बेवफ़ा ...
किताबों में अक्सर जिनकी सूरत दिख जाती है,
कानों में जिसके चहकने की आवाज गुनगुनाती है,
सपनों में वो अपने गुनाहों का हिसाब मांगती है,
वक्त भी जिन यादों को भुला नहीं पाया,
क़िस्मत उन कठिन सवालों का जवाब मांगती है...,
मजबूरी मेरी थी,
सज़ा उसने क्यों पाया,
हर जख्म पर मरहम लगाने वाली,
अपने जख्मों का ये कौन सा दवा पाया,
जिंदगी उसने सौंपा था,
किसी को जिंदगी का हमराज़ बना कर,
यकीन था उसे जिसपर ख़ुद से भी ज्यादा,
बेवफ़ा निकला वो, अपनी मजबूरियों का बहाना बनाकर ....
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