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८१. दिमाग का अंधा @

दिमाग का अंधा

✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी

बेवजह भौंकना कुछलोगों की  फ़ितरत होती है, 
जाबांज के हौसले तोड़ देना,
कुछ किये बिना हीं श्रेय लेना,
मजलिस में खुद को बलिदानी साबित करना,
पल पल षडयंत्र का जाल बुनना,
उस जाल में फंस कर बेमौत मरना,
ऐसे नाचीज की शहादत होती है,

अरे जिगर जिनका बड़ा होता है,
सपने उनके पूरे भी होते हैं,
ऐसे भौंकने वालों का भला क्या असर,
जिनके दिल में अंगारों के जलजले होते हैं,

परीक्षा उनकी कठिन होती है,
हर पल इम्तिहान जटिल होती है,
खामोशी को उनकी बुजदिली ना समझें, 
लक्ष्य पर उनकी निगाहें बड़ी संगीन होती है,

आप रोक सकते हो उन्हें,
तोड़ नहीं सकते,
दिल भले इनका कमजोर होता है,
दया और सहयोग का सैलाब भरा होता है,
वक्त आने पर ये जवाब देते हैं,
हर ज़ख्म का माक़ूल हिसाब लेते हैं,
अगर तबाही खुद की रोकना हो,
इनके क्रोधाग्नि से डरो,
ये शांत हैं तो क्या हुआ,
इनकी विध्वंसक खामोशी से डरो,
लक्ष्य इनके लिये कोई बड़ा नहीं होता,
बाधा इनके सामने ज्यादा दिन खड़ा नहीं होता,
धृतराष्ट्र अगर सिर्फ आँख से अंधा होता,
तो सारा खानदान बेमौत मरा नहीं होता ....

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