मेंः लहराया था ...
गगन की गहराई से भी यह आवाज आया था,
किसी नजर की तलाश में चाँद ने ख़ुद को बहुत सजाया था,
किसी के उदास चेहरे ने झरने को भी बहुत रुलाया था,
आज एक बार फ़िर दुपट्टा हवा में लहराया था ....
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